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  "type": "article",
  "title": "गोंडा के प्रगतिशील किसान प्रेमचंद मौर्य ने मचान विधि से कुंदरू उगाकर बदली अपनी किस्मत",
  "summary": "उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के किसान प्रेमचंद मौर्य ने हाईस्कूल के बाद पढ़ाई छोड़ दी और खेती को अपनी आजीविका बनाया। अब वह मचान विधि से कुंदरू की खेती कर रहे हैं और कम लागत में अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।",
  "content": "उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के किसान अब पारंपरिक फसलों के दायरे से बाहर निकलकर सब्जियों की खेती की तरफ तेज़ी से कदम बढ़ा रहे हैं। इसी कड़ी में जिले के किसानों के बीच कुंदरू की खेती कमाई का एक बेहतरीन जरिया बनकर उभर रही है। कम जमीन में अधिक पैदावार मिलने और लंबे समय तक फसल का उत्पादन जारी रहने के कारण किसान इस फसल की ओर आकर्षित हो रहे हैं। गोंडा के एक प्रगतिशील किसान ने इस दिशा में एक सफल उदाहरण पेश किया है, जो दूसरे अन्नदाताओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकता है।\n\nहाईस्कूल के बाद खेती को बनाया मुख्य जरिया\nजिले के प्रगतिशील किसान प्रेमचंद मौर्य ने अपनी शुरुआती पढ़ाई हाईस्कूल तक पूरी की थी। हालांकि, घर की आर्थिक स्थिति अनुकूल न होने के कारण वह अपनी आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख सके। ऐसी परिस्थितियों में उन्होंने निराश होने के बजाय खेती-किसानी को ही अपना भविष्य बनाने का निर्णय लिया। पिछले करीब 15 वर्षों से वह लगातार कृषि कार्य से जुड़े हुए हैं और समय के साथ उन्होंने सब्जियों की खेती पर विशेष जोर देना शुरू किया है। वह मौसम और बाजार की मांग के अनुसार अलग-अलग तरह की सब्जियां उगाते हैं। वर्तमान समय में वह कुंदरू की फसल की देखभाल में जुटे हुए हैं। उनके अनुसार, खेती में केवल कड़ी मेहनत ही काफी नहीं होती, बल्कि सही समय पर सही फसल का चुनाव करना भी उतना ही जरूरी है ताकि बेहतर मुनाफा सुनिश्चित किया जा सके।\n\nमचान विधि और जैविक खाद का उपयोग\nप्रेमचंद मौर्य ने कुंदरू की खेती के तौर-तरीकों पर विस्तार से बात करते हुए बताया कि यह एक प्रकार की बेल वाली सब्जी है, जिसकी बाजार में हमेशा अच्छी मांग बनी रहती है। इसकी सफल पैदावार के लिए खेत में पानी के निकास की सही व्यवस्था होनी चाहिए और बेलों को ऊपर उठाने के लिए सहारे की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए किसान खेत में मचान या जाल तैयार करते हैं, जिससे बेलों का विकास बेहतर तरीके से होता है और सब्जियों की तुड़ाई करने में भी काफी आसानी हो जाती है। इसके अलावा, इस फसल की खेती में रासायनिक उर्वरकों का कम से कम और जैविक खाद का अधिक उपयोग किया जाता है, जिससे जमीन की उपजाऊ शक्ति और सेहत सुरक्षित रहती है।\n\nलागत और मुनाफे का पूरा गणित\nइस समय प्रेमचंद मौर्य लगभग 15 बिस्वा जमीन के हिस्से पर कुंदरू की खेती कर रहे हैं और आने वाले समय में इसे और अधिक बड़े पैमाने पर करने की उनकी योजना है। उन्होंने जानकारी दी कि कुंदरू की बेल एक बार रोपण के बाद लगातार लगभग तीन वर्षों तक फल देती रहती है। इस 15 बिस्वा के रकबे में कुंदरू उगाने की कुल लागत करीब 9 से 10 हजार रुपये के आसपास आई है। उन्हें पूरी उम्मीद है कि लगभग पांच महीने की अवधि में इस फसल से 25 से 30 हजार रुपये तक की शुद्ध आमदनी हो जाएगी। हालांकि, यह मुनाफा पूरी तरह से बाजार में मिलने वाले भाव, कुल उत्पादन और समय पर होने वाली बिक्री पर निर्भर करेगा।