# कर्ज पर ब्याज दरें बढ़ने के आसार, अक्टूबर में भारतीय रिजर्व बैंक कर सकता है रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की वृद्धि

> पश्चिम एशिया में गहराते तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच आगामी मौद्रिक नीति समीक्षा में नीतिगत दरों में बढ़ोतरी का अनुमान जताया जा रहा है। 16 वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों और बैंकरों के एक सर्वेक्षण के अनुसार केंद्रीय बैंक रेपो दर को 5.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर सकता है।

**Type:** article · **Category:** व्यापार · **Published:** 2026-10-04 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/business/karja-para-byaja-daren-barhane-ke-asara-aktubara-men-rbi-kara-sakata-hai-repo-dara-men-0-25-pratishata-ki-vriddhi-42798 · **Language:** Hindi
**Tags:** रेपो रेट, भारतीय रिजर्व बैंक, महंगाई, ब्याज दर, कच्चा तेल, मौद्रिक नीति

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच कर्जदारों की ईएमआई बढ़ने की संभावना नजर आ रही है। वित्तीय विश्लेषकों और बैंकिंग क्षेत्र के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक आगामी अक्टूबर की बैठक में रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी का फैसला ले सकता है। 16 अर्थशास्त्रियों और वरिष्ठ बैंक अधिकारियों के एक ताजा सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि यदि मौद्रिक नीति समिति ब्याज दरों में यह वृद्धि करती है, तो यह देश की ब्याज दर व्यवस्था में एक बड़े नीतिगत मोड़ का स्पष्ट संकेत होगा।

## रेपो दर का पिछला रिकॉर्ड और मौजूदा स्थिति
केंद्रीय बैंक की दरों के पिछले इतिहास पर नजर डालें तो रेपो दर में आखिरी बार कटौती दिसंबर 2025 में दर्ज की गई थी। उस कटौती के बाद से ही नीतिगत दर 5.25 प्रतिशत के स्तर पर स्थिर बनी हुई है। वहीं अगर पिछली बढ़ोतरी की बात करें, तो वह फरवरी 2023 में की गई थी, जब नीतिगत दर को 0.25 प्रतिशत बढ़ाकर 6.50 प्रतिशत तक पहुंचाया गया था। इसके बाद पूरे वित्तीय वर्ष 2023-24 में केंद्रीय बैंक ने दरों में कोई फेरबदल नहीं किया और यथास्थिति बनाए रखी। इसके पश्चात 2025 में जाकर दरों में कटौती का सिलसिला शुरू हुआ था, जिसके चलते वर्तमान में भारतीय रिजर्व बैंक की रेपो दर 5.25 प्रतिशत पर टिकी हुई है।

## पश्चिम एशिया संकट और जिंसों की कीमतों का दबाव
यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की मुख्य आर्थिक सलाहकार कनिका पसरीचा के अनुसार, वैश्विक स्तर पर विभिन्न केंद्रीय बैंकों द्वारा नीतिगत दरों में की जा रही वृद्धि, मुद्रास्फीति के बढ़ते जोखिम और आर्थिक वृद्धि की मजबूत रफ्तार नीति-निर्माताओं को दरें बढ़ाने का ठोस आधार प्रदान करती हैं।

इसी तरह की राय क्रिसिल की मुख्य अर्थशास्त्री दीप्ति देशपांडे ने भी व्यक्त की है। उनका कहना है कि पिछली मौद्रिक समीक्षा के बाद से हालात तेजी से बदले हैं। मुख्य रूप से पश्चिम एशिया में संघर्ष फिर से भड़कने, ऊर्जा संकट और जिंसों के दामों में आई तेजी ने महंगाई के दबाव को काफी तेज कर दिया है। यदि यह भू-राजनीतिक और मूल्य दबाव आगे भी बना रहता है, तो आगामी दिनों में ब्याज दरों में और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

## मांग जनित मुद्रास्फीति पर मतभेद
हालांकि वित्तीय जगत के सभी विशेषज्ञ दर वृद्धि को लेकर पूरी तरह एकमत नहीं हैं। लार्सन एंड टुब्रो के समूह मुख्य अर्थशास्त्री सच्चिदानंद शुक्ला का विश्लेषण इससे अलग रुख दिखाता है। उनका मानना है कि केंद्रीय बैंक इस बार भी रेपो दर को 5.25 प्रतिशत के मौजूदा स्तर पर ही बनाए रखने का विकल्प चुन सकता है। उन्होंने इसके पीछे यह तर्क दिया है कि घरेलू अर्थव्यवस्था में फिलहाल मांग-आधारित महंगाई का कोई पुख्ता प्रमाण सामने नहीं आया है, इसलिए नीतिगत दरों में इजाफा करने से पहले केंद्रीय बैंक कुछ समय के लिए इंतजार कर सकता है।

## वित्त वर्ष 2026-27 में कई बार दर वृद्धि की संभावना
बाजार के अधिकांश विश्लेषकों का व्यापक अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान रेपो दर में कम से कम 2 बार की वृद्धि की जा सकती है। कई विश्लेषक तो पूरे वित्तीय वर्ष में कुल मिलाकर 2 से 3 बार तक ब्याज दरें बढ़ने की संभावना देख रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मुख्य मुद्रास्फीति में लगातार हो रही बढ़ोतरी को नियंत्रित करने के लिए मौद्रिक नीति के रुख को धीरे-धीरे सामान्य स्तर पर लाना आवश्यक हो सकता है।

