# गोंडा के युवा किसान प्रिंस सिंह का कमाल, जैविक खाद और आधुनिक लेजर तकनीक से गन्ने की खेती में बंपर पैदावार की उम्मीद

> उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के युवा किसान प्रिंस सिंह जैविक खाद और आधुनिक लेजर तकनीक का उपयोग कर कम लागत में गन्ने की बंपर पैदावार ले रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** व्यापार · **Published:** 2026-10-28 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/business/gonda-ke-yuva-kisana-prince-singh-ka-kamala-jaivika-khada-aura-adhunika-laser-takanika-se-ganne-ki-kheti-men-bumper-paidavara-ki-u-52431 · **Language:** Hindi
**Tags:** गोंडा, जैविक खेती, गन्ना उत्पादन, प्रिंस सिंह, लेजर तकनीक, उत्तर प्रदेश किसान

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के विकासखंड झंझरी के अंतर्गत आने वाली ग्राम सभा केशवपुर पहाड़वा में खेती की नई तस्वीरें सामने आ रही हैं। यहां के किसान अब लकीर के फकीर बने रहने के बजाय पारंपरिक तौर-तरीकों के साथ आधुनिक तकनीकों और जैविक खेती का मेल बैठा रहे हैं। इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए इलाके के एक युवा किसान ने जैविक खाद और नई तकनीकों के सहारे गन्ने की खेती में एक अलग ही मुकाम हासिल किया है। इस अनोखे प्रयोग से उन्हें न केवल लागत घटाने में मदद मिल रही है, बल्कि बंपर पैदावार की उम्मीद भी बंध गई है।

## जैविक खाद और वर्मी कंपोस्ट का हो रहा इस्तेमाल
प्रगतिशील किसान प्रिंस सिंह ने अपनी खेती के तौर-तरीकों पर खुलकर बात की है। उनका साफ कहना है कि गन्ने की बंपर फसल तभी संभव है जब खेत की मिट्टी अंदर से उपजाऊ और सेहतमंद हो। मिट्टी की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए रासायनिक खादों के बजाय गोबर की सड़ी खाद और अन्य जैविक विकल्पों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे मिट्टी में प्राकृतिक जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है और उसकी उर्वरक क्षमता लंबे समय तक सुरक्षित रहती है। गन्ने की इस फसल के लिए वर्मी कंपोस्ट और पारंपरिक गोबर की खाद का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है।

## लेजर तकनीक से बुवाई और पांच बीघा में खेती
इस आधुनिक खेती की सबसे बड़ी खासियत इसकी बुवाई का तरीका है। प्रिंस सिंह ने अपने खेतों में गन्ने की बुवाई के लिए लेजर विधि का सहारा लिया है, जिससे पौधों को एक समान दूरी और सही गहराई मिलती है। वर्तमान में वह करीब पांच बीघा जमीन पर गन्ने की खेती कर रहे हैं। इस पूरी खेती में उनकी लागत बेहद कम यानी लगभग 20 से 25 हजार रुपये के बीच आई है। कम लागत के बावजूद फसल की सेहत को देखकर उन्हें पूरी उम्मीद है कि प्रति बीघा लगभग 80 से 90 क्विंटल तक गन्ने का उत्पादन आसानी से हासिल हो जाएगा।

## पिछले तीन साल से कर रहे जैविक खेती
जैविक खेती का यह सफर कोई अचानक उठाया गया कदम नहीं है। प्रिंस सिंह पिछले तीन साल से लगातार जैविक पद्धति से ही फसलें उगा रहे हैं। गन्ने के अलावा उनकी अन्य फसलों में भी केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता है। उनका दृढ़ विश्वास है कि जैविक खाद का प्रयोग करने से जमीन की सेहत सुधरती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बची रहती है।

## गन्ने की खास किस्में और बंपर लंबाई
अपने खेतों में उन्होंने गन्ने की दो प्रमुख किस्मों को जगह दी है, जिनके नाम 16201 और 14201 हैं। स्थानीय कृषि जानकारों और उनके अपने अनुभव के मुताबिक, ये दोनों किस्में गोंडा के क्षेत्रीय वातावरण और आबोहवा के लिए बेहद मुफीद मानी जाती हैं। इन खास किस्मों के गन्ने की लंबाई सामान्यतः 10 से 12 फीट तक चली जाती है। आधुनिक लेजर तकनीक और जैविक खाद के इस बेहतरीन तालमेल से उन्हें पूरा भरोसा है कि इस सीजन में गन्ने की बंपर पैदावार के साथ-साथ बंपर मुनाफा भी कमाने को मिलेगा।

## सवाल-जवाब

### 1. प्रिंस सिंह किस जिले के रहने वाले हैं?
प्रिंस सिंह उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के विकासखंड झंझरी के अंतर्गत आने वाली ग्राम सभा केशवपुर पहाड़वा के रहने वाले हैं।

### 2. प्रिंस सिंह कितने क्षेत्र में गन्ने की खेती कर रहे हैं?
वह लगभग पांच बीघा जमीन में गन्ने की खेती कर रहे हैं।

### 3. गन्ने की खेती में कुल कितनी लागत आई है?
पांच बीघा जमीन पर गन्ने की खेती करने में करीब 20 से 25 हजार रुपये की लागत आई है।

### 4. प्रति बीघा कितनी पैदावार की उम्मीद है?
उन्हें प्रति बीघा लगभग 80 से 90 क्विंटल गन्ने की पैदावार होने की उम्मीद है।

### 5. वे खेत में गन्ने की कौन सी किस्मों की खेती कर रहे हैं?
वे अपने खेत में 16201 और 14201 किस्म के गन्ने की खेती कर रहे हैं।

## प्रेरणा और सबक
गोंडा के युवा किसान प्रिंस सिंह की यह सफलता पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर आधुनिक और जैविक तरीकों को अपनाने की प्रेरणा देती है।

- **कम लागत:** जैविक खादों के प्रयोग और सीमित संसाधनों के सही इस्तेमाल से खेती का कुल खर्च महज 20 से 25 हजार रुपये तक सीमित रखा जा सकता है।
- **मिट्टी की सेहत:** गोबर की खाद और वर्मी कंपोस्ट का उपयोग करने से जमीन की उपजाऊ क्षमता लंबे समय तक सुरक्षित रहती है।
- **तकनीक का इस्तेमाल:** लेजर विधि जैसी आधुनिक तकनीकों से बुवाई करने पर पौधों को सही दूरी और गहराई मिलती है, जिससे पैदावार बढ़ती है।
- **सही किस्मों का चुनाव:** स्थानीय जलवायु के अनुकूल उन्नत बीजों और किस्मों का चयन करने से बंपर पैदावार और बेहतर आमदनी हासिल की जा सकती है।

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