{
  "type": "article",
  "title": "इंडोनेशियाई सेंट्रल बैंक के गवर्नर का अचानक इस्तीफा, क्या लौटने वाला है 1997 का भीषण आर्थिक संकट",
  "summary": "इंडोनेशिया के केंद्रीय बैंक के गवर्नर पेरी वारजियो के अचानक इस्तीफे के बाद दुनिया भर के बाजारों में हलचल मच गई है। विश्लेषकों का मानना है कि सरकारी दबाव के कारण देश एक बार फिर 1997 के विनाशकारी वित्तीय संकट की ओर बढ़ रहा है।",
  "content": "इंडोनेशिया की अर्थव्यवस्था इस समय एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर खड़ी है, जब वहां के केंद्रीय बैंक के प्रमुख ने अपने पद से अचानक किनारा कर लिया है। पेरी वारजियो के इस तरह रातों-रात हटने के पीछे हालांकि निजी कारणों का हवाला दिया गया है, लेकिन वैश्विक बाजारों और वित्तीय विशेषज्ञों के बीच इसे लेकर भारी चिंता पैदा हो गई है। जानकारों का कहना है कि यह घटनाक्रम किसी राजनीतिक तख्तापलट से कम नहीं है और इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। इस अचानक हुए घटनाक्रम के बाद देश के शेयर बाजार में भी तुरंत असर दिखाई दिया, जिससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या एशिया की इस प्रमुख अर्थव्यवस्था में एक बार फिर से इतिहास खुद को दोहराने जा रहा है।\n\n1997-98 की खौफनाक यादें और डर\nजब भी इंडोनेशिया के पुराने आर्थिक इतिहास को खंगाला जाता है, तो नब्बे के दशक के आखिरी साल लोगों के ज जेहन में सिहरन पैदा कर देते हैं। वह ऐसा दौर था जब वहां की मुद्रा रुपिया का मूल्य बेहद गिर गया था, देश की सड़कों पर आम जनता का गुस्सा फूट पड़ा था, बड़े पैमाने पर दंगे भड़क उठे थे और तत्कालीन तानाशाह सुहार्तो को तीन दशकों से अधिक समय तक सत्ता में रहने के बाद आखिरकार देश छोड़कर भागना पड़ा था। आज के कई वित्तीय विश्लेषक चेतावनी दे रहे हैं कि मौजूदा राष्ट्रपति प्रबाओ सुबिआंतो की नीतियां देश को बिल्कुल उसी दिशा में धकेल रही हैं, जिससे आने वाले समय में एक भयंकर वित्तीय संकट पैदा होने की पूरी आशंका जताई जा रही है।\n\nप्रमुख चेहरों की भूमिका और नीतियां\nइस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में देश के कुछ चुनिंदा शीर्ष अधिकारी और नेता शामिल हैं। पेरी वारजियो ने अपने जीवन के चार दशक इस केंद्रीय बैंक को समर्पित किए थे, और उनका मुख्य दायित्व देश की आर्थिक सेहत को सुरक्षित रखना, बढ़ती महंगाई पर लगाम कसना और लगातार कमजोर हो रही मुद्रा को संभालना था। दूसरी तरफ, राष्ट्रपति प्रबाओ सुबिआंतो ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान जनता से यह वादा किया था कि वे देश की अर्थव्यवस्था को तीव्र गति से आगे बढ़ाएंगे और किसी भी परिस्थिति में आठ प्रतिशत की शानदार वृद्धि दर हासिल करके दिखाएंगे। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए वित्त मंत्री पुरबाया युधि सादेवा पूरी ताकत से जुटे हुए हैं, जिन्हें राष्ट्रपति का बेहद करीबी माना जाता है और उनका एकमात्र उद्देश्य बाजार में भारी मात्रा में नकदी झोंकना है ताकि लोग आसानी से कर्ज लेकर ज्यादा खर्च करें।\n\nपुराने संकट का इतिहास और वर्तमान स्थितियां\nपिछली शताब्दी के आखिरी वर्षों में जब थाईलैंड से एक वित्तीय संकट शुरू होकर इंडोनेशिया तक पहुंचा था, तो वहां का आर्थिक ढांचा ताश के पत्तों की तरह बिखर गया था। उस समय एक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपिया की कीमत ढाई हजार हुआ करती थी, जो कुछ ही महीनों के भीतर पंद्रह हजार के आंकड़े को पार कर गई थी, और देश में महंगाई इतनी अधिक बढ़ गई थी कि आम नागरिकों के लिए दो जून की रोटी जुटाना भी बहुत कठिन हो गया था। उस दौर में केंद्रीय बैंक पूरी तरह स्वतंत्र नहीं था बल्कि राजनेताओं के नियंत्रण में काम करता था, जो अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए बैंक पर दबाव बनाते थे कि बाजार में अवांछित रूप से पैसा झोंका जाए। उस समय विदेशी निवेशकों ने जब यह मनमानी देखी, तो उन्होंने रातों-रात अपना सारा पैसा वहां से निकाल लिया और देश दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गया। आज के समय में भी कुछ वैसी ही परिस्थितियां बनती हुई नजर आ रही हैं, क्योंकि सरकार हर हाल में आठ प्रतिशत की उच्च वृद्धि दर चाहती है और दूसरी तरफ पश्चिम एशिया में तनाव के चलते कच्चे तेल के दाम चढ़ रहे हैं, जिससे विदेशी निवेशक अपनी पूंजी निकाल रहे हैं।