गोबर और मिट्टी के दीयों से बालोद की महिला समूह ने शुरू की खास दीवाली तैयारी, 40 हजार रुपये तक की अतिरिक्त आय छत्तीसगढ़ के बालोद में चाहत बिहान स्व-सहायता समूह की 30 महिलाएं पर्यावरण-अनुकूल दीये और मोमबत्तियां बनाकर दीवाली पर स्वावलंबन की राह बना रही हैं। दीपावली की आहट के साथ ही बाजारों में त्योहार की हलचल तेज हो चुकी है, और इसी माहौल के बीच बालोद जिले के ग्रामीण अंचल की महिलाएं अपनी मेहनत से आत्मनिर्भरता की अनूठी कहानी लिख रही हैं। चाहत बिहान स्व-सहायता समूह से जुड़ी ग्रामीण महिलाएं इस त्योहारी सीजन को पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक मजबूती का जरिया बना रही हैं। अपने हाथों से तैयार किए गए मिट्टी के पारंपरिक दीयों, गाय के गोबर से बने इको-फ्रेंडली दीयों और घर पर बनी विशेष मोमबत्तियों के जरिए इन महिलाओं ने रोशनी के पर्व को एक नया आयाम दिया है। इन उत्पादों को और भी लुभावना बनाने के लिए महिलाओं ने उन्हें चटख और सुंदर रंगों से सजाया है, जिससे बाजार में इनकी मांग लगातार बढ़ रही है। नवरात्रि से ही शुरू हो गया था निर्माण कार्य त्योहारी सीजन में मांग को पूरा करने के लिए समूह से जुड़ी महिलाओं ने काफी पहले ही अपनी तैयारी शुरू कर दी थी। समूह की सक्रिय सदस्य रवीना साहू ने जानकारी दी कि दीयों के निर्माण की रूपरेखा और काम नवरात्रि के समय से ही आरंभ कर दिया गया था। इस पूरे उपक्रम में लगभग 30 महिलाएं एक साथ मिलकर काम कर रही हैं। वे मिट्टी को गूंधने, दीयों को आकार देने, गोबर से पर्यावरण-अनुकूल दीये तैयार करने और घर में मोमबत्तियां ढालने के काम में जुटी हुई हैं। यह कोई पहला अवसर नहीं है, बल्कि यह दल पिछले तीन वर्षों से लगातार हर दीवाली पर यह काम कर रहा है। हर वर्ष जैसे ही त्योहार नजदीक आता है, इन हस्तनिर्मित सामग्रियों की मांग तेजी से बढ़ने लगती है, जो इन ग्रामीण महिलाओं को घर के कामकाज के साथ एक बेहतर अतिरिक्त आमदनी जुटाने का मजबूत अवसर देती है। किफायती दाम और पर्यावरण संरक्षण का तालमेल समूह ने अपने उत्पादों का मूल्य निर्धारण करते समय सामान्य परिवारों के बजट का विशेष ध्यान रखा है, ताकि हर तबके का खरीदार आसानी से इन्हें अपना सके। बिक्री मूल्य के अनुसार मिट्टी से बने 5 खूबसूरत दीयों का सेट 50 रुपये में उपलब्ध कराया जा रहा है। वहीं गाय के गोबर से तैयार किए गए 4 सजे-धजे दीयों की कीमत भी 50 रुपये रखी गई है। इसके अलावा महिलाओं द्वारा तैयार की गई आकर्षक होममेड कैंडल्स और मोमबत्तियों की श्रृंखला 100 रुपये से लेकर 120 रुपये के दायरे में बेची जा रही है। गोबर के दीयों को खास तौर पर विविध रंगों से सजाया गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य लोगों को रासायनिक और प्लास्टिक कचरे से दूर कर पारंपरिक और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों की ओर प्रेरित करना है। कलेक्ट्रेट और सरकारी परिसरों तक सीधी बिक्री अपने उत्पादों की बिक्री के लिए यह महिला समूह केवल सामान्य स्थानीय दुकानों या फुटपाथ बाजार पर आश्रित नहीं है। बाजार की पहुंच बढ़ाने के लिए महिलाओं ने एक सुविचारित रणनीति अपनाई है। वे बालोद के सामान्य बाजार के साथ-साथ कलेक्ट्रेट परिसर, जिला कार्यालय, तहसील कार्यालय और जनपद पंचायत कार्यालय जैसे प्रमुख प्रशासनिक भवनों में भी स्टॉल लगाकर सीधी बिक्री कर रही हैं। सरकारी दफ्तरों में आने-जाने वाले अधिकारियों, कर्मचारियों और आम नागरिकों तक सीधे पहुंचने से बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो गई है। इससे महिलाओं को अपनी बनाई वस्तुओं का पूरा मूल्य मिल रहा है और उनके काम को जिले भर में एक नई पहचान भी हासिल हो रही है। त्योहारी सीजन में 40 हजार रुपये तक की अतिरिक्त कमाई दीपावली के इस छोटे से कारोबारी सीजन में समूह की मेहनत बड़े वित्तीय लाभ में बदलती है। रवीना साहू के अनुसार, त्योहार के कुछ ही दिनों के भीतर समूह को लगभग 40 हजार रुपये तक की अतिरिक्त शुद्ध आय हो जाती है। यह आमदनी ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक तौर पर सशक्त और अपने पैरों पर खड़े होने में बड़ा संबल प्रदान कर रही है। स्थानीय स्तर पर सुलभ संसाधनों, गाय के गोबर और पारंपरिक मिट्टी की बदौलत महिलाएं ऐसे उत्पाद बना रही हैं, जो न सिर्फ बाजार की मांग पूरी करते हैं बल्कि पर्यावरण को भी सुरक्षित रखते हैं। इस प्रकार चाहत बिहान समूह की महिलाएं दीवाली पर केवल दूसरों के घरों को रोशन करने का साधन नहीं दे रहीं, बल्कि अपने परिवारों के जीवन में भी आर्थिक आत्मनिर्भरता का नया उजाला फैला रही हैं। इसका आप पर असर यह पहल ग्रामीण महिलाओं की आय बढ़ाने के साथ-साथ आम नागरिकों को पर्यावरण के अनुकूल विकल्प उपलब्ध कराती है। • भारत में: यह मॉडल साबित करता है कि त्योहारों के दौरान स्थानीय कचरे और प्राकृतिक संसाधनों से टिकाऊ उत्पाद बनाए जा सकते हैं। देश भर के उपभोक्ता रासायनिक सामानों के स्थान पर ऐसे हस्तशिल्प को प्राथमिकता देकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा दे सकते हैं। • बालोद और छत्तीसगढ़ में: स्थानीय निवासियों को कलेक्ट्रेट, तहसील और जनपद कार्यालयों में सीधे किफायती दरों पर इको-फ्रेंडली दीये खरीदने की सुविधा मिल रही है। 50 रुपये में 4 से 5 दीये खरीदकर नागरिक पर्यावरण प्रदूषण रोकने के साथ 30 स्थानीय महिलाओं की सीधी आर्थिक मदद कर सकते हैं। • उत्पादकों और समूहों के लिए: स्व-सहायता समूहों के लिए यह साबित करता है कि सरकारी कार्यालयों में सीधी स्टॉल व्यवस्था बिचौलियों से बचाती है। इससे समूह को त्योहारी सीजन में 40 हजार रुपये तक की ठोस अतिरिक्त बचत हासिल हो रही है। • पर्यावरण संरक्षण: गोबर और मिट्टी के रंगीन दीये जलने के बाद पूरी तरह जैविक खाद में बदल जाते हैं। इससे त्योहार के बाद शहरों और कस्बों में प्लास्टिक व रासायनिक कचरे का जमाव नहीं होता। ऐसा क्यों हुआ दीपावली के दौरान बढ़ती सजावटी मांग, पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता और ग्रामीण महिलाओं की आय बढ़ाने की जरूरत ने इस पहल को संभव बनाया। • सीधे कारण: त्योहारी सीजन में मिट्टी और गोबर से बने प्राकृतिक दीयों की मांग में भारी इजाफा होता है। समूह की महिलाओं ने इस बाजार अवसर का लाभ उठाने के लिए नवरात्रि से ही उत्पादन शुरू कर दिया। • सुलभ स्थानीय संसाधन: मिट्टी और गाय का गोबर ग्रामीण क्षेत्रों में बिना