# खाड़ी देशों की जोरदार वापसी: यूएई बना भारत का शीर्ष एलपीजी आपूर्तिकर्ता, अमेरिका पिछड़कर दूसरे पायदान पर

> सितंबर महीने में भारतीय ऊर्जा आयात में बड़ा फेरबदल हुआ है, जहां यूएई ने अमेरिका को पछाड़कर देश के सबसे बड़े एलपीजी सप्लायर का स्थान हासिल कर लिया। इसी दौरान ओमान ने एलएनजी आपूर्ति में अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए पहला स्थान प्राप्त किया।

**Type:** article · **Category:** व्यापार · **Published:** 2026-10-09 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/business/khari-deshon-ki-joradara-vapasi-uae-bana-bharata-ka-shirsha-lpg-apurtikarta-us-pichharakara-dusare-payadana-para-45582 · **Language:** Hindi
**Tags:** एलपीजी आयात, एलएनजी आयात, भारत यूएई व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, होर्मुज जलडमरूमध्य, ओमान गैस

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में भारत के आयात समीकरणों में अचानक आए बड़े बदलाव ने वैश्विक ऊर्जा समीकरणों को पूरी तरह उलट दिया है। घरेलू रसोई गैस की आपूर्ति से लेकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार गलियारों तक इस फेरबदल की गूंज सुनाई दे रही है। संयुक्त अरब अमीरात अब भारत का सबसे बड़ा एलपीजी आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह एक ही महीने के भीतर दूसरा बड़ा रणनीतिक झटका माना जा रहा है, क्योंकि लंबे समय से भारतीय बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बना चुका अमेरिका अचानक दो प्रमुख गैस मोर्चों पर शीर्ष स्थान गंवा बैठा है। सितंबर के दौरान भारत के आयात में दिखाई दिया यह रुख साफ संकेत देता है कि पश्चिम एशिया के खाड़ी देश अपने पुराने आपूर्ति स्तर को बहाल करने में कामयाब रहे हैं और इस क्षेत्र पर अमेरिकी निर्भरता में कमी आई है।

## समुद्री ऊर्जा व्यापार में खाड़ी देशों की प्रभावी वापसी
वैश्विक ऊर्जा जहाजरानी के प्रवाह पर नजर रखने वाली मैरीटाइम इंटेलिजेंस फर्म केपलर के ताजा संकलित आंकड़े दर्शाते हैं कि खाड़ी क्षेत्र से भारतीय बंदरगाहों की ओर आने वाले गैस टैंकरों की आवाजाही में तेज उछाल दर्ज हुआ है। इसके सीधे परिणाम स्वरूप अमेरिका से होने वाली कार्गो खेप में उल्लेखनीय गिरावट आई है। यह फेरबदल सिर्फ सामान्य सांख्यिकी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार पश्चिम एशिया के संवेदनशील भू-राजनीतिक हालात, होर्मुज जलडमरूमध्य के आवागमन संकट और भारत की रणनीतिक ऊर्जा सुरक्षा से गहरे जुड़े हैं। सिर्फ रसोई गैस ही नहीं, बल्कि तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी के क्षेत्र में भी ऐसा ही बड़ा उलटफेर देखने को मिला है, जहां ओमान ने अमेरिका को पछाड़कर शीर्ष स्थान हासिल कर लिया है।

## यूएई की लंबी छलांग और अमेरिकी हिस्सेदारी में तेज गिरावट
अगस्त के आंकड़ों की तुलना में सितंबर की जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट नजर आती है। पिछले छह महीनों के दौरान अमेरिका भारत के लिए एलपीजी का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ था। हालांकि सितंबर महीने में संयुक्त अरब अमीरात ने तेज गति से बाजार में अपनी बढ़त बना ली।

