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  "type": "article",
  "title": "ड्रोन हमले के बाद सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन बंद, वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति पर गहराया संकट",
  "summary": "इराक स्थित ईरान समर्थित मिलिशिया के ड्रोन हमले के बाद सऊदी अरब ने अपनी प्रमुख ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन बंद कर दी है, जिससे दुनिया भर में ईंधन की कीमतों और आपूर्ति में भारी उथल-पुथल की आशंका बढ़ गई है।",
  "content": "मध्य पूर्व में जारी संघर्ष और युद्ध की विभीषिका के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार को एक और करारा झटका लगा है। मध्य पूर्व के सबसे बड़े तेल उत्पादक देश सऊदी अरब ने अपनी महत्वपूर्ण ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को शुक्रवार को पूरी तरह बंद कर दिया। यह कठोर कदम हाल ही में पाइपलाइन पर हुए एक घातक हमले के बाद उठाया गया है। सऊदी अरब ने इस हमले का सीधा आरोप इराक में सक्रिय ईरान समर्थित मिलिशिया के ड्रोनों पर लगाया है। इस रणनीतिक मार्ग के अचानक ठप हो जाने से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजारों में आपूर्ति की भारी किल्लत पैदा होने की आशंका गहरा गई है, जिससे ईंधन समेत तमाम रोजमर्रा की जरूरी चीजों की कीमतें और आसमान छू सकती हैं।\n\nक्षेत्रीय अधिकारियों के अनुसार, हमले से बुनियादी ढांचे को पहुंचे नुकसान की मरम्मत करने में तीन से पांच सप्ताह का समय लग सकता है। यह पाइपलाइन मध्य पूर्व से कच्चा तेल बाहर निकालने के लिए बेहद जीवनरेखा मानी जाती है, क्योंकि यह कच्चे तेल को फारस की खाड़ी से सीधे लाल सागर तक पहुंचाती है। इससे पहले तेल निर्यातक देशों को होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर रहना पड़ता था, जो एक संकरा जलमार्ग है और जहां से फरवरी में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों से पूर्व दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत यानी पांचवें हिस्से की तेल आपूर्ति गुजरती थी। मौजूदा समय में यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के प्रमुख समुद्री व्यापारिक मार्गों के कई द्वीपों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है, जिससे सऊदी अरब के समुद्री तेल निर्यात पर दोतरफा खतरा पैदा हो गया है। हालांकि होर्मुज में टैंकरों की बेहद सीमित आवाजाही जैसे कुछ वैकल्पिक रास्ते अभी खुले हैं, लेकिन विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि आपूर्ति के झटके और बढ़ेंगे तथा आम उपभोक्ताओं पर महंगाई का बोझ और अधिक भारी होगा।\n\nअंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उछाल और पाइपलाइन का महत्व\nइस बड़े व्यवधान के तुरंत बाद अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड का भाव सोमवार को 105 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया। बाजार में इस तेजी से स्पष्ट संकेत मिलता है कि व्यापारी आने वाले दिनों में और विकट संकट की आशंका देख रहे हैं। सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन रेगिस्तानी इलाके में लगभग 1,200 किलोमीटर की दूरी तक फैली हुई है। इसका मुख्य कार्य फारस की खाड़ी के निकट स्थित तेल प्रसंस्करण संयंत्र से कच्चे तेल को पश्चिम की ओर लाल सागर तक ले जाना है। लाल सागर पर स्थित बंदरगाह पर कच्चा तेल बड़े टैंकरों में भरा जाता है, जहां से यह स्वेज नहर के जरिए उत्तर दिशा में यूरोप की ओर या फिर बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से होते हुए दक्षिण दिशा में एशिया की तरफ रवाना होता है।