## कच्चे तेल का 100 डॉलर पार जाना और ईंधन की कीमतें
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, खाद्य वस्तुओं में महंगाई का जोखिम और चौतरफा लागत दबाव केंद्रीय बैंक के अनुमानों को बदलने पर मजबूर कर सकते हैं। जानकारों का अनुमान है कि भारतीय रिजर्व बैंक वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अपने खुदरा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति अनुमान में संशोधन करते हुए इसे बढ़ा सकता है।

इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा, ''हाल ही में कच्चे तेल के भाव 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर जाने से पेट्रोल और डीजल के खुदरा बिक्री मूल्य में बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे मुद्रास्फीति का दबाव और गहराएगा। इस स्थिति के चलते खुदरा महंगाई के अनुमानों में ऊपर की ओर संशोधन करना जरूरी हो जाएगा।'' पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने से परिवहन लागत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर रोजमर्रा के सामानों की कीमतों पर पड़ना तय माना जा रहा है।

## इसका आप पर असर
यदि भारतीय रिजर्व बैंक आगामी बैठक में रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की वृद्धि करता है, तो आम नागरिकों के घरेलू बजट और कर्ज की ईएमआई पर सीधा असर पड़ेगा।

- **कर्ज की मासिक किस्त (ईएमआई):** फ्लोटिंग ब्याज दर वाले होम लोन, ऑटो लोन और पर्सनल लोन तुरंत महंगे हो जाएंगे। बैंकों द्वारा ब्याज दर बढ़ाने से मासिक किस्त की राशि बढ़ जाएगी या फिर कर्ज चुकाने की समयसीमा लंबी हो जाएगी।
- **पेट्रोल और डीजल के दाम:** अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने से घरेलू ईंधन की खुदरा कीमतें बढ़ सकती हैं। इसका असर दैनिक यात्रा खर्च के साथ-साथ माल ढुलाई की लागत पर भी देखने को मिलेगा।
- **फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज:** नीतिगत दरों में बढ़ोतरी का फायदा बैंक में पैसा जमा करने वाले बचतकर्ताओं को मिलेगा। बैंक एफडी और बचत खातों पर मिलने वाली ब्याज दरों में इजाफा कर सकते हैं, जिससे फिक्स्ड रिटर्न में सुधार होगा।
- **रोजमर्रा की वस्तुएं:** ईंधन महंगा होने से फल, सब्जियां और अन्य जरूरी सामानों के परिवहन खर्च में इजाफा हो सकता है। उपभोक्ताओं को अपनी दैनिक जरूरतों के लिए अधिक बजट आवंटित करना पड़ सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
वैश्विक ऊर्जा बाजार में अचानक आई तेजी और भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण नीतिगत दरों में बढ़ोतरी की पृष्ठभूमि तैयार हुई है। आयातित लागत दबाव के चलते केंद्रीय बैंक को अपनी मौद्रिक नीति सख्त करने पर विचार करना पड़ रहा है।

- **पश्चिम एशिया में संघर्ष:** पश्चिम एशिया में दोबारा भड़के तनाव के चलते वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने का खतरा बढ़ गया है। ऊर्जा और कमोडिटी आपूर्ति पर गहराते संशय ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में जिंसों की कीमतों को उछाल दिया है।
- **कच्चे तेल में तेजी:** अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल चुके हैं। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, जिससे घरेलू खुदरा महंगाई दर पर सीधा असर पड़ता है।
- **वैश्विक केंद्रीय बैंकों का रुख:** दुनिया भर के प्रमुख केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति को थामने के लिए दरों में फेरबदल कर रहे हैं। वैश्विक ब्याज दरों के साथ तालमेल बनाए रखने और पूंजी प्रवाह को संतुलित रखने के लिए घरेलू स्तर पर नीतिगत तालमेल जरूरी माना जा रहा है।
- **आगे की संभावित राह:** यदि भू-राजनीतिक हालात स्थिर नहीं होते हैं, तो केंद्रीय बैंक चालू वित्त वर्ष में दो से तीन बार तक दरों में इजाफा कर सकता है। हालांकि यदि मांग कमजोर रहती है, तो नीति निर्माता सख्त फैसलों को कुछ समय के लिए टाल भी सकते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. अक्टूबर में रेपो दर में कितनी बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया है?
अर्थशास्त्रियों और बैंक अधिकारियों के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक आगामी अक्टूबर बैठक में रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर सकता है।

### 2. वर्तमान में भारतीय रिजर्व बैंक की रेपो दर किस स्तर पर है?
वर्तमान में केंद्रीय बैंक की रेपो दर 5.25 प्रतिशत पर स्थिर है, जिसमें पिछली बार दिसंबर 2025 में कटौती की गई थी।

### 3. रेपो दर में आखिरी बार बढ़ोतरी कब की गई थी?
रेपो दर में अंतिम बार बढ़ोतरी फरवरी 2023 में की गई थी, जब इसे 0.25 प्रतिशत बढ़ाकर 6.50 प्रतिशत कर दिया गया था।

### 4. कच्चे तेल की कीमतों का महंगाई पर क्या प्रभाव पड़ रहा है?
कच्चे तेल के 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने से पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे खुदरा महंगाई दर में बढ़ोतरी की आशंका है।

### 5. क्या सभी अर्थशास्त्री दर बढ़ोतरी के पक्ष में हैं?
नहीं, लार्सन एंड टुब्रो के अर्थशास्त्री सच्चिदानंद शुक्ला का तर्क है कि मांग-आधारित महंगाई के ठोस प्रमाण न होने के कारण दरें 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रह सकती हैं।

### 6. वित्त वर्ष 2026-27 में कुल कितनी बार ब्याज दरें बढ़ने का अनुमान है?
विशेषज्ञों का मानना है कि वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान रेपो दर में 2 से 3 बार तक बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

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