\n\nक्षेत्र के अन्य किसानों के लिए सीख\nगोंडा के किसान प्रेमचंद मौर्य का यह सफल अनुभव उन सभी छोटे और सीमांत किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है जो सीमित भूमि पर सब्जियों की खेती के जरिए अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करना चाहते हैं। बेलों को सही समय पर मचान का सहारा देना, उनकी समय-समय पर कटाई करना और खेत की उचित देखरेख करना लंबी अवधि तक बंपर पैदावार हासिल करने की कुंजी है। यदि किसान वैज्ञानिक तरीकों और सूझबूझ के साथ आगे बढ़ें, तो खेती को घाटे का सौदा मानने की धारणा पूरी तरह से बदल सकती है।\n\nइसका आप पर असर\nयह सफलता की कहानी छोटे और सीमांत किसानों को कम जमीन में भी अधिक आमदनी कमाने के नए रास्ते दिखाती है।\n\n• भारत भर में: देश के अन्य हिस्सों के किसान भी पारंपरिक फसलों से हटकर कम लागत वाली और लंबे समय तक फल देने वाली सब्जियों की खेती अपना सकते हैं। इससे उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।\n• गोंडा में: स्थानीय किसान प्रेमचंद मौर्य की सफलता से सीख लेकर आधुनिक मचान तकनीक और जैविक खाद का उपयोग कर सकते हैं, जिससे क्षेत्र में कृषि उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nकुंदरू की खेती में किसानों की बढ़ती रुचि के पीछे इसके कम लागत में लंबे समय तक उत्पादन देने वाले गुण हैं।\n\n• कम लागत और अधिक मांग: बाजार में कुंदरू की निरंतर मांग और केवल 9 से 10 हजार रुपये की शुरुआती लागत ने इसे किसानों के लिए एक किफायती विकल्प बना दिया है।\n• लंबी अवधि की फसल: कुंदरू की बेल एक बार लगाने के बाद लगभग तीन साल तक लगातार फल देती है, जिससे किसानों को बार-बार बुवाई की मेहनत और खर्च से राहत मिलती है।\n• मचान तकनीक का लाभ: जाल या मचान का उपयोग करने से पौधों का विकास बेहतर होता है और फल सड़ने से बचते हैं, जिससे तुड़ाई आसान हो जाती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. प्रेमचंद मौर्य ने कितने रकबे में कुंदरू की खेती की है?\nउन्होंने इस समय लगभग 15 बिस्वा जमीन में कुंदरू की खेती की है।\n\n2. कुंदरू की खेती में कुल कितनी लागत आई है?\n15 बिस्वा जमीन में कुंदरू उगाने की कुल लागत लगभग 9 से 10 हजार रुपये आई है।\n\n3. इस फसल से कितने मुनाफे की उम्मीद है?\nलगभग पांच महीने की अवधि में इस फसल से 25 से 30 हजार रुपये तक की आमदनी होने की उम्मीद है।\n\n4. कुंदरू की बेल कितने समय तक फल देती है?\nकुंदरू की बेल एक बार लगाने के बाद लगभग तीन साल तक लगातार फल दे सकती है।\n\n5. किसानों ने बेलों को सहारा देने के लिए किस चीज़ का उपयोग किया है?\nकिसानों ने बेलों को सहारा देने के लिए मचान या जाल का उपयोग किया है।\n\nप्रेरणा और सबक\nप्रेमचंद मौर्य की यह यात्रा दिखाती है कि सीमित संसाधनों और प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद कड़ी मेहनत से सफलता हासिल की जा सकती है।\n\n• दृढ़ संकल्प: आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई छूटने के बाद भी हार न मानकर कृषि को अपनी ताकत बनाना।\n• सही फसल का चुनाव: मौसम और बाजार की मांग को समझते हुए सही सब्जी का चयन करना।\n• तकनीक का उपयोग: पारंपरिक तरीकों की बजाय मचान विधि जैसे उन्नत उपायों को अपनाकर पैदावार बढ़ाना।\n• संसाधनों का प्रबंधन: जैविक खादों के प्रयोग से कम खर्च में बेहतरीन परिणाम हासिल करना।",
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  "category": "व्यापार",
  "publishedAt": "2026-09-18",
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    "गोंडा किसान",
    "सब्जी की खेती",
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