सितंबर में भारत द्वारा किए गए कुल एलपीजी आयात में संयुक्त अरब अमीरात की हिस्सेदारी बढ़कर 39 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई, जबकि ठीक एक महीने पहले अगस्त में यह मात्र 13 प्रतिशत थी। आंकड़ों के अनुसार संयुक्त अरब अमीरात ने सितंबर में भारत को 5,47,000 टन एलपीजी भेजी, जो अगस्त की 1,93,000 टन खेप के मुकाबले 182 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्शाती है।

इसके विपरीत, अमेरिकी खेप में भारी संकुचन देखने को मिला। अगस्त में भारत के कुल आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी 53 प्रतिशत दर्ज की गई थी, जो सितंबर में सिमटकर केवल 23 प्रतिशत रह गई। मात्रा के लिहाज से अमेरिका से आने वाली एलपीजी 58 प्रतिशत घटकर 3,23,000 टन पर आ गई।

## होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट और अमेरिका पर तात्कालिक निर्भरता
इस बड़े उतार-चढ़ाव की पृष्ठभूमि को समझने के लिए इस वर्ष के शुरुआती महीनों के घटनाक्रम पर गौर करना जरूरी है। फरवरी के अंतिम दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अचानक बढ़ गया था, जिसके चलते होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों का आवागमन बाधित हो गया। यह समुद्री संकरा मार्ग पूरी दुनिया के लिए जीवनरेखा माना जाता है, क्योंकि खाड़ी के अधिकांश निर्यातक देश इसी जलमार्ग से कच्चा तेल और गैस अन्य देशों को भेजते हैं। उस समय पैदा हुए गंभीर तनाव के कारण खाड़ी के पारंपारिक ऊर्जा स्रोतों से सप्लाई बुरी तरह लड़खड़ा गई थी।

भारत अपनी घरेलू खपत की कुल एलपीजी मांग का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करके पूरा करता है। सामान्य परिस्थितियों में इस आयात का 90 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज के रास्ते खाड़ी के देशों से ही देश में पहुंचता था। इसलिए जलमार्ग बाधित होते ही देश के समक्ष आपूर्ति संकट का जोखिम उत्पन्न हो गया था। उस विकट परिस्थिति में अमेरिकी आपूर्ति ने आगे बढ़कर भारत के लिए एक भरोसेमंद विकल्प की भूमिका निभाई थी, जिससे भारतीय ऊर्जा बास्केट में अमेरिका शीर्ष पर पहुंच गया था।

## खाड़ी देशों की उत्पादन बहाली और अन्य सप्लायर्स की स्थिति
अब मुख्य पहलू यह है कि खाड़ी क्षेत्र से आपूर्ति इतनी तेजी से दोबारा कैसे बहाल हो गई। केपलर के विश्लेषकों का आकलन है कि वास्तविक भौतिक बाजार ने तमाम अनुमानों से कहीं अधिक मजबूती का प्रदर्शन किया है। ईरान को छोड़कर खाड़ी के बाकी देशों से निकलने वाला निर्यात अब उस स्तर की तरफ लौट आया है जो सैन्य टकराव से पहले देखा जाता था। यदि सऊदी अरब के पश्चिमी तट और संयुक्त अरब अमीरात के पूर्वी तट के वैकल्पिक बंदरगाहों से भेजे गए जहाजों की गणना की जाए, तो यह संपूर्ण आपूर्ति क्षमता लगभग 100 प्रतिशत तक दोबारा पटरी पर लौट चुकी है।

सितंबर में खाड़ी के अन्य प्रमुख उत्पादकों से भी भारत आने वाली खेप में सुधार दर्ज किया गया

- **कुवैत:** सितंबर में 1,32,544 टन एलपीजी भेजकर कुवैत भारत का तीसरा सबसे बड़ा स्रोत रहा, जो अगस्त के मुकाबले 15.6 प्रतिशत की वृद्धि है।
- **कतर:** कतर की ओर से भारत को 1,15,340 टन एलपीजी भेजी गई, जिसमें पिछले महीने की तुलना में 76 प्रतिशत का जोरदार इजाफा देखा गया।
- **सऊदी अरब:** इस दौरान सबसे अनपेक्षित आंकड़ा सऊदी अरब का रहा, जहां से सितंबर में भारत ने एक टन भी एलपीजी आयात नहीं की।

