भारत में डेटा सेंटर क्षमता पांच गुना बढ़ाने की तैयारी, चार वर्षों में होगा 3 लाख करोड़ रुपये का बड़ा निवेश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्लाउड सेवाओं की मांग में आए उछाल से भारत में डेटा सेंटर क्षमता मार्च 2030 तक 7.5 गीगावाट तक पहुंच सकती है। इस विस्तार के साथ मुंबई, हैदराबाद और विशाखापत्तनम जैसे शहरों में बिजली और इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग में भारी तेजी देखने को मिलेगी। देश भर में तेजी से पांव पसार रहे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल सेवाओं के विस्तार ने तकनीकी बुनियादी ढांचे की मांग को अभूतपूर्व स्तर पर पहुंचा दिया है। विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली कंपनियों द्वारा डिजिटल माध्यम अपनाने और आम उपयोगकर्ताओं के बीच इंटरनेट डेटा की खपत में लगातार वृद्धि होने से भारत का डेटा सेंटर उद्योग एक विशाल बदलाव की दहलीज पर खड़ा है। अगले चार वित्तीय वर्षों के दौरान इस सेक्टर में 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक का नया निवेश आने की संभावना जताई गई है। वर्तमान में मौजूद बुनियादी ढांचे के मुकाबले मार्च 2030 तक देश की कुल डेटा सेंटर क्षमता करीब पांच गुना बढ़कर 7.5 गीगावाट तक पहुंच सकती है, जो डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार को नई ऊर्जा प्रदान करेगी। कंप्यूटिंग जरूरतों और एआई विस्तार से बढ़ी सर्वर की आवश्यकता दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले चैटजीपीटी जैसे आधुनिक एआई उपकरण, बड़े पैमाने पर वीडियो स्ट्रीमिंग और विभिन्न क्लाउड सेवाओं का सुचारू संचालन पूरी तरह डेटा सेंटर पर निर्भर करता है। इन आधुनिक केंद्रों में हजारों की संख्या में शक्तिशाली सर्वर और कंप्यूटर दिन-रात डेटा स्टोर करने तथा उसे प्रोसेस करने का कार्य करते हैं। एआई मॉडल्स के प्रशिक्षण और उनके संचालन के लिए सामान्य सॉफ्टवेयर की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली कंप्यूटिंग क्षमता की दरकार होती है। इसके अलावा कारोबारी संस्थान अपने कामकाज को क्लाउड पर स्थानांतरित कर रहे हैं, जिससे कंपनियों के लिए अतिरिक्त सर्वर स्पेस सुनिश्चित करना अनिवार्य हो गया है। इस पूरी श्रृंखला में बड़े क्लाउड ऑपरेटर और तकनीकी प्रदाता, जिन्हें हाइपरस्केलर्स कहा जाता है, डेटा सेंटर कंपनियों के साथ दीर्घकालिक समझौते कर रहे हैं। इन शुरुआती करारों से डेटा सेंटर ऑपरेटरों को अपनी भावी आमदनी और राजस्व की स्पष्ट रूपरेखा पहले ही हासिल हो जाती है। सस्ती लागत और कम किराए से भारत बना वैश्विक पसंदीदा केंद्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अन्य देशों की तुलना में भारत में डेटा सेंटर स्थापित करने की लागत में स्पष्ट बढ़त देखने को मिलती है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कई अन्य प्रतिस्पर्धी बाजारों के मुकाबले भारत में जमीन के दाम, निर्माण व्यय और श्रम लागत लगभग 20 फीसदी तक कम हैं। इस भौगोलिक और ढांचागत बढ़त के साथ जब बिजली की तुलनात्मक रूप से सस्ती दरों को मिलाया जाता है, तो कुल परिचालन लागत में बड़ा अंतर पैदा हो जाता है। इन सभी कारकों के