कन्नौज के रूह इत्र की महक क्यों बिकती है 50 लाख रुपये से भी ज्यादा में कन्नौज में सदियों पुरानी पारंपरिक विधि से बनने वाले रूह इत्र की कीमत लाखों में पहुंचती है, जहां दुर्लभ किस्मों के दाम 50 लाख रुपये के पार हैं। उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक शहर कन्नौज सदियों से खुशबू का वैश्विक केंद्र माना जाता रहा है, जहां पारंपरिक रूप से तैयार होने वाले इत्र पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान रखते हैं। इसी समृद्ध परंपरा के बीच एक खास श्रेणी आती है जिसे इत्रों का बादशाह कहा जाता है, यानी रूह इत्र। यह साधारण इत्र से बिल्कुल अलग होता है क्योंकि इसमें फूलों और प्राकृतिक तत्वों का शुद्ध अर्क मौजूद रहता है। गर्मी के मौसम में यह न केवल मनमोहक सुगंध फैलाता है, बल्कि शरीर को प्राकृतिक ठंडक पहुंचाने का काम भी करता है। लाखों में तय होती है रूह इत्र की कीमत बाजार में मिलने वाले आम इत्र और रूह इत्र के दामों में जमीन-आसमान का फर्क देखने को मिलता है। इस शुद्ध प्राकृतिक अर्क की कीमतें इतनी अधिक होती हैं कि कोई भी हैरान रह जाए। उदाहरण के तौर पर, रूह गुलाब की कीमत 20 से 22 लाख रुपये तक दर्ज की जाती है। इसके अलावा कई अन्य प्रकार के रूह इत्र बाजार में 10 से 15 लाख रुपये के बीच बिकते हैं। वहीं इस श्रेणी में आने वाला एक बेहद दुर्लभ रूह इत्र 50 लाख रुपये से भी अधिक मूल्य पर मिलता है, जो इसकी असाधारण शुद्धता और निर्माण की जटिलता को दर्शाता है। डेग-भभका और भट्टी वाली सदियों पुरानी निर्माण कला कन्नौज के कुशल कारीगर रूह इत्र तैयार करने के लिए किसी आधुनिक मशीन का नहीं, बल्कि सदियों पुरानी डेग-भभका-भट्टी वाली हाइड्रो डिस्टिलेशन तकनीक का सहारा लेते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में तांबे की बड़ी डेग में ताजे फूल, पानी और चुनिंदा जड़ी-बूटियों को भरा जाता है। इसके बाद भट्टी की धीमी आंच पर इसे कई घंटों तक पकाया जाता है। भट्टी से निकलने वाली भाप को बांस की पारंपरिक नलियों के जरिए दूसरे बर्तन में पहुंचाया जाता है, जहां वह भाप ठंडी होकर शुद्ध सुगंधित तेल यानी अर्क में तब्दील हो जाती है। खस और गुलाब के अर्क की अलग पहचान मौसम के हिसाब से रूह इत्र की मांग में विविधता देखी जाती है। गर्मी के दिनों में रूह खस को सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है, जिसे खस की प्राकृतिक जड़ों से तैयार किया जाता है और इसकी महक पहली बारिश की सोंधी मिट्टी जैसी ठंडक देती है। दूसरी तरफ रूह गुलाब को गुलाब की ताजी पंखुड़ियों से बनाया जाता है, जिसकी मीठी, नाजुक और ताजगीभरी सुगंध इसे बेहद खास बना देती है। चूंकि यह पूरा अर्क बिना किसी कृत्रिम केमिकल के विशुद्ध प्राकृतिक रूप से तैयार होता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इसकी भारी मांग बनी रहती है। पीढ़ियों से संजोई गई ऐतिहासिक विरासत इत्र व्यापारी निशीष तिवारी के मुताबिक कन्नौज के स्थानीय कारीगर इस बेमिसाल हुनर को पीढ़ी-दर-पीढ़ी बेहद हिफाजत के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि रूह इत्र केवल एक खुशबूदार उत्पाद नहीं है, बल्कि यह कन्नौज की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का प्रतीक है, जहां बनने वाले हर इत्र की अपनी