समग्र स्तर पर देखा जाए तो सितंबर में भारत का कुल एलपीजी आयात अगस्त 2026 के मुकाबले 4 प्रतिशत घटकर 13.9 लाख टन दर्ज किया गया।

## एलएनजी बाजार का पूरा लेखा-जोखा: ओमान पहले और अमेरिका तीसरे स्थान पर
एलपीजी के अलावा औद्योगिक और परिवहन क्षेत्र में काम आने वाली तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी के कारोबार में भी अमेरिका को अपनी बढ़त गंवानी पड़ी है। केपलर के आंकड़ों के अनुसार ओमान सितंबर में भारत का सबसे बड़ा एलएनजी आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा।

ओमान से सितंबर के दौरान 5,85,000 टन एलएनजी आयात की गई, जो अगस्त की तुलना में 11.6 प्रतिशत अधिक है। इस बढ़ोतरी के साथ भारत के समूचे एलएनजी आयात में अकेले ओमान की हिस्सेदारी 27 प्रतिशत तक पहुंच गई।

दूसरी ओर अमेरिका शीर्ष स्थान से फिसलकर सीधे तीसरे पायदान पर आ गया। अगस्त में 8,48,000 टन गैस भेजकर पहले स्थान पर रहने वाला अमेरिका सितंबर में 59 प्रतिशत की भारी गिरावट के साथ 3,51,000 टन निर्यात ही कर सका। नाइजीरिया भी 3,51,000 टन एलएनजी भेजकर दूसरे स्थान पर मजबूती से डटा रहा।

कभी भारतीय एलएनजी बाजार में 45 प्रतिशत की विशाल हिस्सेदारी रखने वाला कतर अब फिसलकर छठे स्थान पर आ गया है, जहां से केवल 94,000 टन गैस प्राप्त हुई। मार्च में कतर के प्रमुख गैस प्रसंस्करण केंद्र रास लफान पर हुए हमलों के बाद से उसकी उत्पादन और निर्यात क्षमता लगातार दबाव में बनी हुई है। भारत अपनी कुल एलएनजी जरूरत का आधा हिस्सा आयात करता है, जिसका उपयोग रासायनिक खाद बनाने वाले कारखानों, औद्योगिक भट्टियों, बिजली उत्पादन संयंत्रों और सीएनजी चालित वाहनों में मुख्य रूप से होता है।

## समुद्री परिवहन लागत में भारी उछाल और नई आर्थिक चुनौतियां
हालांकि खाड़ी से भारत की ओर ईंधन का प्रवाह तेजी से फिर से शुरू हो चुका है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यापारिक मार्ग पूरी तरह जोखिम-मुक्त हो चुके हैं। केपलर के मुख्य माल ढुलाई विश्लेषक मैट राइट का स्पष्ट कहना है कि होर्मुज जलमार्ग के आसपास से गुजरने वाले जहाजों पर संभावित खतरों का साया अब भी मंडरा रहा है।

इस भू-राजनीतिक अनिश्चितता का सीधा असर समुद्री परिवहन के कुल खर्च पर पड़ा है। जहाजों का दैनिक भाड़ा और समुद्री बीमा प्रीमियम असाधारण रूप से बढ़ गए हैं। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि भारत को खाड़ी से गैस की पर्याप्त खेप मिल तो रही है, लेकिन बढ़े हुए भाड़े और महंगे बीमा के कारण यह आपूर्ति काफी खर्चीली साबित हो रही है।

## इसका आप पर असर
भारत की रसोई गैस और प्राकृतिक गैस आपूर्ति खाड़ी देशों की ओर दोबारा स्थानांतरित होने से घरेलू आपूर्ति तंत्र और आयातित ऊर्जा लागत पर सीधा प्रभाव पड़ेगा।

