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  "type": "article",
  "title": "एक झटके में हीलियम रोकने वाले चीन ने बढ़ाई भारत की मुश्किल, MRI से लेकर चिप तक पर खतरा",
  "summary": "चीन ने हीलियम गैस के निर्यात पर अचानक रोक लगा दी है, जबकि भारत अपनी पूरी जरूरत यानी 100 फीसदी हीलियम बाहर से मंगाता है। कतर की सप्लाई फंसने से दाम पहले ही 35 से 50 फीसदी तक चढ़ चुके हैं।",
  "content": "दुनिया की एक बेहद अहम गैस को लेकर हलचल तेज हो गई है। चीन ने अचानक हीलियम के निर्यात पर रोक लगा दी है और यही खबर भारत के लिए सिरदर्द बन गई है। वजह साफ है, हमारा देश अपनी जरूरत का 100 फीसदी हीलियम दूसरे देशों से खरीदता है, हमारे पास इसका अपना कोई बड़ा जरिया नहीं है। इसमें भी करीब 50 फीसदी हीलियम अकेले कतर से आता है, और कतर इस वक्त ईरान से जुड़े तनाव की वजह से बुरी तरह उलझा हुआ है। अस्पताल से लेकर अंतरिक्ष तक, और अब सेमीकंडक्टर मिशन तक, हर जगह इस गैस की जरूरत है। आइए पूरे मामले को आसान भाषा में समझते हैं।\n\nहीलियम आखिर है क्या और इसकी खूबी क्या है\nहाइड्रोजन के बाद यह ब्रह्मांड का दूसरा सबसे हल्का तत्व है। हीलियम एक रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन गैस है, जिसमें आग नहीं लगती। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि बेहद ठंडे तापमान पर भी यह पानी की तरह तरल रूप में बनी रह सकती है। किसी दूसरे रसायन के साथ मिल जाने पर भी यह जल्दी से रिएक्शन नहीं करती, यानी काफी स्थिर रहती है। दिक्कत यह है कि धरती पर इसकी मात्रा बहुत सीमित है और एक बार खत्म होने के बाद इसे दोबारा बनाया नहीं जा सकता। यही वजह है कि यह गैस इतनी कीमती मानी जाती है।\n\nचीन ने अचानक दरवाजा क्यों बंद किया\nचीन ने यह कदम अपने ही उद्योगों की सुरक्षा के लिए उठाया है। दरअसल दुनिया भर में हीलियम की सप्लाई तेजी से घट रही है। चीन खुद अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत हीलियम बाहर से मंगाता है। कतर जैसे देशों से आपूर्ति गड़बड़ाने के बाद चीन सतर्क हो गया और उसने तय किया कि पहले अपनी जरूरत पूरी होगी। वह किसी भी हाल में नहीं चाहता कि उसके यहां AI चिप बनाने और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे हाई-टेक कारोबार पर ब्रेक लगे। इसलिए उसने निर्यात रोककर अपना स्टॉक अपने पास रखने का फैसला किया।\n\nदुनिया में हीलियम कहां से आता है\nअमेरिका, कतर और रूस इस गैस के सबसे बड़े और प्रमुख उत्पादक देश हैं। इनके अलावा कनाडा और अल्जीरिया भी दुनिया को कुछ हीलियम देते हैं। दिलचस्प बात यह है कि पूरी दुनिया की कुल हीलियम में चीन का हिस्सा सिर्फ 1.6 प्रतिशत ही है। चूंकि इसका उत्पादन गिनती के कुछ देशों तक ही सिमटा हुआ है, इसलिए इसकी ग्लोबल सप्लाई चेन बहुत नाजुक है। रूस पर लगे प्रतिबंध और कतर से आपूर्ति में आई रुकावट, इन दोनों ने मिलकर बाजार में हीलियम की भारी किल्लत पैदा कर दी है।\n\nभारत के लिए यह कितना बड़ा झटका है\nभारत की निर्भरता पूरी तरह दूसरे देशों पर है। अपनी जरूरत का 50 प्रतिशत से ज्यादा हीलियम हम अकेले कतर से मंगाते हैं। हालात तब और बिगड़ गए जब मार्च 2026 में कतर के रास लाफान प्लांट पर बम गिरने से वहां का उत्पादन प्रभावित हुआ। ऊपर से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद हो जाने की वजह से समुद्री व्यापार लगभग ठप पड़ गया। इन्हीं वजहों का नतीजा है कि हीलियम के दाम 35 से 50 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं, और आगे यह बोझ कई क्षेत्रों पर पड़ने वाला है।