\n\nइस ऐतिहासिक पाइपलाइन का निर्माण मूल रूप से 1980 के दशक में किया गया था। उस समय ईरान-इराक युद्ध के दौरान तेहरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाले जहाजों के आवागमन को बाधित करने की गंभीर आशंकाएं थीं। मौजूदा युद्ध के शुरुआती छह महीनों में भी इस पाइपलाइन ने मध्य पूर्व से तेल की निकासी को सुचारू रखने में निर्णायक भूमिका निभाई, जबकि उस दौरान होर्मुज में अधिकांश वाणिज्यिक तेल टैंकरों का परिचालन पूरी तरह ठप पड़ा हुआ था। ऊर्जा अनुसंधान फर्म राइस्टैड एनर्जी के अनुसार, अगस्त के उत्तरार्ध से इस पाइपलाइन के जरिए यानबू के लाल सागर बंदरगाह तक प्रतिदिन औसतन 26 लाख से 40 लाख बैरल तेल पहुंचाया जा रहा था। फर्म ने चेतावनी दी है कि तेल का यह विशाल भंडार अब बाजार से पूरी तरह गायब होने के खतरे में है।\n\nसऊदी उत्पादन और वैश्विक आपूर्ति का गणित\nअंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 40 लाख बैरल प्रतिदिन का यह आंकड़ा पूरी दुनिया की कुल तेल आपूर्ति के लगभग 4 प्रतिशत के बराबर है। सऊदी अरब के घरेलू उत्पादन के आंकड़ों पर नजर डालें तो आईईए ने बताया कि देश ने सितंबर 2025 में प्रतिदिन लगभग 1 करोड़ बैरल कच्चे तेल का उत्पादन किया था, लेकिन अगस्त में यह उत्पादन घटकर केवल 60 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया था। राइस्टैड एनर्जी में तेल बाजार के उपाध्यक्ष जानिव शाह ने स्पष्ट किया कि ब्रेंट क्रूड की कीमतों में आई ताजा उछाल यह साबित करती है कि बाजार आपूर्ति के इस बड़े नुकसान पर पहले ही आक्रामक प्रतिक्रिया देने लगा है। उन्होंने कहा कि सऊदी अरब अपने मौजूदा आपातकालीन तेल भंडारों के सहारे आगामी कुछ दिनों तक निर्यात को किसी तरह बनाए रख सकता है, लेकिन यह स्थिति बहुत तेजी से बदल सकती है।\n\nमध्य पूर्व के प्रमुख समुद्री रास्तों की मौजूदा स्थिति\nवैश्विक ऊर्जा रणनीति में होर्मुज जलडमरूमध्य अभी भी सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। युद्ध छिड़ने से पहले रोजाना करीब 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल होर्मुज जलमार्ग से होकर गुजरता था। वर्तमान में कुछ चुनिंदा टैंकर दोबारा इस जलडमरूमध्य से गुजर रहे हैं, लेकिन जहाजों का आवागमन पहले के सामान्य स्तर की तुलना में बहुत कम है। समुद्री डेटा ट्रैक करने वाली संस्था लॉयड्स लिस्ट इंटेलिजेंस की निगरानी रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर के पहले सप्ताह में केवल 90 जहाजों ने इस जलमार्ग को पार किया, जबकि युद्ध शुरू होने से पहले प्रतिदिन लगभग 130 जहाज यहां से सुरक्षित गुजरते थे।\n\nदूसरी ओर, हूती विद्रोहियों ने दक्षिणी लाल सागर के बेहद संवेदनशील और रणनीतिक मार्ग बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर अपनी पकड़ अत्यधिक मजबूत कर ली है। मेलियस रिसर्च के विश्लेषकों के अनुमान के अनुसार, सितंबर की शुरुआत में बाब अल-मंदेब के रास्ते प्रतिदिन लगभग 30 लाख बैरल कच्चा तेल गुजर रहा था, लेकिन सोमवार को दी गई जानकारी में उन्होंने बताया कि वर्तमान में यह मात्रा घटकर शून्य के करीब पहुंच चुकी है। हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों के कारण यानबू बंदरगाह से निकलने वाला अधिकांश सऊदी तेल उत्तर की ओर भूमध्य सागर की तरफ भेजा जाने लगा था, जिसके लिए स्वेज नहर या मिस्र की सुमेद (SUMED) पाइपलाइन का इस्तेमाल किया जा रहा था। हालांकि, हूती विद्रोहियों ने अब उत्तर की ओर जाने वाले सऊदी जहाजों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया है। उत्तरी कैरोलिना स्थित कैंपबेल यूनिवर्सिटी में समुद्री इतिहास के प्रोफेसर सल्वाटोर मर्कोलियानो ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कम से कम होर्मुज का रास्ता अभी भी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। उनके शब्दों में, अगर ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन ही सऊदी अरब के लिए तेल बाहर निकालने का एकमात्र जरिया होती तो यह स्थिति पूरी तरह विनाशकारी होती। उन्होंने समझाया कि चूंकि होर्मुज का मार्ग पूरी तरह तो नहीं लेकिन आंशिक रूप से फिर खुल गया है, इसलिए यह सऊदी अरब के लिए अंत नहीं है और वे किसी तरह तेल बाहर निकाल पा रहे हैं।