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  "title": "बिहार के समस्तीपुर में उगाया गया महंगा विदेशी फल एवोकाडो, कीमत 1500 रुपये तक",
  "summary": "डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वैज्ञानिकों ने बिहार के मैदानी इलाकों में एवोकाडो की सफल खेती कर नया रिकॉर्ड बनाया है।",
  "content": "बिहार के कृषि क्षेत्र में एक अनोखा और बड़ा बदलाव देखने को मिला है। आमतौर पर पहाड़ी और ठंडे इलाकों की पैदावार माना जाने वाला एवोकाडो अब मैदानी क्षेत्र में भी लहलहा उठा है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के कृषि वैज्ञानिकों ने समस्तीपुर की जमीन पर इसकी सफल फसल तैयार कर एक नया मील का पत्थर हासिल किया है। बटर फ्रूट के नाम से पहचाने जाने वाले इस फल की खेती से अब स्थानीय किसानों के लिए आमदनी के नए रास्ते खुलने की उम्मीद बंध गई है।\n\nपोषण से भरपूर है बटर फ्रूट\nइस फल की लोकप्रियता केवल इसके महंगे दाम या विदेशी रसूख की वजह से नहीं है, बल्कि इसके भीतर मौजूद पोषक तत्वों का खजाना इसे खास बनाता है। इसमें भरपूर मात्रा में प्रोटीन, फाइबर और कई तरह के महत्वपूर्ण विटामिन पाए जाते हैं। इसके साथ ही शरीर के लिए जरूरी मिनरल्स, पोटैशियम, फोलेट और विटामिन ई भी इसमें प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। इसका मलाईदार टेक्सचर और अनूठा स्वाद इसे आम फलों से बिल्कुल अलग खड़ा करता है। यही स्वास्थ्यवर्धक गुण और बाजार में इसकी भारी मांग इसे खेती के लिहाज से एक बेहद फायदेमंद और ऊंची कीमत वाली बागवानी फसल बनाते हैं।\n\nवैज्ञानिकों ने ऐसे शुरू किया था परीक्षण\nपूसा स्थित इस प्रतिष्ठित कृषि संस्थान के शोधकर्ताओं ने सितंबर 2023 में एवोकाडो उगाने के इस अनूठे प्रयोग की शुरुआत की थी। सबसे बड़ी बाधा यह समझना थी कि उत्तर बिहार की तेज गर्मी, उमस, भारी बारिश और बदलते तापमान के बीच यह विदेशी पौधा कैसे टिकेगा। इस समस्या से पार पाने के लिए वैज्ञानिकों ने टाइप-ए वैरायटी अर्का सुप्रीम और टाइप-बी वैरायटी अर्का रावी को पास-पास लगाया ताकि बेहतर क्रॉस-पॉलिनेशन यानी पर-परागण संभव हो सके। पूरे परीक्षण के दौरान पौधों की जरूरतों और यहां के मौसम के मुताबिक खेती के खास तरीके ईजाद किए गए।\n\nजलजमाव से बचाव के लिए खास तकनीक\nबिहार की आबोहवा में इस पौधे को जीवित रखना आसान नहीं था क्योंकि यहां जलजमाव की समस्या आम है। एवोकाडो की जड़ें अत्यधिक पानी या लंबे समय तक नमी में रहने के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं और सड़ने लगती हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने मैदानी इलाकों के अनुकूल विशेष प्रबंधन प्रणाली विकसित की। पौधों को सामान्य जमीन पर उगाने के बजाय ऊंची मेड़ों और क्यारियों पर रोपने की व्यवस्था की गई। इसके अलावा पौधों की सेहत दुरुस्त रखने के लिए ड्रिप माइक्रो इरिगेशन यानी टपक सिंचाई और बेसिन मल्चिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का प्रभावी उपयोग किया गया।\n\nशानदार उत्पादन और बंपर मुनाफे की उम्मीद\nमहज ढाई साल पुराने इस बाग से मिले नतीजे वैज्ञानिकों के अनुमान से कहीं अधिक उत्साहजनक रहे हैं। अर्का सुप्रीम किस्म के पौधों पर जो फल आए हैं, उनका वजन करीब 750 से 950 ग्राम तक दर्ज किया गया है। संस्थान के मुताबिक जब इन फलों के जैव-रासायनिक और संवेदी परीक्षण कराए गए, तो बिहार में पैदा हुए एवोकाडो का स्वाद और मक्खन जैसी मलाईदार गुणवत्ता विदेशों से आयातित फल के बराबर या उससे भी बेहतर पाई गई। स्थानीय खेतों के स्तर पर इसका औसत भाव लगभग 400 रुपये प्रति किलोग्राम आंका गया है, जबकि बड़े शहरों के महंगे सुपरमार्केट और खुदरा बाजारों में यह 1500 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक सकता है।