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  "type": "article",
  "title": "गोल्ड लोन बने भारत के सिक्योरिटाइजेशन बाजार के सबसे बड़े खिलाड़ी, वाहन लोन को छोड़ा पीछे",
  "summary": "अप्रैल से जून तिमाही में गोल्ड लोन सबसे बड़ा सिक्योरिटाइज्ड एसेट क्लास बन गया और उसने वाहन लोन को पीछे छोड़ दिया। इस दौरान कुल जारी सौदे 22 प्रतिशत बढ़कर करीब 60,000 करोड़ रुपये पर पहुंच गए।",
  "content": "इस साल भारत के वित्तीय बाजारों में सोने ने सिर्फ चमक ही नहीं बिखेरी, बल्कि एक बड़ा उलटफेर भी कर दिया है। मौजूदा वित्त वर्ष की अप्रैल से जून तिमाही में सोने के बदले दिए गए कर्ज यानी गोल्ड लोन सबसे बड़ा सिक्योरिटाइज्ड एसेट क्लास बन गए हैं। इन्होंने उस वाहन लोन को पीछे छोड़ दिया, जो लंबे समय से इस क्षेत्र में सबसे आगे रहता था। सोमवार को आई क्रिसिल रेटिंग्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस तिमाही में कुल सिक्योरिटाइजेशन सौदे पिछले साल के मुकाबले 22 प्रतिशत बढ़कर करीब 60,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गए।\n\nआखिर सिक्योरिटाइजेशन होता क्या है\nसीधे शब्दों में समझें तो सिक्योरिटाइजेशन कर्ज देने वाली संस्थाओं के लिए अपने लोन को नकदी में बदलने का एक तरीका है। कोई भी लेंडर पहले से बांटे गए कर्ज को एक साथ बंडल करके निवेशकों को बेच देता है। इससे जो पैसा आता है, वह वापस लेंडर के पास पहुंच जाता है और उसकी पूंजी खुल जाती है, जिसे वह नए कर्ज बांटने में लगा सकता है। क्रिसिल का कहना है कि इस तिमाही में इतने मजबूत वॉल्यूम इस बात का संकेत हैं कि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां यानी NBFC अब पहले से कहीं ज्यादा इस तरीके पर निर्भर हो रही हैं। कर्ज की मांग मजबूत बनी रही और निवेशक भी इन पैकेज किए गए एसेट्स को लगातार खरीदते रहे।\n\nवाहन लोन को पछाड़ा गोल्ड लोन ने\nसबसे बड़ा बदलाव एसेट्स के मिश्रण में आया है। पहली तिमाही में कुल सिक्योरिटाइजेशन वॉल्यूम में गोल्ड लोन की हिस्सेदारी करीब 31 प्रतिशत रही, जो इसे शीर्ष पर पहुंचाने के लिए काफी थी। वहीं वाहन लोन की हिस्सेदारी घटकर करीब 26 प्रतिशत रह गई। क्रिसिल ने इस गिरावट की वजह एक बड़े ओरिजिनेटर की ओर से कम सौदे जारी किए जाने को बताया। खास बात यह रही कि तिमाही के 98 प्रतिशत से ज्यादा सौदे बैंकों के बजाय NBFC की ओर से आए, जो दिखाता है कि ये वित्तीय कंपनियां इस बाजार के लिए कितनी अहम हो चुकी हैं।\n\nक्रिसिल रेटिंग्स के डायरेक्टर दीपांशु सिंगला ने कहा, \"खास तौर पर गोल्ड लोन देने वाली कंपनियों ने अपने पोर्टफोलियो में जोरदार बढ़ोतरी देखी और फंड जुटाने के लिए डायरेक्ट असाइनमेंट (DA) रास्ते का इस्तेमाल किया।\" उन्होंने बताया कि इन सौदों में निवेश करने में सरकारी बैंक सबसे आगे रहे, क्योंकि ऐसे पोर्टफोलियो में बीते समय में क्रेडिट नुकसान बेहद कम रहा है। सिंगला ने रिस्क-वेट से मिलने वाले फायदों की ओर भी इशारा किया, जो इन एसेट्स को बैंकों की बैलेंस शीट के लिए आकर्षक बनाते हैं।\n\nकैसे बने सौदों के ढांचे\nबदलते एसेट मिक्स ने सौदों की बनावट को भी बदल दिया। कुल वॉल्यूम में डायरेक्ट असाइनमेंट सौदों की हिस्सेदारी करीब 54 प्रतिशत रही, जबकि बाकी 46 प्रतिशत पास-थ्रू सर्टिफिकेट यानी PTC सौदों की रही। गोल्ड लोन के मामले में यह झुकाव और भी साफ दिखा, क्योंकि सिक्योरिटाइज्ड गोल्ड लोन का करीब 87 प्रतिशत हिस्सा डायरेक्ट असाइनमेंट रास्ते से गुजरा।