# गोवा के डॉ संगम कुराडे ने बाढ़ की तबाही के बाद खड़ा किया 117 करोड़ का मशरूम साम्राज्य

> मापुसा के बाजारों में कभी मशरूम बेचने के लिए भटकने वाले डॉ संगम कुराडे ने आपदा से उबरते हुए अपनी कंपनी का कारोबार 117 करोड़ रुपये के पार पहुंचा दिया है।

**Type:** article · **Category:** व्यापार · **Published:** 2026-11-07 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/business/goa-ke-dr-sangam-kurade-ne-barha-ki-tabahi-ke-bada-khara-kiya-117-karora-ka-masharuma-samrajya-57425 · **Language:** Hindi
**Tags:** संगम कुराडे, मशरूम की खेती, एग्रीप्रेन्योर, जुरी फूड्स, गोवा बिजनेस, सफलता की कहानी

गोवा की गलियों में जब तीन दशक पहले एक युवा वैज्ञानिक ताजे मशरूम लेकर निकला था, तब स्थानीय बाजार उसे अपनाने के लिए तैयार नहीं थे। उस समय भारतीय खानपान में मशरूम को मुख्य सब्जी के रूप में कम ही स्वीकार किया जाता था। दुकानदार टोकरियों में रखे मशरूम को अपनी दुकानों पर जगह देने से मना कर देते थे और ग्राहक इसे खरीदने में हिचकिचाते थे। इस कठिन शुरुआत के बावजूद डॉ. संगम कुराडे ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। उन्होंने मुश्किलों को चुनौती मानकर स्वीकार किया और आज उसी दृढ़ संकल्प के बल पर 117 करोड़ रुपये से अधिक के सालाना कारोबार वाला विशाल कृषि व्यवसाय खड़ा कर दिया है।

## मापुसा की गलियों से शुरुआत और शुरुआती अड़चनें
फूड साइंस एंड टेक्नोलॉजी में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ. संगम कुराडे ने वर्ष 1994 में मशरूम की खेती करने का फैसला किया। उनका शैक्षणिक अनुभव उन्हें बताता था कि मशरूम केवल एक साधारण मौसमी उपज नहीं है, बल्कि इसे एक सालभर चलने वाले आधुनिक औद्योगिक मॉडल में बदला जा सकता है। शुरुआती दौर में जब वह ताजे मशरूम टोकरियों में भरकर गोवा के मापुसा बाजार में दुकानों के चक्कर काटते थे, तब बहुत कम बिक्री होती थी। लोगों में इस उत्पाद को लेकर जानकारी का अभाव था। ऐसे में उन्होंने तकनीक सीखने के साथ साथ स्थानीय स्तर पर उपभोक्ताओं के बीच मशरूम की स्वीकार्यता और मांग पैदा करने का काम भी शुरू किया।

शुरुआती संघर्षों के दौर में उन्हें यूएसएआईडी से करीब 1.25 करोड़ रुपये का वित्तीय अनुदान मिला। इस आर्थिक सहायता ने उनके काम को गति दी और उन्होंने अपने फार्म के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया। लगातार प्रयासों के दम पर उनके फार्म में प्रतिदिन एक टन मशरूम का उत्पादन होने लगा था, जिससे उनका व्यवसाय स्थिरता की ओर बढ़ता दिखने लगा।

## तालपोना नदी की विनाशकारी बाढ़ और तीन महीने में वापसी
जब कारोबार रफ्तार पकड़ रहा था, तभी प्रकृति ने उनकी सबसे कठिन परीक्षा ली। तारीख थी 2 अक्टूबर 2009, जब तालपोना नदी में आई भयानक बाढ़ ने उनकी पूरी उत्पादन यूनिट को जलमग्न कर दिया। बीते 15 वर्षों की कड़ी मेहनत, तैयार ढांचा और उपकरण पलक झपकत ही मलबे के ढेर में बदल गए। किसी भी साधारण उद्यमी के लिए यह सब कुछ समेटकर पीछे हट जाने का समय हो सकता था, लेकिन डॉ. कुराडे ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने नुकसान पर आंसू बहाने के बजाय अपनी यूनिट को दोबारा खड़ा करने की ठानी। अपनी अटूट इच्छाशक्ति के सहारे उन्होंने महज तीन महीनों के भीतर पूरी उत्पादन इकाई को फिर से चालू कर दिया।

## उसगांव में 'एग्रीफैक्चर' मॉडल और आधुनिक विस्तार
बाढ़ के बाद जोखिम को पूरी तरह खत्म करने के लिए डॉ. कुराडे ने अपने काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने अपने कारोबार को सुरक्षित और तकनीकी रूप से उन्नत बनाने के लिए गोवा के उसगांव में एक नया केंद्र स्थापित किया। यहां उन्होंने 'एग्रीफैक्चर' का सिद्धांत लागू किया, जिसका सीधा मतलब है खेती के भीतर फैक्ट्री जैसी तकनीकी सटीकता, कठोर मानक और प्रक्रियाएं लागू करना।