चलते अन्य देशों के मुकाबले भारत में डेटा सेंटर के किराए की दरें 30 से 35 फीसदी तक सस्ती बैठती हैं। लागत में इतनी बड़ी बचत होने के कारण बहुराष्ट्रीय तकनीकी कंपनियों और वैश्विक ऑपरेटरों के लिए भारत में अपने विशाल डेटा हब बनाना और उनका संचालन करना आर्थिक दृष्टिकोण से बेहद फायदेमंद साबित हो रहा है। निर्माण पूरा होने से पहले ही आधी क्षमता की अग्रिम बुकिंग डेटा सेंटर उद्योग में मांग का स्तर इतना अधिक है कि तैयार होने वाली आगामी क्षमता का लगभग आधा हिस्सा पहले ही लंबी अवधि के अनुबंधों के तहत बुक किया जा चुका है। तकनीकी और एआई कंपनियां परियोजनाओं के पूरा होने का इंतजार किए बिना ही अपनी भविष्य की कंप्यूटिंग आवश्यकताओं को सुरक्षित करने के लिए अग्रिम करार कर रही हैं। उद्योग में अनुबंध की प्रकृति में भी उल्लेखनीय बदलाव देखा गया है, जहां पहले यह समझौते आमतौर पर 10 से 12 वर्षों के लिए होते थे, वहीं अब कंपनियां 15 से 20 वर्षों की अवधि के लिए दीर्घकालिक करार कर रही हैं। इतने लंबे अनुबंध कंपनियों की लंबी अवधि की वित्तीय स्थिरता को पुख्ता करते हैं, हालांकि इस क्षेत्र में इन अत्यंत दीर्घकालिक समझौतों के नवीनीकरण का कोई व्यापक पूर्व रिकॉर्ड अभी मौजूद नहीं है। मुंबई, हैदराबाद और विशाखापत्तनम में केंद्रित होगी अधिकांश क्षमता आने वाले समय में विकसित होने वाली कुल 6 गीगावाट की नई डेटा सेंटर क्षमता का लगभग 75 फीसदी हिस्सा मुख्य रूप से तीन तटीय और आईटी प्रमुख शहरों में तैयार होगा। इनमें मुंबई, हैदराबाद और विशाखापत्तनम सबसे बड़े केंद्र बनकर उभरेंगे। इन प्रमुख केंद्रों में हाई-पावर सर्वरों के संचालन और कूलिंग सिस्टम की जरूरत के चलते बिजली की खपत में भारी इजाफा दर्ज किया जाएगा। वित्तीय वर्ष 2030 तक डेटा सेंटर की वजह से होने वाली अतिरिक्त बिजली मांग विशाखापत्तनम शहर की मौजूदा अधिकतम बिजली मांग के लगभग 80 फीसदी तक पहुंच सकती है। इसी प्रकार मुंबई में यह अतिरिक्त मांग मौजूदा अधिकतम मांग के 60 फीसदी और हैदराबाद में करीब 20 फीसदी के बराबर रहने का अनुमान है। इन शहरों के स्थानीय पावर ग्रिड और वितरण नेटवर्क को इस आगामी उच्च मांग को संभालने के लिए तैयार रहना होगा। इसका आप पर असर डेटा सेंटर बुनियादी ढांचे में आने वाला 3 लाख करोड़ रुपये का निवेश देश में डिजिटल सेवाओं की गति और विश्वसनीयता को मजबूत करेगा, जिससे इंटरनेट उपयोगकर्ताओं और तकनीकी उद्योगों को सीधा लाभ मिलेगा। • भारत में: देश भर में ऑनलाइन सेवाओं, क्लाउड स्टोरेज और एआई टूल्स की प्रोसेसिंग स्पीड तेज और सुगम होगी। घरेलू स्तर पर डेटा स्टोर होने से इंटरनेट इकोसिस्टम को मजबूती मिलेगी और संबंधित सहायक उद्योगों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। • मुंबई, हैदराबाद और विशाखापत्तनम में: इन तीनों शहरों में डेटा सेंटरों की स्थापना से स्थानीय बिजली ग्रिड पर भारी दबाव बढ़ेगा और ऊर्जा आपूर्ति का दायरा बढ़ाना होगा। स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचे के निर्माण, रियल एस्टेट और पावर सेक्टर में बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक गतिविधियों को गति मिलेगी। • तकनीकी कारोबारियों के लिए: कम किराए और सस्ती