विशिष्ट सुगंध और पहचान होती है। इसका आप पर असर पारंपरिक इत्र कला की इस जानकारी से शुद्ध प्राकृतिक सुगंध के कद्रदानों और स्थानीय उद्योगों को कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं। • भारत में: प्राकृतिक और बिना केमिकल वाले सुगंध उत्पादों की तलाश करने वाले लोगों को कन्नौज के प्रामाणिक अर्क की सही पहचान मिलती है। इससे घरेलू बाजार में पारंपरिक इत्र कला को प्रोत्साहन मिलता है। • कन्नौज में: इस विरासत शिल्प की भारी अंतरराष्ट्रीय मांग से स्थानीय कारीगरों और व्यापारियों के रोजगार को मजबूती मिलती है। इससे आने वाली पीढ़ियां भी इस प्राचीन हाइड्रो डिस्टिलेशन हुनर को सहेजने के लिए प्रेरित होती हैं। • कीमत और गुणवत्ता: बेहद सीमित उत्पादन और शुद्ध अर्क होने के कारण साधारण इत्र की तुलना में इसकी कीमत कई गुना अधिक होती है। खरीदार यह समझ सकते हैं कि 50 लाख रुपये तक की कीमत इसकी दुर्लभता और जटिल निर्माण प्रक्रिया के कारण है। • उपयोगिता: गर्मियों में रूह खस का चुनाव प्राकृतिक शीतलता और सोंधी खुशबू के लिए सबसे उत्तम विकल्प माना जाता है। उपभोक्ता कृत्रिम रसायनों से बचते हुए विशुद्ध अर्क का लाभ ले सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ कन्नौज के रूह इत्र की असाधारण कीमतें और इसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान इसके विशुद्ध प्राकृतिक निर्माण और दुर्लभ कारीगरी का सीधा परिणाम हैं। • शून्य रसायन और शुद्धता: इस इत्र को बनाने में किसी भी प्रकार के सिंथेटिक रसायन का उपयोग नहीं किया जाता। यह पूरी तरह से फूलों और जड़ों का गाढ़ा प्राकृतिक अर्क होता है, जिससे इसकी शुद्धता बेजोड़ रहती है। • जटिल निर्माण विधि: कारीगर कई सदियों पुरानी तांबे की डेग, भभका और भट्टी वाली हाइड्रो डिस्टिलेशन विधि का प्रयोग करते हैं। इस धीमी आंच की प्रक्रिया में घंटों की कड़ी निगरानी और मानवीय कौशल की आवश्यकता होती है। • कच्चे माल की भारी मात्रा: शुद्ध रूह की कुछ बूंदें तैयार करने के लिए विशाल मात्रा में ताजे फूलों और खस की जड़ों की खपत होती है। इस दुर्लभता और प्राकृतिक अर्क की सीमित उपलब्धता के कारण दुर्लभ किस्मों की कीमत 50 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। सवाल-जवाब 1. रूह इत्र को इतना महंगा क्यों माना जाता है? यह पूरी तरह से प्राकृतिक फूलों और जड़ी-बूटियों के अर्क से बिना किसी केमिकल के बनता है, जिसके निर्माण में अत्यधिक समय और कच्चा माल लगता है। 2. रूह गुलाब और सबसे दुर्लभ रूह इत्र की कीमत क्या है? रूह गुलाब 20 से 22 लाख रुपये तक बिकता है, जबकि सबसे दुर्लभ रूह इत्र की कीमत 50 लाख रुपये से भी अधिक है। 3. रूह इत्र बनाने में कौन-सी पारंपरिक तकनीक उपयोग होती है? इसे बनाने के लिए सदियों पुरानी डेग-भभका-भट्टी वाली हाइड्रो डिस्टिलेशन तकनीक का उपयोग किया जाता है। 4. गर्मियों में कौन-सा रूह इत्र सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है? गर्मी के मौसम में रूह खस सबसे लोकप्रिय है क्योंकि यह खस की जड़ों से बनता है और सोंधी मिट्टी जैसी ठंडक भरी खुशबू देता है। https://trendkia.com/business/kannauj-ke-ruha-itra-ki-mahaka-kyon-bikati-hai-50-lakha-rupaye-se-bhi-jyada-men-36596 TrendKia — Har trend, sabse pehle.