गोंडा के प्रगतिशील किसान अक्षैबर सिंह ने एक ही खेत में उगाईं चार फसलें, लागत घटकर मुनाफा हुआ दोगुना गोंडा जिले के प्रगतिशील किसान अक्षैबर सिंह ने मिश्रित खेती का अनूठा मॉडल अपनाते हुए दो एकड़ जमीन में एक साथ बेर, अमरूद, हल्दी और बैंगन की फसलें उगाई हैं। गोंडा जिले के वजीरगंज विकासखंड के अंतर्गत आने वाले इलाके में खेती की एक नई तस्वीर सामने आई है। यहां के प्रगतिशील किसान अक्षैबर सिंह ने पारंपरिक खेती के तौर-तरीकों से हटकर एक ऐसी तकनीक अपनाई है जो आसपास के क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई है। उन्होंने महज दो एकड़ की जमीन पर एक साथ चार अलग-अलग फसलें उगाने का सफल प्रयोग किया है। इस अनोखी मिश्रित खेती के तहत उनके खेतों में फल और सब्जियां एक साथ लहलहा रही हैं, जिससे उन्हें एक ही जमीन से कई गुना ज्यादा आय प्राप्त हो रही है। किसान का मानना है कि इस वैज्ञानिक और नियोजित तरीके से खेती करने पर लागत में भारी कमी आती है और जोखिम भी कम हो जाता है। दो एकड़ जमीन में चार फसलों का अनूठा संयोजन अक्षैबर सिंह ने अपनी लगभग दो एकड़ की कृषि भूमि को पूरी योजना के साथ उपयोग में लिया है। इस खेत में उन्होंने बेर और विदेशी अमरूद के पौधे पंक्तिबद्ध तरीके से लगवाए हैं। पौधों के बीच की खाली जमीन को बेकार छोड़ने के बजाय उन्होंने वहां हल्दी और बैंगन की फसलें बो दी हैं। उनके खेतों में पौधों की दूरी का भी विशेष ध्यान रखा गया है ताकि किसी भी फसल के विकास में बाधा न आए। अमरूद के पेड़ों के बीच करीब 12 फीट की दूरी रखी गई है, जबकि बेर के पौधे लगभग 6 फीट के अंतराल पर लगाए गए हैं। इन तय दूरियों के बीच खाली पड़ी जगहों पर हल्दी और बैंगन की खेती बड़े ही व्यवस्थित ढंग से की जा रही है, जिससे खेत के चप्पे-चप्पे का सदुपयोग हो रहा है। लागत कम और आमदनी के कई नए रास्ते इस आधुनिक मिश्रित खेती के फायदों के बारे में बात करते हुए अक्षैबर सिंह ने बताया कि इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि एक ही खेत और एक ही समय में कई फसलें तैयार हो जाती हैं। अलग-अलग फसलों के लिए अलग से खेत तैयार करने की जरूरत नहीं पड़ती है। सिंचाई, उर्वरਕ और निराई-गुड़ाई जैसी कृषि गतिविधियों का प्रबंधन एक साथ होने से कुल लागत में उल्लेखनीय कमी आती है। इसके अलावा किसान के पास आय के कई स्रोत एक साथ आ जाते हैं, जिससे किसी एक फसल के खराब होने या दाम गिरने का खतरा भी काफी हद तक कम हो जाता है। उनके खेतों में लगे बैंगन के पौधों में फल आने का सिलसिला शुरू हो चुका है और वह कई बार इनकी तुड़ाई करके स्थानीय बाजार में बेच भी चुके हैं जिससे उन्हें अच्छी नकदी मिल गई है। वहीं जमीन के नीचे तैयार हो रही हल्दी की फसल से उन्हें अपनी शुरुआती लागत पूरी तरह वसूल होने की पूरी उम्मीद है। बेर और अमरूद से भविष्य में बंपर मुनाफे की उम्मीद सब्जियों से शुरुआती खर्च निकलने के बाद अब किसान की निगाहें फलों से होने वाली भारी कमाई पर टिकी हैं। अक्षैबर सिंह ने बताया कि उनके खेत में खड़े बेर के पेड़ों पर जल्द ही फूलों का प्रस्फुटन शुरू होने वाला है। सर्दियों के मौसम में जब बेर की फसल पूरी तरह पककर तैयार होगी तो बाजार में इसकी मांग और कीमत दोनों अच्छी मिलती हैं। इस बार केवल बेर की बिक्री से ही लगभग तीन से चार लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा होने की पूरी संभावना है। उन्होंने इस पूरी खेती की शुरुआत में लगभग 90 हजार से एक लाख रुपये तक की कुल पूंजी निवेश की थी। उनका कहना है कि हल्दी और बैंगन के जरिए उनकी यह मूल लागत पहले ही निकल जाएगी, जिसके बाद बेर और अमरूद की बंपर पैदावार से होने वाली पूरी आमदनी उनके लिए सीधा और अतिरिक्त मुनाफा साबित होगी। उन्नत किस्मों का चयन और आगे की कार्ययोजना फलों की खेती में बेहतर पैदावार हासिल करने के लिए किसान ने खास और चुनिंदा किस्मों का चयन किया है। उन्होंने अपने खेत में मिस इंडिया बेर और बाल सुंदरी एप्पल बेर के पौधे रोपे हैं। इसके अलावा अमरूद की दो मशहूर विदेशी प्रजातियां गोल्डन-8 और ताइवान पिंक भी उनके खेत की शोभा बढ़ा रही हैं। अमरूद एक ऐसी फसल है जो लंबे समय तक लगातार फल देती है और सही देखरेख मिलने पर कई वर्षों तक किसानों को मालामाल कर सकती है। भविष्य