\n\nखरीदारों में बैंक सबसे आगे रहे और उन्होंने तिमाही के करीब 90 प्रतिशत सौदों में निवेश किया। इस समूह में सरकारी, निजी और विदेशी सभी तरह के बैंक शामिल थे। बैंकों के अलावा खरीदारों की सूची में बड़ी NBFC और अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड भी थे, साथ ही म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियां, बड़ी संपत्ति वाले लोग और फैमिली ऑफिस भी शामिल रहे। यह दिखाता है कि निवेशकों का दायरा अब कितना चौड़ा हो चुका है।\n\nदूसरे एसेट क्लास में भी बदलाव\nजैसे-जैसे गोल्ड लोन की रफ्तार बढ़ी, वैसे-वैसे रिटेल मॉर्गेज-बैक्ड सिक्योरिटाइजेशन यानी MBS की हिस्सेदारी घटती गई। MBS एक साल पहले के 21 प्रतिशत से गिरकर 12 प्रतिशत पर आ गया। क्रिसिल ने इसकी वजह एक बड़े निजी बैंक की सुस्त गतिविधि को बताया, जिसने पिछले वित्त वर्ष में MBS के बड़े वॉल्यूम को आगे बढ़ाया था।\n\nदूसरी ओर, बिजनेस लोन सिक्योरिटाइजेशन 7 प्रतिशत से बढ़कर 10 प्रतिशत पर पहुंच गया और इस बढ़त की अगुवाई सिक्योर्ड बिजनेस लोन पूल ने की। माइक्रोफाइनेंस लोन की हिस्सेदारी कुल वॉल्यूम में 14 प्रतिशत रही, जो पहले के 11 प्रतिशत से ज्यादा है। बेहतर पोर्टफोलियो प्रदर्शन और प्राथमिकता वाले क्षेत्र के एसेट्स की मांग ने इस बढ़ोतरी में मदद की।\n\nबाजार में बढ़े नए खिलाड़ी\nयह बाजार अब ज्यादा से ज्यादा भागीदारों को भी अपनी ओर खींच रहा है। सिक्योरिटाइजेशन बाजार तक पहुंचने वाले अलग-अलग ओरिजिनेटर की संख्या अप्रैल से जून तिमाही में बढ़कर करीब 115 हो गई, जो एक साल पहले की समान अवधि में करीब 90 थी। क्रिसिल रेटिंग्स की एसोसिएट डायरेक्टर पायल आनंद ने कहा कि आने वाली तिमाहियों में भी यह रफ्तार बनी रहने की उम्मीद है। उन्होंने इसके पीछे मजबूत रिटेल क्रेडिट ग्रोथ और ओरिजिनेटर की बढ़ती संख्या को मुख्य वजह बताया।\n\nइसका आप पर असर\n• कर्ज लेने वालों के लिए: सिक्योरिटाइजेशन से लेंडर की पूंजी खुलती है, जिससे गोल्ड लोन और रिटेल कर्ज बांटने की गुंजाइश बढ़ती है और कर्ज मिलना आसान हो सकता है।\n• निवेशकों के लिए: बैंक, म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियां और बड़ी संपत्ति वाले लोग इन पैकेज किए गए एसेट्स में लगातार पैसा लगा रहे हैं, जिससे एक स्थिर आय वाला निवेश विकल्प मजबूत हो रहा है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. अप्रैल से जून तिमाही में सबसे बड़ा सिक्योरिटाइज्ड एसेट क्लास कौन बना?\nगोल्ड लोन सबसे बड़ा सिक्योरिटाइज्ड एसेट क्लास बना और उसने वाहन लोन को पीछे छोड़ दिया।\n\n2. इस तिमाही में कुल सिक्योरिटाइजेशन सौदे कितने रहे?\nकुल सौदे पिछले साल के मुकाबले 22 प्रतिशत बढ़कर करीब 60,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गए।\n\n3. कुल वॉल्यूम में गोल्ड लोन और वाहन लोन की हिस्सेदारी कितनी रही?\nगोल्ड लोन की हिस्सेदारी करीब 31 प्रतिशत रही, जबकि वाहन लोन घटकर करीब 26 प्रतिशत पर आ गया।\n\n4. इन सौदों में सबसे बड़े खरीदार कौन रहे?\nबैंक सबसे बड़े खरीदार रहे और उन्होंने तिमाही के करीब 90 प्रतिशत सौदों में निवेश किया, जिनमें सरकारी, निजी और विदेशी बैंक शामिल थे।\n\n5. रिटेल MBS की हिस्सेदारी में क्या बदलाव आया?\nMBS एक साल पहले के 21 प्रतिशत से गिरकर 12 प्रतिशत पर आ गया, जिसकी वजह एक बड़े निजी बैंक की सुस्त गतिविधि रही।\n\n6. सिक्योरिटाइजेशन बाजार में ओरिजिनेटर की संख्या कितनी बढ़ी?\nअलग-अलग ओरिजिनेटर की संख्या एक साल पहले के करीब 90 से बढ़कर अप्रैल से जून तिमाही में करीब 115 हो गई।",
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  "publishedAt": "2026-07-06",
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