होर्मुज में तनाव: कच्चा तेल और गैस संकट की आहट, भारत की क्या होगी तैयारी? डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ युद्धविराम रद्द करने और होर्मुज जलडमरूमध्य में नाकेबंदी की धमकी से वैश्विक ऊर्जा बाजारों में हड़कंप मच गया है। भारत के लिए यह स्थिति कच्चे तेल और रसोई गैस की कीमतों में भारी उछाल के साथ आपूर्ति श्रृंखला पर बड़ा खतरा बनकर उभरी है। होर्मुज जलडमरूमध्य में एक बार फिर युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार सहम गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ सीजफायर समझौते को खत्म करने की घोषणा की है, साथ ही तेहरान पर सैन्य हमले की चेतावनी भी जारी की है। इसके अतिरिक्त, होर्मुज में नाकेबंदी की नई घोषणा ने दुनिया की चिंताएं बढ़ा दी हैं। यदि ईरान और अमेरिका के बीच यह टकराव एक पूर्ण युद्ध में बदलता है, तो विश्व की तेल आपूर्ति श्रृंखला के टूटने का गंभीर खतरा पैदा हो जाएगा। यद्यपि भारत कच्चे तेल के लिए रूस या अमेरिका जैसे विकल्पों की ओर रुख कर सकता है, लेकिन सबसे गंभीर प्रश्न एलपीजी (LPG) की उपलब्धता को लेकर खड़ा है। होर्मुज नाकेबंदी का भारत पर गहरा असर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव यदि लंबे युद्ध में तब्दील होता है, तो भारत के लिए यह एक अत्यंत कठिन परीक्षा होगी। पश्चिम एशिया में होने वाली किसी भी हलचल का सीधा असर भारत के मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ता है। देश अपनी ऊर्जा जरूरतों, कच्चे तेल के आयात और सबसे प्रमुख रूप से घरेलू रसोई गैस के लिए खाड़ी देशों के इसी समुद्री मार्ग पर अत्यधिक निर्भर है। कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल यदि होर्मुज जलडमरूमध्य, जो दुनिया का सबसे संवेदनशील समुद्री गलियारा माना जाता है, लंबे समय के लिए पूरी तरह बंद होता है, तो यह मार्च 2026 के संकट से भी अधिक भयावह परिणाम ला सकता है। बाजार विशेषज्ञों का आकलन है कि ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव 120 डॉलर से 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकते हैं। महंगाई का दोहरा प्रहार और एलपीजी किल्लत भारत भले ही कच्चे तेल के वैकल्पिक स्रोत खोज ले, लेकिन एलपीजी के मामले में स्थिति चुनौतीपूर्ण है। भारत अपनी आधी से अधिक रसोई गैस की मांग सऊदी अरब, कतर और यूएई जैसे खाड़ी देशों से पूरी करता है। यदि होर्मुज का मार्ग अवरुद्ध होता है, तो देश भर में एलपीजी सिलेंडरों की भारी कमी हो जाएगी। यह कमी न केवल रसोई गैस की कीमतों को आसमान पर ले जाएगी, बल्कि ईंधन, खाद्य पदार्थों और उर्वरकों के दाम भी आम आदमी का बजट बिगाड़ देंगे। निर्यात कारोबार और निवेश पर प्रभाव इस संभावित युद्ध के कारण भारत का निर्यात कारोबार भी ठप हो सकता है। विशेष रूप से यूएई को होने वाला इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात और ईरान को भेजा जाने वाला बासमती चावल बुरी तरह प्रभावित होगा। कुल निर्यात में 50 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आने का अनुमान है। साथ ही, मध्य एशिया का प्रवेश द्वार माने जाने वाले ईरान के चाबहार पोर्ट में किया गया भारत का बड़ा निवेश भी अनिश्चितता के दौर में फंस सकता है। भारत के लिए राहत की संभावना हालाँकि, स्थिति पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। यदि यह दुश्मनी सीमित हमलों तक ही