गुजरात की तकनीक से भंवरलाल यादव ने बदली खेती की किस्मत, वर्मी कम्पोस्ट से बन गए सफल मिसाल डीडवाना-कुचामन जिले के प्रगतिशील किसान भंवरलाल यादव ने गुजरात से प्रेरणा लेकर वर्मी कम्पोस्ट के जरिए जैविक खेती की नई मिसाल पेश की है। आज उनकी खाद तकनीक से न केवल लागत कम हो रही है बल्कि मिट्टी की सेहत भी सुधर रही है। डीडवाना-कुचामन जिले के अहीरों का बास गांव के रहने वाले भंवरलाल यादव ने खेती के प्रति एक नया नज़रिया पेश कर सभी को प्रभावित किया है। उन्होंने अपनी मेहनत और सूझबूझ से यह सिद्ध कर दिया है कि यदि सही तकनीक और प्राकृतिक साधनों का उपयोग किया जाए, तो खेती को न केवल लाभदायक बनाया जा सकता है, बल्कि उसे पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित रखा जा सकता है। वर्मी कम्पोस्ट के प्रति उनकी रुचि ने उन्हें इलाके के अन्य किसानों के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में स्थापित किया है। गुजरात यात्रा से मिली प्रेरणा भंवरलाल यादव को कृषि विभाग द्वारा आयोजित एक अध्ययन दल में शामिल होने का मौका मिला था। इस दल के साथ वे नागौर जिले के अन्य प्रगतिशील किसानों के साथ गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के भ्रमण पर गए। इन राज्यों के दौरे के दौरान उन्होंने प्राकृतिक खेती और केंचुआ खाद बनाने की विभिन्न तकनीकों को बारीकी से समझा। इस अनुभव ने उनके सोचने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया और उन्होंने रासायनिक खादों से किनारा करते हुए जैविक पद्धति को अपनाने का संकल्प लिया। वर्मी कम्पोस्ट की शुरुआत और प्रक्रिया वर्ष 2012-13 से भंवरलाल ने अपने खेत पर वर्मी कम्पोस्ट इकाई स्थापित की। उन्होंने 18 फीट लंबी और 3 फीट चौड़ी छह क्यारियों का निर्माण करवाया। खाद के निर्माण के लिए उन्होंने बीकानेर से विशेष प्रकार के लाल रंग के केंचुए मंगवाए। गाय और भैंस के गोबर का उपयोग कर खाद बनाने का सिलसिला तभी शुरू हुआ, जो आज भी अनवरत जारी है। वर्तमान में वही शुरुआती केंचुओं का परिवार संख्या में वृद्धि कर खाद उत्पादन का मुख्य आधार बना हुआ है। खाद तैयार करने की प्रक्रिया के बारे में वे बताते हैं कि प्रत्येक क्यारी में लगभग 20 क्विंटल गोबर डाला जाता है। इस गोबर के ऊपर केंचुओं को छोड़ा जाता है। लगभग तीन महीने की अवधि में यह गोबर उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद में परिवर्तित हो जाता है। खाद निर्माण के दौरान क्यारियों को छाया में रखना और हर दो-तीन दिन में नमी के लिए हल्का पानी छिड़कना आवश्यक होता है। वे विशेष ध्यान रखते हैं कि तापमान बहुत अधिक न बढ़े, क्योंकि अत्यधिक गर्मी से केंचुओं की जान जोखिम में पड़ सकती है। खेती की लागत में कमी और पैदावार में वृद्धि भंवरलाल की छह क्यारियों से एक बार में 120 क्विंटल जैविक खाद तैयार होती है। उनके पास 40 बीघा भूमि है, जिसमें से वे हर साल लगभग 10 बीघा में अपनी तैयार की गई खाद का उपयोग करते हैं। भंवरलाल का अनुभव है कि प्रति बीघा 100 किलो वर्मी कम्पोस्ट खाद डालने पर अगले तीन वर्षों तक रासायनिक उर्वरकों की कोई आवश्यकता नहीं रहती। इससे मिट्टी की उर्वरता में सुधार हुआ है और फसलों की पैदावार में भी काफी लाभ देखा गया है। किसानों के लिए प्रेरणा आज भंवरलाल यादव केवल अपने खेत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे क्षेत्र के अन्य किसानों को भी जैविक खेती की ओर प्रेरित कर रहे हैं। वे स्थानीय संसाधनों से ही खाद तैयार करने की सलाह देते हैं ताकि खेती का खर्च कम हो सके। उनके इस मॉडल ने साबित किया है कि कम खर्च और पर्यावरण के अनुकूल खेती ही भविष्य का सही रास्ता है। उनके द्वारा अपनाई गई यह तकनीक अब आसपास के कई किसानों के लिए उम्मीद की एक नई किरण बनकर उभरी है। इसका आप पर असर भारत में: यह मॉडल साबित करता है कि स्थानीय संसाधनों से खाद बनाकर खेती की लागत को काफी हद तक कम किया जा सकता है। डीडवाना-कुचामन में: स्थानीय किसान भंवरलाल यादव की इस तकनीक को अपनाकर मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ा सकते हैं और रासायनिक खादों पर निर्भरता घटा सकते हैं। सवाल-जवाब 1. भंवरलाल यादव ने वर्मी कम्पोस्ट के लिए केंचुए कहां से मंगवाए? उन्होंने बीकानेर से उन्नत नस्ल के लाल रंग के केंचुए मंगवाए थे। 2. एक बार वर्मी कम्पोस्ट खाद डालने के बाद रासायनिक खादों की जरूरत कब तक नहीं पड़ती? भंवरलाल के अनुभव के अनुसार, एक बीघा में खाद डालने के बाद लगभग तीन वर्षों तक रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता नहीं पड़ती। 3. एक क्यारी में कितना गोबर उपयोग किया जाता है? प्रत्येक 18 फीट लंबी और 3 फीट चौड़ी क्यारी में करीब 20 क्विंटल गोबर का उपयोग किया जाता है। 4. वर्मी कम्पोस्ट बनने में कितना समय लगता है? गोबर को उच्च गुणवत्ता वाली वर्मी कम्पोस्ट खाद में बदलने के लिए लगभग तीन महीने का समय लगता है। प्रेरणा और सबक • अनुभव से सीखें: भंवरलाल की तरह अन्य राज्यों का भ्रमण कर नई तकनीकों को देखें और अपने खेत पर प्रयोग करें। • स्थानीय संसाधनों का उपयोग: गाय-भैंस के गोबर जैसे मुफ्त उपलब्ध साधनों से खाद तैयार कर लागत को शून्य के करीब लाएं। • धैर्य और निरंतरता: जैविक खेती रातों-रात परिणाम नहीं देती, तीन साल का समय देकर मिट्टी की गुणवत्ता सुधारें। • पर्यावरण का ध्यान: खाद को छायादार जगह पर रखें और तापमान नियंत्रित रखें ताकि सूक्ष्मजीव जीवित रह सकें। https://trendkia.com/business/gujarat-ki-takanika-se-bhanwarlal-yadav-ne-badali-kheti-ki-kismata-varmi-kamposta-se-bana-gae-saphala-misala-6778 TrendKia — Har trend, sabse pehle.