\n\nसेहत पर सीधा असर, MRI हो सकती है महंगी\nहीलियम का सबसे ज्यादा इस्तेमाल मेडिकल सेक्टर में होता है। खासकर MRI स्कैनर मशीनों में। इन मशीनों के अंदर बेहद ताकतवर चुंबक लगे होते हैं और उन्हें काम करने लायक ठंडा रखने के लिए तरल हीलियम का इस्तेमाल किया जाता है, जिसका तापमान माइनस 269 डिग्री सेल्सियस तक होता है। अगर हीलियम की सप्लाई अटकती है या यह बहुत महंगी हो जाती है, तो अस्पतालों में MRI स्कैन कराना आम आदमी की जेब से बाहर हो सकता है। यानी यह संकट सीधे मरीजों तक पहुंचेगा।\n\nसेमीकंडक्टर और अंतरिक्ष मिशन पर आंच\nसरकार इस वक्त देश में ही सेमीकंडक्टर बनाने पर पूरा जोर लगा रही है, और यहीं हीलियम एक बड़ी अड़चन बन सकता है। चिप बनाने की प्रक्रिया में सिलिकॉन वेफर्स को बहुत तेजी और एकसार तरीके से ठंडा करने के लिए यही गैस चाहिए। इतना ही नहीं, बहुत ऊंचे तापमान पर चिप बनाते समय हीलियम एक सुरक्षित माहौल तैयार करती है, जिससे चिप खराब नहीं होती। अगर इसकी कमी बनी रही तो देश में चिप कारखाने लगाने की योजना धीमी पड़ सकती है। दूसरी तरफ, इसरो के रॉकेट लॉन्च में भी हीलियम जरूरी है, क्योंकि रॉकेट के फ्यूल पाइपों को साफ करने और खतरनाक वाष्प को हटाने में इसका इस्तेमाल होता है।\n\nइंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क भी दायरे में\nआज हाई-स्पीड इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क पूरी तरह जमीन के नीचे बिछी ऑप्टिकल फाइबर केबल पर टिके हैं। इन केबलों को बनाते वक्त पिघले हुए कांच को पतले धागों में खींचा जाता है और उन्हें फौरन ठंडा करने के लिए हीलियम काम आती है। यह गैस यह पक्का करती है कि फाइबर के अंदर ऑक्सीजन या नाइट्रोजन के बुलबुले न बनें, ताकि इंटरनेट की स्पीड कभी कमजोर न पड़े। साफ है कि अगर हीलियम नहीं मिली तो कनेक्टिविटी पर भी इसका असर दिखेगा।\n\nक्या भारत के पास अपना भंडार नहीं है\nभारत के पास हीलियम के कुछ स्रोत जरूर मौजूद हैं, लेकिन वे हमारी मांग के सामने बहुत छोटे हैं। पश्चिम बंगाल के बकरेश्वर में मौजूद गर्म झरनों से निकलने वाली प्राकृतिक गैसों में करीब 1.4 प्रतिशत हीलियम पाई जाती है। इसके अलावा दक्षिण भारत में केरल की मोनाजाइट रेत में भी यह गैस मिलती है। यह हीलियम थोरियम और यूरेनियम जैसे रेडियोधर्मी तत्वों के टूटने से प्राकृतिक रूप से बनती है, लेकिन इसे बाहर निकालना बहुत लंबी और खर्चीली प्रक्रिया है।\n\nबड़े पैमाने पर निकालना क्यों मुश्किल है\nदुनिया भर में हीलियम को ज्यादातर प्राकृतिक गैस के साथ ही जमीन के नीचे से निकाला जाता है। व्यावसायिक रूप से इसे निकालने के लिए प्राकृतिक गैस में हीलियम की मात्रा कम से कम 0.3 प्रतिशत होना जरूरी है। अमेरिका और कतर की प्राकृतिक गैस में यह मात्रा अच्छी-खासी होती है, इसलिए वहां इसे अलग करना आसान रहता है। इसके उलट, भारत के तेल और प्राकृतिक गैस बेसिनों में मिलने वाली गैस में हीलियम की मात्रा बहुत ही कम है, जिससे यहां इसे निकालना फायदे का सौदा नहीं बन पाता।