{
  "type": "article",
  "title": "जलभराव हो या सूखा, दोनों में सुरक्षित रहेगी सोयाबीन की फसल, ये किस्में देंगी बंपर पैदावार",
  "summary": "मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में घटते सोयाबीन रकबे के बीच कृषि विशेषज्ञों ने सही किस्म और मेढ़-कूंड पद्धति को बेहतर उत्पादन की कुंजी बताया है, जिससे कम और ज्यादा बारिश दोनों में फसल बची रहती है।",
  "content": "मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में खरीफ सीजन की पहचान रही सोयाबीन अब किसानों के लिए चिंता का सबब बनती जा रही है। बीते कुछ सालों में लगातार होते नुकसान, घटते मुनाफे और मौसम की अनिश्चितता ने कई किसानों को इस फसल से दूर कर दिया है, और यही वजह है कि इलाके में सोयाबीन का रकबा घट गया है। लेकिन कृषि से जुड़े जानकारों का मानना है कि अगर वैज्ञानिक तरीके से खेती की जाए तो यही फसल दोबारा फायदे का सौदा बन सकती है।\n\nकिसान सलाहकार अवनीश पटेल के मुताबिक बेहतर उत्पादन के लिए सबसे जरूरी है कि किसान सोच-समझकर और योजना बनाकर खेती करें। सोयाबीन की कामयाब खेती तीन बातों पर टिकी है, सही किस्म का चुनाव, बुआई का तरीका और खेत की भौगोलिक स्थिति। खेत समतल है या ऊंचा-नीचा, वहां पानी भरने की आशंका है या नहीं, इन सबको परखने के बाद ही बीज का चयन करना चाहिए।\n\nबीज चुनने से पहले इन बातों पर दें ध्यान\nअवनीश पटेल बताते हैं कि बीज तय करते समय मिट्टी की गुणवत्ता, खेत में मौजूद प्राकृतिक संसाधन और जमीन के आकार को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऊंचाई वाले इलाकों के लिए जल्दी पकने वाली किस्में ज्यादा मुफीद रहती हैं। ऐसी जगहों के लिए JS-2034, JS-2029 और JS-9560 बेहतर विकल्प माने जाते हैं, जो महज 80 से 85 दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं।\n\nवहीं मध्यम अवधि में पकने वाली किस्मों की बात करें तो JS-2098 और JS-2172 किसानों के लिए फायदेमंद साबित होती हैं। ये किस्में 90 से 95 दिनों में तैयार होती हैं और इनमें 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देने की क्षमता होती है।\n\nमेढ़-कूंड पद्धति क्यों है फायदे का सौदा\nकृषि वैज्ञानिक शैलेंद्र गौतम का कहना है कि ज्यादा पैदावार चाहिए तो किसानों को रिज एंड फेरो यानी मेढ़-कूंड पद्धति से सोयाबीन की बुआई करनी चाहिए। इस तकनीक में एक खास सीड ड्रिल का इस्तेमाल होता है, जिससे बुआई के साथ-साथ खेत में मेढ़ बनती जाती है और बीज मेढ़ के ऊपर गिरते हैं।\n\nइस तरीके का सबसे बड़ा फायदा यह है कि जब बारिश हद से ज्यादा हो जाए, तब भी पौधे जलभराव से बचे रहते हैं। मेढ़ के ऊपर होने की वजह से पौधों में सड़न और फंगस लगने का खतरा काफी कम हो जाता है। दूसरी तरफ, कूंड में जमा पानी जरूरत के वक्त पौधों को नमी देता रहता है। यही वजह है कि कम बारिश हो या ज्यादा, दोनों ही हालात में फसल सुरक्षित रहती है। जानकारों का कहना है कि आधुनिक तकनीक अपनाकर किसान कम लागत में बेहतर पैदावार लेकर अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं।\n\nइसका आप पर असर\n• भारत में: सोयाबीन उगाने वाले किसान जल्दी पकने वाली सही किस्म और मेढ़-कूंड बुआई अपनाकर कम और ज्यादा बारिश दोनों में फसल का नुकसान घटा सकते हैं और कम लागत में बेहतर पैदावार ले सकते हैं।\n• मध्य प्रदेश में: विंध्य क्षेत्र के किसान, जहां घाटे की वजह से सोयाबीन का रकबा घटा है, इन तकनीकों से दोबारा इस फसल से मुनाफा कमा सकते हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. विंध्य क्षेत्र में सोयाबीन का रकबा क्यों घट रहा है?\nबीते कुछ सालों में लगातार नुकसान, कम मुनाफे और मौसम की अनिश्चितता के चलते कई किसान सोयाबीन की खेती से दूरी बना रहे हैं।\n\n2. ऊंचाई वाले इलाकों के लिए कौन सी सोयाबीन किस्में बेहतर हैं?\nऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए जल्दी पकने वाली किस्में JS-2034, JS-2029 और JS-9560 बेहतर मानी जाती हैं, जो 80 से 85 दिनों में तैयार हो जाती हैं।\n\n3. मध्यम अवधि की कौन सी किस्में फायदेमंद हैं और कितनी पैदावार देती हैं?\nJS-2098 और JS-2172 मध्यम अवधि की फायदेमंद किस्में हैं, जो 90 से 95 दिनों में तैयार होती हैं और 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन दे सकती हैं।\n\n4. मेढ़-कूंड (रिज एंड फेरो) पद्धति क्या है?\nयह बुआई की एक तकनीक है जिसमें खास सीड ड्रिल से खेत में मेढ़ बनती जाती है और बीज मेढ़ के ऊपर गिरते हैं।\n\n5. मेढ़-कूंड पद्धति से फसल को क्या फायदा होता है?\nज्यादा बारिश में पौधे जलभराव से बचे रहते हैं, सड़न और फंगस का खतरा घटता है, और कूंड में जमा पानी जरूरत पड़ने पर पौधों को नमी देता रहता है।\n\n6. बीज चुनते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?\nमिट्टी की गुणवत्ता, खेत के प्राकृतिक संसाधन, जमीन का आकार, खेत समतल है या ऊंचा-नीचा और जलभराव की आशंका को परखकर बीज चुनना चाहिए।",
  "url": "https://trendkia.com/business/jalabharava-ho-ya-sukha-donon-men-surakshita-rahegi-soyabina-ki-phasala-ye-kismen-dengi-bnpara-paidavara-2932",
  "category": "व्यापार",
  "publishedAt": "2026-06-25",
  "tags": [
    "सोयाबीन की खेती",
    "सोयाबीन की किस्में",
    "मेढ़-कूंड पद्धति",
    "खरीफ फसल",
    "विंध्य क्षेत्र",
    "मध्य प्रदेश किसान",
    "कृषि सलाह"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}