\n\nकिसानों के लिए खुलेगा तरक्की का नया रास्ता\nविश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पी. एस. पाण्डेय ने इस सफलता को बिहार की कृषि व्यवस्था के लिए एक गौरवशाली उपलब्धि करार दिया है। फल वैज्ञानिक डॉ. आशीष पांडा ने जानकारी दी कि मैदानी जमीन पर इस फल को उगाने का परिणाम उम्मीद से बढ़कर सामने आया है। अभी विनियामक मूल्यांकन और औपचारिक किस्म विमोचन की प्रक्रिया पूरी होनी बाकी है, जिसके बाद किसानों को व्यावसायिक रूप से पौधे बांटे जाएंगे। यदि बड़े पैमाने पर इस बागवानी का विस्तार होता है, तो पारंपरिक फसलों के दायरे से बाहर निकलकर राज्य के किसानों को एक नया और लाभकारी विकल्प मिल जाएगा।\n\nइसका आप पर असर\nबिहार में एवोकाडो की सफल पैदावार से राज्य के बागवानों और किसानों को पारंपरिक फसलों से हटकर करोड़ों की कमाई देने वाली एक नई उच्च-मूल्य वाली फसल का व्यावहारिक विकल्प मिलने जा रहा है।\n\n• भारत में: देश के अन्य मैदानी और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के किसानों के लिए पहाड़ी फसलों को मैदानी इलाकों में उगाने के नए रास्ते खुलेंगे। यह अनुसंधान कृषि विविधीकरण को बढ़ावा देगा।\n• बिहार में: समस्तीपुर और आसपास के जिलों के किसानों को आने वाले समय में व्यावसायिक रूप से पौधे मिलेंगे। इससे राज्य के कृषि बाजार में विदेशी फलों का विकल्प स्थानीय स्तर पर कम कीमत पर उपलब्ध होगा।\n• बाजार और कीमतें: महानगरों के खुदरा बाजारों में 1500 रुपये प्रति किलो तक बिकने वाले इस फल के स्थानीय उत्पादन से उपभोक्ताओं को किफायती दरों पर प्रीमियम फल मिल सकेगा।\n• किसानों की आय: खेत स्तर पर 400 रुपये प्रति किलोग्राम तक का औसत भाव मिलने से किसानों की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आ सकता है।\n• बागवानी तकनीक: जलजमाव वाले मैदानी क्षेत्रों में ड्रिप सिंचाई और ऊंची मेड़ों पर खेती की यह तकनीक अन्य संवेदनशील फसलों के लिए भी मार्गदर्शक बनेगी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. बिहार में एवोकाडो की खेती किस संस्थान ने की है?\nडॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वैज्ञानिकों ने इसकी सफल खेती की है।\n\n2. इस प्रयोग की शुरुआत कब की गई थी?\nपूसा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने सितंबर 2023 में एवोकाडो की खेती का परीक्षण शुरू किया था।\n\n3. किन दो किस्मों का उपयोग किया गया है?\nवैज्ञानिकों ने टाइप-ए किस्म अर्का सुप्रीम के साथ टाइप-बी किस्म अर्का रावी को अंतर-रोपित किया है।\n\n4. बिहार में उगे एवोकाडो के फल का वजन कितना है?\nअर्का सुप्रीम किस्म में करीब 750 से 950 ग्राम तक वजन वाले फल मिले हैं।\n\n5. बाजार में इस फल की कीमत क्या है?\nखेत स्तर पर इसका औसत भाव 400 रुपये प्रति किलोग्राम है, जबकि महानगरों में यह 1500 रुपये तक बिक सकता है।\n\n6. जलजमाव से बचाने के लिए क्या तकनीक अपनाई गई?\nपौधों को समतल जमीन के बजाय ऊंची मेड़ों और क्यारियों पर लगाया गया तथा ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल किया गया।",
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  "category": "व्यापार",
  "publishedAt": "2026-09-05",
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    "एवोकाडो खेती",
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