\n\nएक जगह से दूसरी जगह ले जाना भी टेढ़ी खीर\nहीलियम को इधर से उधर पहुंचाना अपने आप में बहुत खर्चीला है। इसे समुद्र के रास्ते एक देश से दूसरे देश ले जाने के लिए बेहद दबाव वाली गैस या क्रायोजेनिक तरल के रूप में स्टोर करना पड़ता है। इसके लिए खास तौर पर बने वैक्यूम-जैकेटेड स्टेनलेस स्टील वेसल्स की जरूरत होती है। और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन खास कंटेनरों को भी काफी हद तक चीन ही बनाता है, यानी इस पूरे खेल में कहीं न कहीं चीन की पकड़ बनी हुई है।\n\nइसका आप पर असर\n• आपकी जेब पर: हीलियम महंगी होने से अस्पतालों में MRI स्कैन का खर्च बढ़ सकता है, जिसका सीधा असर आम मरीजों पर पड़ेगा।\n• भारत में: हीलियम की किल्लत से देश का सेमीकंडक्टर मिशन और चिप कारखाने लगाने की योजना धीमी पड़ सकती है, साथ ही इसरो के रॉकेट लॉन्च और इंटरनेट की फाइबर केबल तक पर असर मुमकिन है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. चीन ने हीलियम के निर्यात पर रोक क्यों लगाई?\nचीन ने यह रोक अपने खुद के उद्योगों की जरूरत सुरक्षित रखने के लिए लगाई, ताकि AI चिप और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे हाई-टेक सेक्टर का काम न रुके। चीन खुद अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत हीलियम आयात करता है।\n\n2. भारत के लिए यह इतना बड़ा संकट क्यों है?\nक्योंकि भारत अपनी जरूरत का 100 फीसदी हीलियम बाहर से खरीदता है और इसका 50 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा अकेले कतर से आता है।\n\n3. हीलियम के दाम कितने बढ़ चुके हैं?\nकतर की सप्लाई फंसने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने की वजह से हीलियम के दाम 35 से 50 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं।\n\n4. आम आदमी पर इसका सीधा असर कहां दिखेगा?\nअस्पतालों में MRI स्कैन महंगा हो सकता है, क्योंकि MRI मशीनों के चुंबकों को माइनस 269 डिग्री सेल्सियस पर ठंडा रखने के लिए तरल हीलियम चाहिए।\n\n5. कतर की सप्लाई क्यों गड़बड़ाई?\nमार्च 2026 में कतर के रास लाफान प्लांट पर बम गिरने से उत्पादन प्रभावित हुआ और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से समुद्री व्यापार लगभग ठप पड़ गया।\n\n6. क्या भारत के पास अपना हीलियम भंडार है?\nभारत के पास पश्चिम बंगाल के बकरेश्वर के गर्म झरनों और केरल की मोनाजाइट रेत जैसे कुछ स्रोत हैं, लेकिन वे मांग के सामने बहुत छोटे हैं और इन्हें निकालना लंबी व महंगी प्रक्रिया है।\n\n7. सेमीकंडक्टर मिशन पर क्या असर होगा?\nचिप बनाने में सिलिकॉन वेफर्स को ठंडा करने और सुरक्षित माहौल देने के लिए हीलियम जरूरी है, इसलिए इसकी कमी से देश में चिप कारखाने लगाने की योजना धीमी पड़ सकती है।",
  "url": "https://trendkia.com/business/eka-jhatake-men-hiliyama-rokane-vale-china-ne-barhai-bharata-ki-mushkila-mri-se-lekara-chipa-taka-para-khatara-8160",
  "category": "व्यापार",
  "publishedAt": "2026-07-16",
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    "हीलियम गैस संकट",
    "चीन निर्यात बैन",
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