\n\nईंधन की महंगाई और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर\nकच्चे तेल की आपूर्ति में आई इस व्यापक रुकावट ने दुनिया भर में ऊर्जा की कीमतों को भड़का दिया है। अर्थशास्त्रियों और विश्लेषकों का आकलन है कि इस नए व्यवधान के चलते आने वाले हफ्तों और महीनों में आम उपभोक्ताओं को महंगाई की और तीखी मार झेलनी पड़ेगी। इसका सबसे सीधा और तत्काल प्रभाव वाहन ईंधन और घरेलू ऊर्जा बिलों की दरों पर दिखाई दे रहा है। विशेष रूप से एशिया और अफ्रीका के वे देश, जो मध्य पूर्व के तेल आयात पर सबसे अधिक निर्भर हैं, सबसे गंभीर आर्थिक झटकों का सामना कर रहे हैं।\n\nग्लोबल पेट्रोल प्राइसेज के आंकड़ों के अनुसार, नाइजीरिया में फरवरी के आखिर की तुलना में डीजल की कीमतें अब 92 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं, जबकि पेट्रोल की कीमतें लगभग 61 प्रतिशत चढ़ चुकी हैं। इसी तरह अन्य देशों में भी भारी उछाल देखा गया है, जिसमें इंडोनेशिया में डीजल 87 प्रतिशत और पेट्रोल 38 प्रतिशत महंगा हुआ है, जबकि लेबनान में डीजल 80 प्रतिशत और पेट्रोल की दरों में 46 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। संयुक्त राज्य अमेरिका में भी वाहन चालकों को तगड़ा झटका लगा है। मोटर क्लब एएए के आंकड़ों के मुताबिक, सोमवार को अमेरिका में नियमित पेट्रोल की औसत कीमत लगभग 4.32 डॉलर प्रति गैलन रही, जो युद्ध से पहले के 2.98 डॉलर के स्तर से लगभग 45 प्रतिशत अधिक है। इसके अलावा, मुद्रास्फीति को समायोजित किए बिना, अमेरिका में डीजल की औसत कीमत सोमवार को 6.23 डॉलर प्रति गैलन के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गई, जो युद्ध की शुरुआत से लगभग 66 प्रतिशत अधिक है। डीजल की बढ़ती लागत सीधे अन्य सभी वस्तुओं को महंगा बनाती है, क्योंकि भारी मालवाहक ट्रकों, माल ढुलाई नेटवर्क और कृषि उपकरणों में बड़े पैमाने पर इसी ईंधन का उपयोग होता है। मेलियस रिसर्च के विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि उर्वरक और ऊर्जा स्रोतों जैसी अनिवार्य वस्तुओं पर युद्ध के दबाव के कारण व्यापक मुद्रास्फीति का फैलाव तय है, खासकर तब जब अमेरिका में फसलों की कटाई और घरों को गर्म रखने का मौसम नजदीक आ रहा है।\n\nइसका आप पर असर\nसऊदी अरब की मुख्य पाइपलाइन बंद होने और लाल सागर व होर्मुज में रुकावटों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने से दुनिया भर में ईंधन और जरूरी चीजों की लागत सीधे तौर पर बढ़ जाएगी।\n\n• भारत में प्रभाव: भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय दरों में उछाल से घरेलू तेल कंपनियों और सरकार पर आयात बिल का दबाव बढ़ेगा। यदि कीमतें लंबे समय तक 105 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी रहीं, तो आने वाले दिनों में पेट्रोल, डीजल और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से रोजमर्रा के सामान महंगे हो सकते हैं।\n• वैश्विक उपभोक्ताओं पर: अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के कई देशों में पेट्रोल और डीजल के दाम पहले ही 38 प्रतिशत से लेकर 92 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं। इसका सीधा असर आम परिवारों के मासिक बजट, बिजली बिल और खाद्य वस्तुओं के परिवहन खर्च पर पड़ रहा है।\n• किसानों और लॉजिस्टिक्स पर: अमेरिका में डीजल 6.23 डॉलर प्रति गैलन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने से माल ढुलाई करने वाले ट्रकों और खेती की मशीनों का संचालन महंगा हो गया है। आगामी फसल कटाई और सर्दियों के हीटिंग सीजन में कृषि उत्पादों व खाद्य पदार्थों की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।