ग्लोबल बेंचमार्क से क्यों महंगा बिकता है भारतीय बास्केट का कच्चा तेल, जानिए इसके पीछे की वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार के मुकाबले भारतीय बास्केट का कच्चा तेल हमेशा अधिक कीमत पर मिलता है। आइए जानते हैं कि इस बास्केट में कौन-से ग्रेड शामिल हैं और इसका भाव ऊंचा क्यों रहता है। दुनियाभर में कच्चे तेल के दाम अक्सर चर्चा में रहते हैं, लेकिन एक खास पहलू यह है कि भारतीय बास्केट का तेल ग्लोबल मार्केट के कई मानकों से महंगा पड़ता है। बीते 24 अक्टूबर की शाम को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड का भाव 116 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर था, जबकि अक्टूबर के पूरे महीने में भारतीय बास्केट के तेल की औसत कीमत 121 डॉलर प्रति बैरल दर्ज की गई। इस अंतर को देखकर अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या भारतीय बास्केट का तेल दुनिया के बाकी बेंचमार्क के मुकाबले किसी रूप में बेहतर होता है या इसके महंगे होने के पीछे कोई अन्य आर्थिक और तकनीकी कारण छिपे हैं। क्या है भारतीय बास्केट और इसकी गुणवत्ता सबसे पहले यह स्पष्ट होना जरूरी है कि भारतीय बास्केट कोई अलग से निकाला जाने वाला विशेष क्रूड नहीं है, बल्कि यह भारत द्वारा खरीदे जाने वाले कच्चे तेल की मिश्रित कीमत को दर्शाने वाला एक पैमाना या बेंचमार्क है। भारतीय बास्केट में आने वाला तेल अपनी उत्कृष्ट श्रेणी के लिए जाना जाता है। इस क्रूड में दुनिया के कई अन्य विकल्पों की तुलना में सल्फर की मात्रा काफी कम होती है और इसकी समग्र क्वालिटी को बहुत ऊंचा माना जाता है। रिफाइनरी के लिहाज से भी कम सल्फर वाले इस तेल को प्रोसेस करना आसान होता है और इससे अधिक मात्रा में ईंधन प्राप्त होता है। भारतीय बास्केट में किन क्रूड ग्रेड्स का होता है इस्तेमाल इस बास्केट में मुख्य तौर पर दो तरह के प्रमुख ग्रेड शामिल होते हैं, जिनमें ब्रेंट क्रूड की मात्रा सबसे अधिक होती है। अक्टूबर के महीने में भारत ने जो तेल खरीदा, उसमें 65.27 फीसदी हिस्सा ब्रेंट क्रूड का था, जबकि शेष 34.73 फीसदी हिस्सेदारी ओमान-दुबई वाले ग्रेड की रही थी। ओमान-दुबई क्रूड को एशियाई बाजार में उपयोग होने वाले अहम मानकों में गिना जाता है, जिसकी कीमत आमतौर पर कम होती है और इसमें ब्रेंट की तुलना में सल्फर की मात्रा अधिक पाई जाती है। बाजार की मांग और उपलब्धता के हिसाब से भारतीय बास्केट में कभी ब्रेंट तो कभी ओमान-दुबई ग्रेड का अनुपात ऊपर-नीचे होता रहता है। भारतीय बास्केट के महंगे होने के मुख्य कारण भारतीय बास्केट की कीमत अधिक रहने के पीछे कई ठोस कारण काम करते हैं। सबसे बड़ा कारण इसमें ब्रेंट क्रूड की भारी हिस्सेदारी है, जिसे दुनिया का सबसे महंगा तेल माना जाता है। जब इस उच्च श्रेणी के क्रूड का अनुपात बास्केट में बढ़ता है, तो कुल औसत कीमत स्वतः ऊपर चली जाती है। इसके अलावा, पश्चिम एशिया में लगातार बने तनाव, समुद्री मार्गों में आने वाली बाधाओं और माल ढुलाई के दौरान बीमा की लागत बढ़ने से ग्लोबल मार्केट में तेल के दाम और अधिक भड़क जाते हैं। भारत केवल पारंपरिक बेंचमार्क से ही नहीं, बल्कि रूस जैसे देशों से रियायती दरों पर भी क्रूड ऑयल की खरीद करता है। इसके बावजूद, रूस से आने वाले तेल की लंबी दूरी और ढुलाई की महंगी लागत के कारण भारतीय बास्केट का कुल खर्च बढ़ जाता है। इसके साथ ही, विदेशी मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के कमजोर होने या उसके मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर भी बास्केट की खरीद