इस मॉडल के तहत पूरी तरह से नियंत्रित इनडोर वातावरण तैयार किया गया, जहां तापमान, नमी और खाद की गुणवत्ता को वैज्ञानिक रूप से प्रबंधित किया जाता है। मौसम की अनिश्चितताओं से बेपरवाह यह प्रणाली सालभर लगातार उत्पादन सुनिश्चित करती है। आज इस उपक्रम के पास 1.2 लाख वर्ग मीटर का विशाल ग्रोइंग एरिया मौजूद है, जहां से रोजाना लगभग 28,000 किलोग्राम यानी 28 टन मशरूम का उत्पादन किया जाता है। सामान्य बटन मशरूम से शुरू हुआ यह सफर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर की महंगी किस्मों तक पहुंच चुका है, जिसमें शिटाके, पोर्टोबेलो और किंग ऑयस्टर जैसी किस्में शामिल हैं।

## वित्तीय वृद्धि और 117 करोड़ रुपये का मील का पत्थर
डॉ. कुराडे की कंपनी जुरी फूड्स एंड फार्म्स प्राइवेट लिमिटेड ने वित्तीय मोर्चे पर भी लगातार मजबूत प्रदर्शन किया है। वित्तीय वर्ष 2014 में कंपनी का राजस्व लगभग 6.10 करोड़ रुपये दर्ज किया गया था। तकनीक और मांग के तालमेल से यह आंकड़ा वित्तीय वर्ष 2017 में बढ़कर 19.48 करोड़ रुपये और वित्तीय वर्ष 2019 में 33.23 करोड़ रुपये पर पहुंच गया।

इसके बाद कंपनी ने अपनी रफ्तार और तेज की। वित्तीय वर्ष 2024 में जुरी फूड्स एंड फार्म्स का कुल कारोबार 85.29 करोड़ रुपये तक जा पहुंचा। वित्तीय वर्ष 2025 में कंपनी का समेकित राजस्व 37 प्रतिशत की प्रभावशाली वृद्धि के साथ 117 करोड़ रुपये के पार निकल गया। इस दौरान कंपनी ने 20.21 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा दर्ज करके यह साबित कर दिया कि आधुनिक कृषि तकनीक और दृढ़ संकल्प के साथ खेती को एक बेहद मुनाफे वाले उद्योग में बदला जा सकता है।

## इसका आप पर असर
यह सफलता दर्शाती है कि वैज्ञानिक तरीकों और आधुनिक तकनीक को अपनाकर भारतीय किसान पारंपरिक खेती से कहीं अधिक मुनाफा कमा सकते हैं।

- **किसानों और उद्यमियों के लिए:** यह मॉडल साबित करता है कि नियंत्रित वातावरण वाली इनडोर खेती से मौसमी जोखिमों से बचा जा सकता है। किसान आधुनिक तकनीकों जैसे सटीक तापमान और नमी नियंत्रण को अपनाकर पूरे साल स्थिर आय प्राप्त कर सकते हैं।
- **गोवा और स्थानीय बाजार में:** स्थानीय स्तर पर उच्च गुणवत्ता वाले मशरूम की उपलब्धता बढ़ने से बाहरी आपूर्ति पर निर्भरता घटी है। इसने राज्य में कोल्ड चेन, लॉजिस्टिक्स और कृषि प्रसंस्करण के क्षेत्र में स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं।
- **उपभोक्ताओं के लिए:** बाजार में बटन के साथ-साथ शिटाके और पोर्टोबेलो जैसी विदेशी किस्मों की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित हुई है। इससे उपभोक्ताओं को उचित दामों पर ताजी और पौष्टिक उपज आसानी से मिल पा रही है।
- **कृषि क्षेत्र में निवेश:** यह यात्रा दर्शाती है कि फूड प्रोसेसिंग और नियंत्रित खेती में शुरुआती अनुदान और पूंजीगत निवेश बड़ा रिटर्न दे सकते हैं। वित्तीय संस्थान अब आधुनिक कृषि परियोजनाओं को कर्ज देने में अधिक भरोसा दिखा सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
डॉ संगम कुराडे की यह सफलता उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रतिकूल परिस्थितियों में तुरंत निर्णय लेने की क्षमता और तकनीकी नवाचार के कारण संभव हुई।

