जर्मनी में कारोबारी भरोसा जून में सुधरा, IFO इंडेक्स 85.6 पर पहुंचा जर्मनी का IFO बिजनेस क्लाइमेट इंडेक्स जून में बढ़कर 85.6 पर आ गया, जो अनुमान के मुताबिक रहा। मौजूदा हालात का आकलन उम्मीद से बेहतर रहा, जबकि भविष्य की उम्मीदों वाला इंडेक्स अनुमान से थोड़ा पीछे रहा। यूरोज़ोन की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी में कारोबारी माहौल को लेकर भरोसा जून में थोड़ा मजबूत हुआ है। जर्मन IFO इंस्टीट्यूट का बिजनेस क्लाइमेट इंडेक्स बढ़कर 85.6 पर पहुंच गया, जो बाजार के अनुमान के बिल्कुल मुताबिक रहा। मई में यह आंकड़ा 85.0 था, जिसे पहले के 84.9 से बढ़ाकर संशोधित किया गया था। इस इंडेक्स के दो हिस्से होते हैं, और दोनों ने जून में अलग-अलग तस्वीर पेश की। मौजूदा हालात का आकलन उम्मीद से बेहतर कारोबारियों की मौजूदा स्थिति को मापने वाला करंट असेसमेंट इंडेक्स 87 पर रहा। यह 86.4 के अनुमान से ऊपर निकला और पिछली बार के 86.0 के आंकड़े से भी बेहतर रहा। इसका मतलब है कि जर्मन कंपनियां इस वक्त अपने कामकाज की हालत को पहले से ज्यादा अच्छा मान रही हैं। आगे की उम्मीदों में सुधार, पर अनुमान से पीछे आने वाले महीनों को लेकर कारोबारियों की राय दिखाने वाला एक्सपेक्टेशन इंडेक्स भी सुधरकर 84.1 पर आ गया। मई में यह 83.9 था, जिसे पहले के 83.8 से ऊपर संशोधित किया गया था। हालांकि यह आंकड़ा 85.0 के अनुमान से थोड़ा नीचे रह गया। जर्मन अर्थव्यवस्था और यूरो का रिश्ता जर्मनी यूरोज़ोन की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, इसलिए इसका असर सीधे यूरो पर पड़ता है। जर्मनी की आर्थिक सेहत, उसकी GDP, रोजगार और महंगाई के आंकड़े यूरो में भरोसे और स्थिरता को बड़े पैमाने पर तय करते हैं। जब जर्मनी की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है तो यूरो को सहारा मिलता है, और जब वह कमजोर पड़ती है तो यूरो पर दबाव बनता है। कुल मिलाकर, वैश्विक बाजारों में यूरो की ताकत और उसकी छवि गढ़ने में जर्मनी की भूमिका अहम रहती है। पूरे क्षेत्र में जर्मनी एक प्रभावशाली खिलाड़ी है। साल 2009 से 2012 के बीच जब यूरोज़ोन कर्ज संकट से जूझ रहा था, तब कर्ज में डूबे देशों को उबारने के लिए कई स्थिरता कोष बनाने में जर्मनी की भूमिका निर्णायक रही। संकट के बाद बने 'फिस्कल कॉम्पैक्ट' को लागू कराने में भी इसने अगुवाई की, जो सदस्य देशों के बजट को कसने और कर्ज के मामले में लापरवाह देशों पर लगाम लगाने वाले सख्त नियमों का एक सेट था। जर्मनी ने 'वित्तीय स्थिरता' की संस्कृति को आगे बढ़ाया और इसका आर्थिक मॉडल दूसरे यूरोज़ोन देशों के लिए विकास की मिसाल बना। बुंड्स और उनकी यील्ड का गणित बुंड्स जर्मन सरकार की ओर से जारी किए जाने वाले बॉन्ड हैं। दूसरे बॉन्ड की तरह ये भी निवेशक को नियमित ब्याज, यानी कूपन देते हैं और मैच्योरिटी पर पूरी रकम लौटाते हैं। जर्मनी की अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी होने की वजह से बुंड्स को बाकी यूरोपीय सरकारी बॉन्ड के लिए बेंचमार्क माना जाता है। लंबी अवधि के बुंड्स को सुरक्षित और