# गन्ने की फसल में पोक्का बोइंग बीमारी का कहर, एक्सपर्ट्स ने बताए बचाव और छिड़काव के ये जरूरी उपाय

> सहारनपुर में गन्ने की 0238 प्रजाति में पोक्का बोइंग फफूंदी बीमारी तेजी से फैल रही है, जिससे फसल की ग्रोथ रुक जाती है और सड़न पैदा होती है। कृषि एक्सपर्ट डॉक्टर आई.के कुशवाहा ने इससे निपटने के लिए कॉपर सल्फेट और कॉपर ऑक्सिक्लोराइड के छिड़काव की सलाह दी है।

**Type:** article · **Category:** व्यापार · **Published:** 2026-08-04 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/business/ganne-ki-phasala-men-pokka-boinga-bimari-ka-kahara-eksapartsa-ne-batae-bachava-aura-chhirakava-ke-ye-jaruri-upaya-13403 · **Language:** Hindi
**Tags:** गन्ना खेती, पोक्का बोइंग, सहारनपुर कृषि, फसल रोग, कृषि सलाह, गन्ना 0238

सहारनपुर जिला एक प्रमुख गन्ना बेल्ट के रूप में पहचान रखता है, जहां किसान व्यापक स्तर पर गन्ने की विभिन्न किस्मों की खेती करते हैं। हालांकि, बारिश के मौसम में कई प्रकार की बीमारियां इस फसल पर हमला बोल देती हैं, जिससे इसका उत्पादन काफी हद तक प्रभावित होता है और भारी नुकसान उठाना पड़ता है। इनमें सबसे खतरनाक बीमारी पोक्का बोइंग के रूप में सामने आती है, जो असल में एक फफूंदी जनित संक्रमण है। यह रोग न केवल गन्ने के विकास को पूरी तरह से बाधित करता है, बल्कि उसमें अंदरूनी सड़न और गलन की समस्या भी पैदा कर देता है। इस लेख में हम इस बीमारी के मुख्य लक्षणों और इससे सुरक्षित रहने के उपायों पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं।

 

## कौन सी प्रजाति पर होता है सबसे ज्यादा असर
 यह समझना बेहद जरूरी है कि यह फफूंदी संक्रमण गन्ने की किस किस्म को सबसे अधिक निशाना बनाता है। किसानों के बीच प्रचलित 0238 प्रजाति में इस बीमारी का प्रकोप सबसे तेज गति से फैलता है। एक बार यदि इस किस्म के पौधे खेत में लगा दिए जाएं और यह रोग वहां अपनी जड़ें जमा ले, तो इसके फंगस के बीजाणु मिट्टी में ही जीवित रह जाते हैं। इसके परिणामस्वरुप, हर साल उगाई जाने वाली नई फसल में भी इसके लक्षण स्वतः दिखाई देने लगते हैं और किसानों को लगातार नुकसान का सामना करना पड़ता है।

 

## पोक्का बोइंग बीमारी के प्रमुख लक्षण
 इस बीमारी के शुरुआती संकेत जमीन के स्तर से ही नजर आने शुरू हो जाते हैं, लेकिन जैसे ही मानसूनी बारिश शुरू होती है और वातावरण में नमी बढ़ती है, इसके लक्षण पौधे की चोटी पर अत्यंत तेजी से उभर कर सामने आते हैं। इसकी वजह से गन्ने की फसल को कई तरह की हानियां उठानी पड़ती हैं, जैसे कि ऊपरी हिस्से में सड़न पैदा होना, तने का गल जाना, पौधे की लंबाई और मोटाई रुक जाना तथा उसे जरूरी पोषक तत्वों का ठीक से नहीं मिल पाना। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, समय रहते यदि इन लक्षणों की पहचान न की जाए तो खेत की पैदावार बर्बादी के कगार पर पहुंच सकती है।

 

## किस वजह से पनपती है यह फफूंदी
 कृषि विशेषज्ञ डॉक्टर आई.के कुशवाहा ने बताया कि खेतों में गलन जैसी यह विकट समस्या तब सामने आई जब हमारे क्षेत्र में गन्ने की 0238 प्रजाति का चलन बढ़ा, क्योंकि उससे पहले यह बीमारी यहां नहीं देखी जाती थी। पोक्का बोइंग नामक इस रोग का प्रकोप उस समय सर्वाधिक देखा जाता है जब हवा में नमी अधिक हो और हल्की बूंदाबांदी का दौर चल रहा हो। बरसात के दिनों में गन्ने की गोभ या ऊपरी पोरियों में पानी भर जाता है, जिसके कारण फफूंदी को पनपने के लिए अनुकूल वातावरण मिल जाता है और वह अपना असर दिखाना शुरू कर देती है।