रहती है और समुद्र मार्ग पूरी तरह बंद नहीं होता, तो भारत के लिए हालात संभल सकते हैं। वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 75 से 80 डॉलर प्रति बैरल के बीच स्थिर हैं। भारत की वर्तमान रणनीति, जिसके तहत वह 40 से अधिक देशों से तेल खरीदता है, इस संकट से निपटने में मदद कर सकती है। जोखिम के बावजूद, ईरान से मिलने वाले रियायती तेल और गैस के माध्यम से देश अपनी घरेलू आपूर्ति को सुरक्षित रख सकता है। यदि तेल और गैस का प्रवाह बना रहता है, तो देश का मजबूत जीएसटी कलेक्शन और आर्थिक आंकड़े जीडीपी वृद्धि को 7 प्रतिशत के आसपास बनाए रखने में सक्षम हो सकते हैं। वैश्विक परिदृश्य पर प्रभाव इस युद्ध का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहेगा। अमेरिका में नाकेबंदी के कारण महंगाई दर फिर से 5 प्रतिशत के स्तर को पार कर सकती है, जिससे फेडरल रिजर्व को ब्याज दरें ऊंची बनाए रखनी होंगी और अर्थव्यवस्था की गति धीमी हो जाएगी। वहीं, खाड़ी देशों (जीसीसी) में ईरान समर्थित गुटों द्वारा जल शोधन संयंत्रों और लॉजिस्टिक्स हब पर हमलों का खतरा बढ़ जाएगा, जिससे वहां पीने के पानी और राशन का भारी संकट पैदा हो सकता है। अंत में, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश, जो अपनी 80 प्रतिशत ऊर्जा के लिए इस मार्ग पर निर्भर हैं, उत्पादन लागत में बढ़ोतरी और फैक्ट्रियां बंद होने की समस्या का सामना करेंगे। यूरोप को भी एलएनजी की आपूर्ति ठप होने से महंगी अमेरिकी गैस पर निर्भर होना पड़ेगा, जो उनकी सर्दियों की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है। इसका आप पर असर भारत में: यदि होर्मुज मार्ग बाधित होता है, तो रसोई गैस की आपूर्ति में कमी से सिलेंडर की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे आम भारतीय परिवारों का मासिक बजट प्रभावित होगा। व्यापारियों और निवेशकों के लिए: वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण रसद और निर्माण लागत में वृद्धि हो सकती है, जिससे बाजार में अनिश्चितता बनी रह सकती है। सवाल-जवाब 1. होर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना भारत के लिए क्यों चिंताजनक है? भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं और एलपीजी का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है, जो इसी समुद्री मार्ग से होकर आता है। 2. क्या भारत कच्चे तेल के लिए केवल खाड़ी देशों पर निर्भर है? नहीं, भारत अपनी रणनीति के तहत दुनिया के 40 से अधिक देशों से कच्चा तेल खरीदता है, लेकिन एलपीजी के लिए वह अभी भी काफी हद तक खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर है। 3. युद्ध की स्थिति में एलपीजी की कीमतों पर क्या असर होगा? आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान के कारण एलपीजी की भारी किल्लत हो सकती है, जिससे घरेलू बाजार में इसके दाम काफी बढ़ सकते हैं। 4. वैश्विक तेल कीमतों का भारत की जीडीपी पर क्या प्रभाव पड़ सकता है? यदि तेल और गैस की आपूर्ति बनी रहती है, तो भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7 प्रतिशत के आसपास बनी रह सकती है, लेकिन बड़े व्यवधान इसे धीमा कर सकते हैं। https://trendkia.com/business/hormuja-men-tanava-kachcha-tela-aura-gaisa-snkata-ki-ahata-bharata-ki-kya-hogi-taiyari-hormuz-tensions-rise-5896 TrendKia — Har trend, sabse pehle.