\n• उर्वरक और खाद्य आपूर्ति: कच्चे तेल और प्राकृतिक ऊर्जा संसाधनों पर दबाव बढ़ने से रासायनिक उर्वरकों का उत्पादन महंगा हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक बाजार में फसलों की उत्पादन लागत बढ़ेगी, जिसका खामियाजा अंततः खुदरा खरीदारों को भुगतना पड़ेगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nसऊदी अरब को अपनी 1,200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को इसलिए बंद करना पड़ा क्योंकि इराक में मौजूद ईरान समर्थित मिलिशिया द्वारा किए गए ड्रोन हमलों से इसके बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा है।\n\n• प्रत्यक्ष ड्रोन हमला: इराक स्थित ईरान समर्थित सशस्त्र मिलिशिया द्वारा दागे गए ड्रोनों ने सऊदी अरब की इस प्रमुख पाइपलाइन को निशाना बनाया, जिससे इसे आपातकालीन रूप से बंद करना पड़ा। अधिकारियों के अनुसार बुनियादी ढांचे को पहुंचे नुकसान की तकनीकी मरम्मत में तीन से पांच सप्ताह तक का समय लगेगा।\n• ईरान युद्ध और समुद्री नाकाबंदी: फरवरी में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद से होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य जहाजरानी ठप पड़ गई थी। इसके चलते सऊदी अरब अपने कच्चे तेल को सुरक्षित रूप से लाल सागर तक पहुंचाने के लिए पूरी तरह ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर निर्भर हो गया था।\n• हूती विद्रोहियों की आक्रामकता: यमन के हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के महत्वपूर्ण व्यापारिक द्वीपों पर कब्जा कर लिया और बाब अल-मंदेब जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों को निशाना बनाया, जिससे वहां से तेल का प्रवाह घटकर लगभग शून्य हो गया। इसके बाद विद्रोहियों ने उत्तर की ओर भूमध्य सागर की तरफ जाने वाले सऊदी तेल जहाजों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सऊदी अरब ने अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को क्यों बंद किया?\nइराक में सक्रिय ईरान समर्थित मिलिशिया के ड्रोन हमले के बाद सुरक्षा और नुकसान के चलते सऊदी अरब ने शुक्रवार को इस पाइपलाइन को बंद कर दिया।\n\n2. इस पाइपलाइन की मरम्मत में कितना समय लगने का अनुमान है?\nक्षेत्रीय अधिकारियों के अनुसार, ड्रोन हमले से पहुंचे नुकसान की मरम्मत करने और पाइपलाइन को दोबारा चालू करने में तीन से पांच सप्ताह का समय लग सकता है।\n\n3. इस पाइपलाइन के जरिए प्रतिदिन कितना कच्चा तेल भेजा जा रहा था?\nअगस्त के उत्तरार्ध से इस पाइपलाइन के माध्यम से लाल सागर के यानबू बंदरगाह तक प्रतिदिन औसतन 26 लाख से 40 लाख बैरल तेल पहुंचाया जा रहा था।\n\n4. वैश्विक तेल बाजार में ब्रेंट क्रूड की क्या कीमत दर्ज की गई?\nपाइपलाइन बंद होने और आपूर्ति में व्यवधान के बाद अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड का भाव बढ़कर 105 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया।\n\n5. ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन की लंबाई कितनी है और यह कहां से कहां तक जाती है?\nयह पाइपलाइन लगभग 1,200 किलोमीटर लंबी है, जो फारस की खाड़ी के पास स्थित प्रसंस्करण संयंत्र से कच्चे तेल को पश्चिम में लाल सागर तक ले जाती है।\n\n6. अमेरिका में पेट्रोल और डीजल के दामों पर क्या असर पड़ा है?\nअमेरिका में नियमित पेट्रोल 45 प्रतिशत बढ़कर 4.32 डॉलर प्रति गैलन और डीजल 66 प्रतिशत बढ़कर 6.23 डॉलर प्रति गैलन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है।",
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  "publishedAt": "2026-09-19",
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