 इस हानिकारक फफूंदी को फ़्यूज़ेरियम के नाम से जाना जाता है। यह मुख्य रूप से किसी संक्रमित बीज या पौधे के जरिए खेत में प्रवेश करती है, लेकिन यदि खेत की मिट्टी में पहले से ही संक्रमण मौजूद हो तो भी यह फसल को अपनी चपेट में ले लेती है। इसके लक्षणों में पत्तियों का अजीब तरीके से मुड़ जाना, पौधे के विकास में रुकावट आना, चोटी का हिस्सा अविकसित रहना और उसमें अंदरूनी सड़न पैदा होना शामिल है।

 

## बचाव और छिड़काव के लिए जरूरी कदम
 यह फफूंदी जनित रोग अमूमन उन खेतों में अधिक तादाद में पाया जाता है जहां मिट्टी में कॉपर या तांबे की मात्रा कम होती है। इन लक्षणों के प्रकट होने पर किसानों को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। सबसे पहले खेत की मिट्टी में 250 से 300 ग्राम प्रति बीघा की दर से कॉपर सल्फेट, जिसे आम बोलचाल में नीला थोता कहा जाता है, इसके अलावा 1 किलोग्राम जिंक सल्फेट और फेरस सल्फेट को आपस में अच्छी तरह पीसकर मिला लेना चाहिए। इस मिश्रण को रेत या सूखी मिट्टी के साथ मिलाकर बरसात के मौसम में गन्ने के खेतों में बिखेर देना चाहिए, जिससे इस बीमारी के प्रसार पर रोक लग सके।

 इस उपाय से न केवल बीमारी नियंत्रित होती है बल्कि गन्ने के पत्तों और तनों में एक गहरा हरा रंग भी लौट आता है। इसके अतिरिक्त, कॉपर ऑक्सिक्लोराइड यानी सीओसी और स्टीकर को मिलाकर इसकी 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी के अनुपात में घोल तैयार कर लें और गन्ने की फसल पर इसका छिड़काव करें। यदि किसान भाई 7 से 10 दिन के अंतराल पर इस घोल का डबल छिड़काव कर देते हैं, तो यह बीमारी पूरी तरह से रुक जाती है और फसल सुरक्षित बनी रहती है।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** गन्ने की खेती करने वाले किसानों को मानसूनी सीजन में फफूंदी जनित रोगों से अपनी फसल बचाने के लिए समय पर उचित कीटनाशकों और पोषक तत्वों का छिड़काव करना चाहिए।,**सहारनपुर में:** जिले के गन्ना उत्पादक किसानों, विशेषकर 0238 किस्म की खेती करने वालों को अपनी फसल में पोक्का बोइंग के शुरुआती लक्षणों पर कड़ी नजर रखनी चाहिए।

## सवाल-जवाब

### 1. गन्ने में पोक्का बोइंग बीमारी मुख्य रूप से किस प्रजाति में फैलती है?
यह बीमारी गन्ने की 0238 प्रजाति में सबसे तेजी से फैलती है और इसके बीजाणु मिट्टी में बने रहते हैं।

### 2. पोक्का बोइंग बीमारी के होने का मुख्य कारण क्या है?
यह एक फ़्यूज़ेरियम नामक फफूंदी के कारण होती है जो बरसात के मौसम में नमी और गोभ में पानी भरने पर पनपती है।

### 3. इस बीमारी के क्या प्रमुख लक्षण दिखाई देते हैं?
इसके लक्षणों में पत्तियां मुड़ जाना, पौधे का विकास रुकना, ऊपर का हिस्सा अविकसित रहना और सड़न होना शामिल है।

### 4. मिट्टी में किन तत्वों के प्रयोग से इस बीमारी से बचाव होता है?
जमीन में कॉपर सल्फेट, जिंक सल्फेट और फेरस सल्फेट को रेत में मिलाकर छिड़कने से बचाव होता है।

### 5. फसल पर किस घोल का छिड़काव करने की सलाह दी गई है?
कॉपर ऑक्सिक्लोराइड और स्टीकर की 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

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