\n\nविवादों के घेरे में आई तरलता और नीतियां\nहाल ही में वित्त मंत्री ने अपनी प्रशासनिक ताकत का इस्तेमाल करते हुए केंद्रीय बैंक के खातों से भारी भरकम दो सौ ट्रिलियन रुपिया निकालकर सीधे सरकारी बैंकों में स्थानांतरित कर दिए थे, जिसके पीछे तर्क यह था कि इससे बाजार में ऋण प्रवाह तेज होगा। इस कदम से केंद्रीय बैंक के भीतर भारी घबराहट फैल गई क्योंकि अधिकारियों को अंदेशा था कि इतनी अधिक मात्रा में मुद्रा बाजार में आने से महंगाई बेलगाम हो जाएगी और मुद्रा पूरी तरह डूब जाएगी। हालांकि शुरुआत में बैंक प्रमुख ने इस पैसे को वापस मंगवा लिया था, लेकिन कुछ ही हफ्तों के भीतर वित्त मंत्री ने अपनी जिद पर अड़ते हुए वह राशि दोबारा सरकारी बैंकों में झोंक दी। इसके अलावा, वित्त मंत्री ने सार्वजनिक रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान केंद्रीय बैंक की नीतियों की आलोचना करना शुरू कर दिया और सारी असफलता का ठीकरा गवर्नर के सिर फोड़ दिया, जबकि ऐसी संस्थाओं को राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रखा जाना चाहिए था।\n\nस्वायत्तता पर मंडराता खतरा और राजनीतिक नियुक्तियां\nअंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने नब्बे के दशक के संकट के बाद इंडोनेशिया को यह सख्त सलाह दी थी कि केंद्रीय बैंक को सरकारी चंगुल से पूरी तरह मुक्त रखा जाए, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान राष्ट्रपति ने इस स्वायत्तता को समाप्त करने की पूरी तैयारी कर ली है। देश की संसद ने हाल ही में एक ऐसा कानून पारित किया है जिसके माध्यम से राजनेताओं को यह अधिकार मिल गया है कि वे केंद्रीय बैंक को सीधे तौर पर बाध्यकारी निर्देश दे सकें, यानी अब बैंक को हर हाल में सरकार के आदेश मानने ही होंगे। इसके अलावा, राष्ट्रपति ने अपने ही भतीजे थॉमस जिवानडोनो को केंद्रीय बैंक का डिप्टी गवर्नर नियुक्त कर दिया है ताकि सरकार की हर गतिविधि पर सीधी नजर रखी जा सके, और पेरी से पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध वित्त मंत्री श्री मुल्यानी इंद्रावती को भी कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था।\n\nवैश्विक परिदृश्य और अन्य देशों पर असर\nयह पूरा घटनाक्रम केवल एक देश की भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर के विकासशील देशों के लिए एक बड़ा सबक प्रस्तुत करता है। इस समय भारतीय रुपया भी दबाव का सामना कर रहा है, लेकिन देश का केंद्रीय बैंक पूरी मजबूती और स्वायत्तता के साथ अपने निर्णय ले रहा है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करने के बावजूद केवल राजनीतिक वादों के फेर में पड़ने के बजाय समग्र आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता देता है। इसके बावजूद, इंडोनेशिया के बाजारों में चल रही इस उथल-पुथल ने पूरे एशियाई क्षेत्र के निवेशकों और नीति निर्माताओं की नींद उड़ा दी है।\n\nइसका आप पर असर\nएशियाई बाजार में: निवेशकों की चिंता बढ़ने से क्षेत्रीय मुद्राओं और स्टॉक एक्सचेंजों पर अतिरिक्त दबाव देखने को मिल सकता है।\n\nभारत में: कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों और मुद्रा में उतार-चढ़ाव के कारण आयात लागत पर असर पड़ सकता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. इंडोनेशिया के केंद्रीय बैंक के गवर्नर ने क्यों इस्तीफा दिया?\nपेरी वारजियो ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया और आधिकारिक तौर पर निजी कारणों का हवाला दिया गया, हालांकि विश्लेषक इसे सरकारी दबाव से जोड़ रहे हैं।\n\n2. 1997 के संकट के दौरान इंडोनेशिया में क्या हुआ था?\nउस दौर में करेंसी रुपिया का मूल्य भारी रूप से गिर गया था, देश में दंगे भड़क गए थे और सुहार्तो को अपनी सत्ता छोड़कर भागना पड़ा था।\n\n3. मौजूदा राष्ट्रपति प्रबाओ सुबिआंतो की क्या आर्थिक प्राथमिकता है?\nराष्ट्रपति किसी भी कीमत पर देश की अर्थव्यवस्था में आठ प्रतिशत की शानदार वृद्धि दर हासिल करना चाहते हैं।\n\n4. वित्त मंत्री पुरबाया युधि सादेवा ने क्या कदम उठाया था?\nउन्होंने केंद्रीय बैंक से दो सौ ट्रिलियन रुपिया निकालकर सरकारी बैंकों में डाल दिए थे ताकि ऋण प्रवाह को बढ़ावा मिल सके।\n\n5. थॉमस जिवानडोनो कौन हैं?\nवह राष्ट्रपति के भतीजे हैं जिन्हें केंद्रीय बैंक में डिप्टी गवर्नर के पद पर नियुक्त किया गया है।",
  "url": "https://trendkia.com/business/indoneshiyai-central-bank-ke-governor-ka-achanaka-istipha-kya-lautane-vala-hai-1997-ka-bhishana-arthika-snkata-11459",
  "category": "व्यापार",
  "publishedAt": "2026-07-28",
  "tags": [
    "इंडोनेशिया",
    "सेंट्रल बैंक",
    "पेरी वारजियो",
    "प्रबाओ सुबिआंतो",
    "रुपिया",
    "आर्थिक संकट"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}