लागत पर पड़ता है। ब्रेंट क्रूड हल्का होने के कारण पेट्रोल और डीजल का ज्यादा उत्पादन देता है, लेकिन कीमतों में तेजी आने पर बेहतर ग्रेड होने के कारण इसका दाम सबसे ज्यादा उछलता है। इसका आप पर असर कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का सीधा असर देश में पेट्रोल और डीजल के खुदरा दामों पर पड़ सकता है, जिससे रोजमर्रा की आवाजाही और ढुलाई महंगी हो जाती है। • भारत में: भारतीय बास्केट का महंगा होना देश के आयात बिल को बढ़ाता है, जिससे सरकार और तेल विपणन कंपनियों पर वित्तीय दबाव आ जाता है। अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी का असर परिवहन और मालभाड़े के जरिए आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ता है। • घरेलू बजट: ईंधन के दाम बढ़ने से कृषि उत्पादों, औद्योगिक वस्तुओं और दैनिक उपभोग की चीजों के दाम भी प्रभावित होते हैं, जिससे महंगाई दर ऊपर जा सकती है। • विनिमय दर: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने पर तेल आयात का खर्च और अधिक बढ़ जाता है, जिसका असर देश की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। • रिफाइनरी लागत: बेहतर गुणवत्ता और कम सल्फर वाले क्रूड के महंगा होने से रिफाइनिंग और उत्पादन से जुड़ी आनुषंगिक लागतों में भी बदलाव आता है। ऐसा क्यों हुआ भारतीय बास्केट के महंगे होने की मुख्य वजह इसमें प्रीमियम ब्रेंट क्रूड की अधिक हिस्सेदारी, पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक तनाव और समुद्री माल ढुलाई के बढ़ते खर्च हैं। • ब्रेंट क्रूड की हिस्सेदारी: बास्केट में 65 प्रतिशत से अधिक हिस्सा महंगे ब्रेंट क्रूड का होता है, जो अपने हल्केपन और कम सल्फर के कारण अन्य ग्रेड्स की तुलना में अधिक महंगा बिकता है। • भू-राजनीतिक तनाव: पश्चिम एशिया में संघर्ष और समुद्री रास्तों में आने वाली बाधाओं के कारण वैश्विक स्तर पर शिपिंग, बीमा और परिवहन लागत बढ़ गई है। • मुद्रा विनिमय दर: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में गिरावट आने से भारत के लिए विदेशी तेल खरीदना अधिक महंगा हो जाता है। • लंबी दूरी का परिवहन: रियायती दरों पर रूस से खरीदे जाने वाले तेल पर लगने वाला भारी ढुलाई शुल्क भी कुल औसत लागत को बढ़ाने में भूमिका निभाता है। सवाल-जवाब 1. भारतीय बास्केट क्या है? भारतीय बास्केट कोई अलग प्रकार का तेल नहीं है, बल्कि यह भारत द्वारा आयात किए जाने वाले कच्चे तेल की मिश्रित औसत कीमत को दर्शाने वाला एक बेंचमार्क है। 2. अक्टूबर में भारतीय बास्केट के तेल की औसत कीमत क्या रही? अक्टूबर के दौरान भारतीय बास्केट के तेल की औसत कीमत 121 डॉलर प्रति बैरल दर्ज की गई। 3. भारतीय बास्केट में कौन-से दो मुख्य क्रूड ग्रेड शामिल हैं? इसमें मुख्य तौर पर ब्रेंट क्रूड और ओमान-दुबई ग्रेड शामिल होते हैं। 4. अक्टूबर महीने में बास्केट में ब्रेंट क्रूड की हिस्सेदारी कितनी थी? अक्टूबर में खरीदे गए तेल में ब्रेंट क्रूड की हिस्सेदारी 65.27 फीसदी थी। 5. भारतीय बास्केट हमेशा महंगा क्यों मिलता है? इसमें महंगे ब्रेंट क्रूड की अधिक हिस्सेदारी, समुद्री ढुलाई और बीमा की बढ़ती लागत तथा रुपये के मुकाबले डॉलर के मजबूत होने के कारण यह महंगा रहता है। 6. क्या भारत सिर्फ ब्रेंट और ओमान-दुबई क्रूड ही खरीदता है? नहीं, भारत रूस जैसे देशों से रियायती दरों पर भी कच्चे तेल की खरीद करता है। https://trendkia.com/business/global-benchmark-se-kyon-mehanga-bikta-hai-bhar-bharatiya-basket-ka-kaccha-tel-51410 TrendKia — Har trend, sabse pehle.