- **शुरुआती विफलता से सबक:** जब दुकानदारों ने मशरूम बेचने से इनकार किया, तो उन्होंने हार मानने के बजाय उपभोक्ताओं को जागरूक करने और बाजार में मांग तैयार करने का फैसला किया। उन्होंने फूड साइंस की अपनी शिक्षा का उपयोग करके यह समझा कि मशरूम को आधुनिक उद्योग का रूप कैसे दिया जाए।
- **बाढ़ की तबाही के बाद तकनीकी बदलाव:** अक्टूबर 2009 में तालपोना नदी की बाढ़ में 15 साल की मेहनत डूबने के बाद उन्होंने खुले खेतों के बजाय उसगांव में सुरक्षित इनडोर यूनिट स्थापित की। इस कदम ने उनके पूरे ढांचे को प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित कर दिया।
- **एग्रीफैक्चर मॉडल का क्रियान्वयन:** उन्होंने खेती में औद्योगिक सटीकता लाकर तापमान, नमी और खाद की गुणवत्ता को पूरी तरह नियंत्रित किया। इससे मौसम पर निर्भरता खत्म हो गई और उत्पादन बढ़कर 28 टन प्रतिदिन तक पहुंच गया।
- **उत्पाद विविधता और वित्तीय अनुशासन:** उन्होंने केवल सामान्य बटन मशरूम तक सीमित रहने के बजाय शिटाके, पोर्टोबेलो और किंग ऑयस्टर जैसी उच्च मूल्य वाली किस्मों को शामिल किया, जिससे कंपनी का राजस्व वित्तीय वर्ष 2025 में 117 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया।

## सवाल-जवाब

### 1. डॉ संगम कुराडे ने मशरूम की खेती की शुरुआत कब की थी?
डॉ संगम कुराडे ने फूड साइंस एंड टेक्नोलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद वर्ष 1994 में मशरूम की खेती शुरू की थी।

### 2. साल 2009 में उनके फार्म को क्या नुकसान हुआ था?
2 अक्टूबर 2009 को तालपोना नदी में आई भीषण बाढ़ से उनकी पूरी यूनिट नष्ट हो गई थी और 15 साल का ढांचा मलबे में तब्दील हो गया था।

### 3. डॉ कुराडे के फार्म में रोजाना कितना मशरूम पैदा होता है?
वर्तमान में उनके फार्म में 1.2 लाख वर्ग मीटर के क्षेत्र में प्रतिदिन 28,000 किलोग्राम यानी 28 टन मशरूम का उत्पादन होता है।

### 4. वित्तीय वर्ष 2025 में कंपनी का कुल कारोबार और मुनाफा कितना रहा?
वित्तीय वर्ष 2025 में जुरी फूड्स एंड फार्म्स का राजस्व 37 प्रतिशत बढ़कर 117 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया और शुद्ध मुनाफा 20.21 करोड़ रुपये दर्ज हुआ।

### 5. फार्म में कौन-कौन सी मशरूम की किस्में उगाई जाती हैं?
फार्म में सामान्य बटन मशरूम के अलावा शिटाके, पोर्टोबेलो और किंग ऑयस्टर जैसी महंगी विदेशी किस्में उगाई जाती हैं।

## प्रेरणा और सबक
डॉ संगम कुराडे का सफर सिखाता है कि भीषण तबाही के बाद भी सही योजना और मजबूत इच्छाशक्ति से सफलता की नई इबारत लिखी जा सकती है।

- **संकट को नई दिशा बनाएं:** बाढ़ में 15 साल की मेहनत बर्बाद होने के बाद उन्होंने तीन महीने में सब कुछ दोबारा शुरू किया। जीवन में जब सब कुछ बिखर जाए, तो वह पुराने ढर्रे को छोड़कर अधिक सुरक्षित तकनीक अपनाने का सही अवसर होता है।
- **अस्वीकृति से निराश न हों:** बाजार में दुकानदारों द्वारा भगाए जाने के बावजूद उन्होंने काम नहीं रोका। जब दुनिया आपके विचार को नकार दे, तब बाजार को शिक्षित करना और धैर्य रखना ही सफलता की पहली सीढ़ी बनता है।
- **शिक्षा को जमीन पर उतारें:** फूड साइंस में अपनी डिग्री का इस्तेमाल उन्होंने केवल नौकरी खोजने के लिए नहीं, बल्कि पारंपरिक खेती में तकनीकी बदलाव लाने के लिए किया। अपने ज्ञान को व्यावहारिक धरातल पर उतारना ही बड़ा प्रभाव पैदा करता है।
- **निरंतर सुधार और नवाचार:** केवल बुनियादी उत्पादों पर निर्भर न रहकर समय के साथ शिटाके और पोर्टोबेलो जैसे नए विकल्पों को जोड़ना व्यवसाय को बड़ा बनाता है। बाजार की जरूरतों के साथ खुद को बदलना ही स्थायी विकास का आधार है।

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