जोधपुर में कृषि विश्वविद्यालय ने दी वैज्ञानिक बकरी पालन की ट्रेनिंग, पशुपालक सीख रहे अतिरिक्त कमाई के तरीके जोधपुर के कृषि विश्वविद्यालय में आयोजित सात दिवसीय कार्यशाला में किसानों और युवाओं को वैज्ञानिक बकरी पालन की बारीकियां सिखाई गईं। इस पहल का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक खेती के साथ पशुपालन के जरिए ग्रामीण आय बढ़ाना और बिचौलियों पर निर्भरता खत्म करना है। खेती की बढ़ती लागत और अनिश्चित पैदावार के बीच ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए पशुपालन एक मजबूत आधार बनकर उभरा है। इसी दिशा में जोधपुर स्थित कृषि विश्वविद्यालय के किसान कौशल विकास केंद्र ने एक विशेष पहल करते हुए सात दिवसीय वैज्ञानिक बकरी पालन प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में स्थानीय किसानों और ग्रामीण युवाओं को आधुनिक पशुपालन तकनीकों से अवगत कराया गया ताकि वे कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त कर अपनी नियमित आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकें। पारंपरिक खेती के साथ पशुपालन का समन्वय प्रशिक्षण सत्र के दौरान कृषि विशेषज्ञों ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि केवल फसलों की उपज पर निर्भर रहने के बजाय किसानों को पशुपालन को सहायक व्यवसाय के रूप में अपनाना चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार, खेती और वैज्ञानिक बकरी पालन का संतुलन किसानों को विपरीत मौसम या बाजार के उतार-चढ़ाव के दौरान भी स्थिर वित्तीय सहायता प्रदान करता है। इसके अलावा, सरकारी स्तर पर भी किसानों की आमदनी बढ़ाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से कई कल्याणकारी योजनाएं संचालित की जा रही हैं जिनका लाभ उठाकर किसान अपनी कार्यकुशलता में सुधार कर सकते हैं। मूल्य संवर्धन और सीधे बाजार से जुड़ाव प्रशिक्षण शिविर में बिचौलियों की भूमिका को समाप्त करने और उत्पादकों को उनकी मेहनत का पूरा मूल्य दिलाने की रणनीतियों पर विस्तृत चर्चा हुई। किसानों को सलाह दी गई कि वे अपने उत्पादों को सीधे उपभोक्ताओं या बड़े बाजारों तक पहुंचाएं। इसके अतिरिक्त, बकरी पालन को केवल दूध बिक्री तक सीमित न रखकर उसके मूल्य संवर्धन पर ध्यान देने की आवश्यकता जताई गई। विशेषज्ञों ने बताया कि बकरी के दूध का उपयोग साबुन, सौंदर्य प्रसाधन और अन्य उच्च मूल्य वाले उत्पाद बनाने में किया जा सकता है। इस प्रकार के प्रसंस्कृत उत्पाद तैयार करने से किसानों के लिए कमाई के नए रास्ते खुलते हैं। आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक प्रबंधन पशुपालकों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए शिविर में कई वैज्ञानिक तौर-तरीकों की जानकारी दी गई। इनमें बकरी की उन्नत नस्लों का चयन, संतुलित और वैज्ञानिक आहार प्रबंधन, समय पर आवश्यक टीकाकरण तथा स्वच्छ एवं सुरक्षित आवास व्यवस्था शामिल है। विशेषज्ञों ने किसानों को यह भी सुझाया कि वे आपस में समूह बनाकर अपने उत्पादों की ब्रांडिंग और विपणन करें। संगठित रूप से काम करने से न केवल बाजार में मोलभाव करने की क्षमता बढ़ती है बल्कि विपणन लागत में भी कमी आती है। स्वरोजगार और ग्रामीण पलायन पर रोक प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले युवाओं और किसानों ने साझा किया कि पहले वे पारंपरिक तरीकों से बकरी पालन करते थे जिससे सीमित लाभ होता था। हालांकि, इस सात दिवसीय शिविर में मिली वैज्ञानिक जानकारियों से उनका आत्मविश्वास बढ़ा है और वे अब इसे एक व्यावसायिक उद्यम के रूप में देखने लगे हैं। कृषि विश्वविद्यालय का किसान कौशल विकास केंद्र अब तक एक हजार से अधिक किसानों और युवाओं को इस तरह का व्यावहारिक प्रशिक्षण दे चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ग्रामीण युवा वैज्ञानिक पशुपालन और प्रसंस्करण तकनीकों को अपनाते हैं, तो यह गांवों में स्वरोजगार के बेहतर अवसर पैदा करेगा और काम की तलाश में शहरों की ओर होने वाले पलायन को रोकने में भी सहायक सिद्ध होगा। इसका आप पर असर भारत में: वैज्ञानिक बकरी पालन और वैल्यू एडिशन की तकनीकों से छोटे किसानों को फसल नुकसान के बावजूद नियमित अतिरिक्त आय हासिल होगी। जोधपुर में: कृषि विश्वविद्यालय के प्रशिक्षण से स्थानीय युवाओं और पशुपालकों को गांव में ही स्वरोजगार मिलेगा और शहरों की ओर पलायन पर रोक लगेगी। सवाल-जवाब 1. वैज्ञानिक बकरी पालन प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन कहां किया गया? यह प्रशिक्षण कार्यक्रम जोधपुर स्थित कृषि विश्वविद्यालय के किसान कौशल विकास केंद्र द्वारा आयोजित किया गया। 2. यह प्रशिक्षण शिविर कितने दिनों का था? यह सात दिवसीय वैज्ञानिक बकरी पालन प्रशिक्षण शिविर था। 3. बकरी के दूध से अतिरिक्त आय अर्जित करने के लिए क्या सुझाव दिए गए? विशेषज्ञों ने बकरी के दूध से मूल्यवर्धित उत्पाद जैसे साबुन और कॉस्मेटिक तैयार कर अतिरिक्त कमाई करने का सुझाव दिया। 4. कृषि विश्वविद्यालय द्वारा अब तक कितने किसानों को प्रशिक्षित किया जा चुका है? कृषि विश्वविद्यालय के किसान कौशल विकास केंद्र द्वारा अब तक एक हजार से अधिक किसानों और युवाओं को प्रशिक्षित किया जा चुका है। प्रेरणा और सबक सफलता की कुंजी और सीख: • विविधीकरण: केवल फसल पर निर्भर न रहकर पशुपालन को सहायक उद्यम बनाएं। • वैल्यू एडिशन: कच्चे उत्पाद बेचने के बजाय प्रोसेसिंग (जैसे साबुन या कॉस्मेटिक) से लाभ बढ़ाएं। • वैज्ञानिक दृष्टिकोण: उन्नत नस्ल चयन, समय पर टीकाकरण और संतुलित आहार से उत्पादन बढ़ाएं। • सामूहिक विपणन: किसानों का समूह बनाकर ब्रांडिंग करें ताकि बिचौलियों से मुक्ति मिले। https://trendkia.com/business/jodhpur-men-krishi-vishvavidyalaya-ne-di-vaijnanika-bakari-palana-ki-treninga-pashupalaka-sikha-rahe-atirikta-kamai-ke-tarike-14284 TrendKia — Har trend, sabse pehle.