बुनियादी लागत के चलते भारत में सर्वर स्पेस लेना 30 से 35 फीसदी तक सस्ता बना रहेगा। इसके परिणामस्वरूप स्टार्टअप्स और उद्यमों के लिए आईटी संचालन पर आने वाला वित्तीय खर्च काफी कम होगा। • ऊर्जा क्षेत्र के लिए: बिजली उपयोगिताओं और ग्रिड ऑपरेटरों को 2030 तक भारी मांग को संभालने के लिए अपने सबस्टेशनों और पारेषण लाइनों को अपग्रेड करना होगा। औद्योगिक बिजली उत्पादन और रिन्यूएबल ऊर्जा स्रोतों में निवेश की अनिवार्यता बढ़ेगी। ऐसा क्यों हुआ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उपकरणों के बढ़ते उपयोग, व्यापक कॉर्पोरेट डिजिटलीकरण और भारत के प्रतिस्पर्धी लागत लाभों ने डेटा सेंटर उद्योग में भारी निवेश को प्रेरित किया है। • एआई और कंप्यूटिंग की मांग: पारंपरिक सॉफ्टवेयर की तुलना में आधुनिक एआई और चैटबॉट टूल्स को चलाने के लिए विशाल सर्वर क्षमता और डेटा स्टोरेज की जरूरत होती है। कॉर्पोरेट जगत तेजी से क्लाउड सेवाओं पर शिफ्ट हो रहा है, जिसने बुनियादी ढांचे के विस्तार को अनिवार्य बना दिया है। • भारत में लागत का लाभ: जमीन, निर्माण और मजदूरी की दरें अन्य प्रतिस्पर्धी एशियाई बाजारों से लगभग 20 फीसदी कम हैं। किफायती बिजली दरों के जुड़ने से कुल किराया 30 से 35 फीसदी सस्ता पड़ता है, जिससे वैश्विक ऑपरेटर तेजी से भारत का रुख कर रहे हैं। • लंबी अवधि के व्यावसायिक अनुबंध: हाइपरस्केलर्स और टेक कंपनियां 15 से 20 वर्षों के पट्टे पर अभी से क्षमता बुक कर रही हैं। आगामी क्षमता का लगभग 50 फीसदी पहले ही आरक्षित हो चुका है, जिससे निवेशकों को अपने पूंजीगत व्यय पर सुरक्षित रिटर्न का भरोसा मिल रहा है। सवाल-जवाब 1. डेटा सेंटर सेक्टर में अगले चार वर्षों में कितना निवेश होने का अनुमान है? अगले चार वित्त वर्षों में इस क्षेत्र में 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश होने की संभावना जताई गई है। 2. मार्च 2030 तक भारत में डेटा सेंटर की क्षमता कितनी बढ़ जाएगी? देश में डेटा सेंटर की क्षमता करीब पांच गुना बढ़कर 7.5 गीगावाट तक पहुंचने का अनुमान है। 3. वैश्विक कंपनियों के लिए भारत में डेटा सेंटर स्थापित करना क्यों किफायती है? निर्माण, जमीन और मजदूरी की लागत 20 फीसदी और कम किराए की दरें 30 से 35 फीसदी तक सस्ती होने के कारण भारत में डेटा सेंटर बनाना बेहद किफायती है। 4. नई क्षमता का अधिकांश हिस्सा किन शहरों में स्थापित होगा? आगामी 6 गीगावाट क्षमता का करीब 75 फीसदी हिस्सा मुंबई, हैदराबाद और विशाखापत्तनम में स्थापित किया जाएगा। 5. डेटा सेंटर अनुबंधों की समय सीमा में क्या बदलाव आया है? कंपनियों के अनुबंध पहले 10 से 12 वर्षों के होते थे, जिनकी अवधि अब बढ़कर 15 से 20 वर्ष हो गई है। 6. डेटा सेंटर विस्तार से इन शहरों की बिजली मांग पर क्या प्रभाव पड़ेगा? वित्त वर्ष 2030 तक विशाखापत्तनम की मौजूदा पीक मांग के 80 फीसदी, मुंबई के 60 फीसदी और हैदराबाद के 20 फीसदी के बराबर बिजली डेटा सेंटरों में खपत हो सकती है। https://trendkia.com/business/india-men-data-center-kshamata-pancha-guna-barhane-ki-taiyari-chara-varshon-men-hoga-3-lakha-karora-rupaye-ka-bara-nivesha-55889 TrendKia — Har trend, sabse pehle.