की अपनी योजनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि आने वाले समय में जब बेर के पेड़ों की उम्र पूरी हो जाएगी तब उन्हें हटाकर उस जगह पर केवल अमरूद का सघन बाग विकसित किया जाएगा ताकि उत्पादन को और अधिक बढ़ाया जा सके। किसान मेलों से मिली प्रेरणा और मिला नया दृष्टिकोण इस अनूठी खेती का विचार अक्षैबर सिंह के मन में अचानक नहीं आया। उन्हें इसकी प्रेरणा कृषि विभाग द्वारा आयोजित होने वाले किसान मेलों में जाने और अन्य सफल किसानों के अनुभवों को देखने से मिली। मेलों में उन्हें आधुनिक कृषि तकनीकों और नए तौर-तरीकों के बारे में बार-बार बहुमूल्य जानकारियां मिलती रहीं। इसके बाद उन्होंने इस विषय पर गहराई से अध्ययन किया, विभिन्न पहलुओं पर रिसर्च की और अंततः अपने खेतों में इसे उतारने का साहसिक कदम उठाया। फिलहाल वह दो एकड़ में यह प्रयोग कर रहे हैं लेकिन उनकी भविष्य में इस खेती के दायरे को और अधिक फैलाने की पक्की योजना है। उनका स्पष्ट संदेश है कि यदि किसान पारंपरिक लीक से हटकर वैज्ञानिक योजना और पूरी जानकारी के साथ खेती करें तो वे सीमित भूमि से भी रिकॉर्ड तोड़ आमदनी हासिल कर सकते हैं। इसका आप पर असर इस आधुनिक कृषि मॉडल से किसानों को एक ही जमीन से कई गुना अधिक आय प्राप्त करने का व्यावहारिक रास्ता मिलता है। • भारत में: देश भर के छोटे और सीमांत किसानों को यह मॉडल सिखाता है कि कैसे सीमित भूमि में लागत घटाकर और विविधीकरण अपनाकर अपनी आमदनी को सुरक्षित किया जा सकता है। • गोंडा में: गोंडा और आसपास के ग्रामीण इलाकों के किसानों को अब अपनी पारंपरिक फसलों से आगे बढ़कर बागवानी और मिश्रित खेती अपनाने का एक ठोस और व्यावहारिक उदाहरण मिल गया है। ऐसा क्यों हुआ पारंपरिक एकल फसल खेती में बढ़ती लागत और एक ही फसल पर निर्भरता के जोखिम से बचने के लिए किसानों ने नए तौर-तरीके तलाशने शुरू किए हैं। • लागत प्रबंधन: एक ही खेत में कई फसलें उगाने से सिंचाई, खाद और निराई-गुड़ाई जैसे संसाधनों का साझा उपयोग होता है, जिससे प्रति एकड़ कुल खर्च काफी कम हो जाता है। • जोखिम का विविधीकरण: कृषि मेलों से मिलने वाली आधुनिक जानकारी और अनुसंधान के आधार पर विभिन्न फसलों का संयोजन तैयार किया जाता है जिससे किसी एक फसल के पिटने पर दूसरी फसल नुकसान की भरपाई कर देती है। सवाल-जवाब 1. अक्षैबर सिंह ने कितने एकड़ जमीन पर मिश्रित खेती की शुरुआत की है? उन्होंने करीब 2 एकड़ जमीन पर मिश्रित खेती शुरू की है। 2. उन्होंने अपने खेत में मुख्य रूप से कौन सी फसलें लगाई हैं? उन्होंने अपने खेत में बेर, विदेशी अमरूद, हल्दी और बैंगन की मिश्रित खेती की है। 3. अमरूद और बेर के पौधों के बीच कितनी दूरी रखी गई है? अमरूद के पौधों के बीच करीब 12 फीट और बेर के पौधों के बीच करीब 6 फीट की दूरी रखी गई है। 4. इस खेती को शुरू करने में कितनी लागत आई है? उन्होंने खेती में लगभग 90 हजार से 1 लाख रुपये तक की लागत लगाई है। 5. बेर की बिक्री से कितने तक की कमाई होने की संभावना है? इस बार बेर की बिक्री से करीब 3 से 4 लाख रुपये तक की कमाई होने की संभावना है। 6. उन्होंने खेत में बेर और अमरूद की कौन सी किस्में लगाई हैं? उन्होंने मिस इंडिया बेर, बाल सुंदरी एप्पल बेर और अमरूद की गोल्डन-8 व ताइवान पिंक किस्में लगाई हैं। प्रेरणा और सबक अक्षैबर सिंह की यह सफलता दिखाती है कि कैसे सही जानकारी और सूझबूझ से खेती को घाटे के सौदे से निकालकर एक लाभकारी व्यवसाय बनाया जा सकता है। • निरंतर सीखते रहना: किसान मेलों में जाना और आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी जुटाना किसी भी किसान की सोच और पैदा करने की क्षमता को पूरी तरह बदल सकता है। • सीमित भूमि का सदुपयोग: दो एकड़ जैसी कम जमीन पर भी बहुस्तरीय और मिश्रित फसलों को व्यवस्थित तरीके से उगाकर अपनी आय को कई गुना तक बढ़ाया जा सकता है। • जोखिम बांटना: एक ही फसल पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय सब्जियों और फलों का सही संयोजन तैयार करने से आर्थिक सुरक्षा मजबूत होती है। https://trendkia.com/business/gonda-ke-pragatishila-kisana-akhaibar-singh-ne-eka-hi-kheta-men-ugain-chara-phasalen-lagata-ghatakara-munapha-hua-doguna-32590 TrendKia — Har trend, sabse pehle.