किसी बड़े वित्तीय निवेश के आसानी से उपलब्ध हो जाता है। इन स्थानीय कच्चे मालों को रंगों और मोमबत्तियों के संयोजन से आकर्षक मूल्यवान उत्पादों में बदल दिया गया। • विगत वर्षों की सफलता: यह समूह पिछले तीन वर्षों से लगातार दीवाली पर इन उत्पादों का निर्माण और सफल विपणन कर रहा है। पहले के सकारात्मक अनुभवों और नियमित ग्राहक आधार ने इस वर्ष भी महिलाओं को उत्पादन जारी रखने का हौसला दिया। • सीधी बिक्री व्यवस्था: तहसील, जनपद और कलेक्ट्रेट परिसरों में स्टॉल लगाने की अनुमति मिलने से महिलाओं को सीधा बाजार मिल सका। बिचौलियों की गैरमौजूदगी ने इस कारोबार को महिलाओं के लिए तुरंत मुनाफेदार बना दिया। सवाल-जवाब 1. बालोद में कौन सा समूह इको-फ्रेंडली दीये बना रहा है? बालोद जिले का चाहत बिहान महिला स्व-सहायता समूह इन इको-फ्रेंडली दीयों और मोमबत्तियों का निर्माण कर रहा है। 2. इस दीया निर्माण कार्य में कितनी महिलाएं जुड़ी हुई हैं? इस पूरे काम में समूह की लगभग 30 महिलाएं मिलकर उत्पाद तैयार कर रही हैं। 3. दीये और मोमबत्तियों की कीमतें क्या तय की गई हैं? मिट्टी के 5 दीये 50 रुपये में, गोबर के 4 दीये 50 रुपये में और मोमबत्तियां 100 से 120 रुपये में मिल रही हैं। 4. महिलाएं अपने उत्पाद किन जगहों पर बेच रही हैं? वे बालोद बाजार के अलावा कलेक्ट्रेट, जिला कार्यालय, तहसील और जनपद पंचायत कार्यालय परिसरों में सीधे उत्पाद बेच रही हैं। 5. दीपावली सीजन में इस काम से समूह को कितनी आमदनी होती है? समूह की महिलाओं को इस त्योहारी सीजन के दौरान करीब 40 हजार रुपये तक की अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होती है। 6. यह समूह कितने समय से इस काम को कर रहा है? चाहत बिहान समूह की महिलाएं पिछले तीन वर्षों से लगातार दीपावली पर यह काम कर रही हैं। प्रेरणा और सबक बालोद के चाहत बिहान समूह की महिलाओं ने सीमित साधनों और सामूहिक शक्ति के दम पर आत्मनिर्भरता का प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। • शुरुआती योजना और समय प्रबंधन: मांग आने से पहले तैयारी शुरू करना सफलता की पहली सीढ़ी है। महिलाओं ने दीवाली की बिक्री के लिए नवरात्रि से ही काम शुरू कर समय का सदुपयोग किया। • स्थानीय संसाधनों का मूल्य संवर्धन: गोबर और सामान्य मिट्टी जैसी मुफ्त अथवा सस्ती चीजों को रचनात्मकता और रंगाई से आकर्षक बाजार उत्पाद बनाया जा सकता है। साधारण वस्तुओं में मूल्य जोड़ना ही उद्यमिता की पहचान है। • सामूहिक सहयोग की शक्ति: 30 महिलाओं ने मिलकर एक साथ काम किया, जिससे बड़ा उत्पादन लक्ष्य संभव हुआ। समूह में काम करने से जोखिम घटता है और उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। • स्मार्ट मार्केटिंग और सीधी बिक्री: अपने उत्पाद बेचने के लिए केवल पारंपरिक बाजार के भरोसे न रहकर सरकारी कार्यालयों तक पहुंच बनाई गई। बिचौलियों को हटाकर ग्राहकों से सीधा संपर्क स्थापित करना अधिक लाभकारी साबित होता है। https://trendkia.com/business/gobara-aura-mitti-ke-diyon-se-balod-ki-mahila-samuha-ne-shuru-ki-khasa-divali-taiyari-40-hajara-rupaye-taka-ki-atirikta-aya-56250 TrendKia — Har trend, sabse pehle.