जोखिम रहित निवेश समझा जाता है, क्योंकि इनके पीछे जर्मन राष्ट्र की पूरी साख होती है। यही वजह है कि निवेशक इन्हें सुरक्षित ठिकाना मानते हैं, संकट के समय इनकी कीमत बढ़ती है और अच्छे दौर में घटती है। बुंड यील्ड वह सालाना रिटर्न दिखाती है जो कोई निवेशक इन बॉन्ड को रखकर पा सकता है। कूपन तय रहता है, लेकिन यील्ड बॉन्ड की कीमत में बदलाव के हिसाब से घटती-बढ़ती है, इसलिए इसे रिटर्न का ज्यादा सही पैमाना माना जाता है। जब बुंड की कीमत गिरती है तो कर्ज के अनुपात में कूपन बढ़ जाता है, जिससे यील्ड ऊपर जाती है, और कीमत बढ़ने पर इसका उल्टा होता है। इसीलिए बुंड यील्ड और कीमतें एक-दूसरे की उल्टी दिशा में चलती हैं। बुंडेसबैंक की भूमिका बुंडेसबैंक जर्मनी का केंद्रीय बैंक है। यह जर्मनी में और व्यापक रूप से पूरे क्षेत्र की मौद्रिक नीति लागू करने में अहम भूमिका निभाता है। इसका मकसद कीमतों में स्थिरता रखना, यानी महंगाई को कम और अनुमान के दायरे में बनाए रखना है। यह जर्मनी में भुगतान प्रणाली के सुचारू कामकाज को सुनिश्चित करता है और वित्तीय संस्थानों की निगरानी में भी हिस्सा लेता है। बुंडेसबैंक की छवि एक रूढ़िवादी बैंक की रही है, जो आर्थिक विकास से पहले महंगाई पर काबू पाने को तरजीह देता है। यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ECB) के गठन और उसकी नीतियों को आकार देने में भी इसकी बड़ी भूमिका रही है। इसका आप पर असर इस आंकड़े का असर सीधे आम पाठक की जेब पर नहीं पड़ता, लेकिन यह यूरो और बाजार की दिशा का संकेत देता है। • निवेशकों के लिए: जर्मन कारोबारी भरोसे में सुधार यूरो को सहारा दे सकता है, जिससे यूरो से जुड़े करेंसी और बॉन्ड बाजार में हलचल हो सकती है। • भारत में: यूरोप के साथ कारोबार करने वाली भारतीय कंपनियों और निर्यातकों के लिए यूरो की मजबूती या कमजोरी मायने रखती है, क्योंकि इससे उनकी कमाई और कीमतें प्रभावित होती हैं। सवाल-जवाब 1. जून में IFO बिजनेस क्लाइमेट इंडेक्स कितना रहा? जून में यह इंडेक्स बढ़कर 85.6 पर पहुंच गया, जो बाजार के अनुमान के मुताबिक रहा। 2. मई का आंकड़ा क्या था? मई में यह इंडेक्स 85.0 था, जिसे पहले के 84.9 से बढ़ाकर संशोधित किया गया था। 3. करंट असेसमेंट इंडेक्स में क्या रहा? यह 87 पर रहा, जो 86.4 के अनुमान और पिछली बार के 86.0 के आंकड़े दोनों से बेहतर रहा। 4. एक्सपेक्टेशन इंडेक्स का क्या हाल रहा? यह सुधरकर 84.1 पर आ गया, मई के 83.9 से ऊपर, लेकिन 85.0 के अनुमान से थोड़ा पीछे रहा। 5. जर्मन अर्थव्यवस्था का यूरो पर असर क्यों पड़ता है? जर्मनी यूरोज़ोन की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, इसलिए इसकी मजबूती यूरो को सहारा देती है और कमजोरी उस पर दबाव बनाती है। 6. बुंड्स क्या होते हैं? बुंड्स जर्मन सरकार की ओर से जारी बॉन्ड हैं, जिन्हें यूरोपीय सरकारी बॉन्ड के लिए बेंचमार्क और सुरक्षित निवेश माना जाता है। https://trendkia.com/business/germany-men-karobari-bharosa-juna-men-sudhara-ifo-indeksa-85-6-para-pahuncha-2650 TrendKia — Har trend, sabse pehle.