- **रसोई गैस उपलब्धता:** संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों से समुद्री दूरी कम होने के कारण देश में घरेलू सिलेंडरों की आपूर्ति सामान्य बनी रहेगी। उपभोक्ताओं को त्योहारी या आगामी मांग के दौरान गैस किल्लत का सामना नहीं करना पड़ेगा।
- **ऊर्जा आयात बिल:** होर्मुज जलमार्ग पर ऊंचे जहाजरानी भाड़े और बीमा शुल्क के चलते गैस का अंतिम खरीद मूल्य महंगा पड़ रहा है। यदि परिवहन लागत में कमी नहीं आई तो आने वाले महीनों में सरकारी तेल कंपनियों पर लागत दबाव बढ़ सकता है।
- **सीएनजी और औद्योगिक ईंधन:** ओमान और नाइजीरिया से पर्याप्त एलएनजी मिलने से खाद कारखानों और सीएनजी नेटवर्क को गैस मिलती रहेगी। इससे वाहनों और आवश्यक उर्वरक उत्पादन के लिए गैस की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित होगी।
- **वैश्विक ऊर्जा निर्भरता:** अमेरिका पर निर्भरता घटने से भारत को भौगोलिक रूप से नजदीकी स्रोतों से तेज खेप प्राप्त करने का रणनीतिक लाभ मिलेगा। इससे लंबी समुद्री दूरी वाले रास्तों पर होने वाले अप्रत्याशित विलंब से बचाव होगा।

## ऐसा क्यों हुआ
यह बड़ा फेरबदल पश्चिम एशिया में जहाजरानी मार्गों की बहाली और बदलती समुद्री सुरक्षा परिस्थितियों के कारण हुआ है।

- **खाड़ी आपूर्ति मार्गों का सुधार:** फरवरी के तनाव के बाद संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब ने वैकल्पिक तटों से जहाजों को मोड़कर निर्यात क्षमता को लगभग 100 प्रतिशत बहाल कर दिया। इसके चलते भारतीय रिफाइनरियों और वितरकों को दोबारा नजदीकी खाड़ी देशों से तेज और अधिक मात्रा में गैस मिलने लगी।
- **अमेरिकी आपूर्ति में तेज संकुचन:** पूर्व में खाड़ी संकट के समय भारत ने अमेरिका से आपातकालीन स्तर पर रिकॉर्ड गैस आयात की थी। खाड़ी के परंपरागत बंदरगाहों के दोबारा सक्रिय होने के बाद लंबी दूरी वाली महंगी अमेरिकी खेप में स्वतः 58 से 59 प्रतिशत की कमी आ गई।
- **कतर के संयंत्रों पर प्रभाव:** मार्च में कतर के रास लफान गैस केंद्र पर हुए हमलों के बाद उसकी उत्पादन क्षमता प्रभावित रही। इसी शून्य को भरने के लिए ओमान ने भारत को अपनी एलएनजी आपूर्ति बढ़ाकर शीर्ष स्थान हासिल किया।

## सवाल-जवाब

### 1. सितंबर में भारत का सबसे बड़ा एलपीजी सप्लायर कौन बना?
संयुक्त अरब अमीरात 5,47,000 टन एलपीजी की आपूर्ति और 39 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी के साथ भारत का शीर्ष आपूर्तिकर्ता बन गया।

### 2. एलपीजी आपूर्ति के मामले में अमेरिका की स्थिति में क्या बदलाव आया?
अमेरिका शीर्ष स्थान से फिसलकर दूसरे नंबर पर आ गया और उसका निर्यात 58 प्रतिशत घटकर 3,23,000 टन रह गया।

### 3. भारत का सबसे बड़ा एलएनजी आपूर्तिकर्ता कौन सा देश बना है?
ओमान ने 5,85,000 टन गैस की आपूर्ति करके 27 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ पहला स्थान प्राप्त किया।

### 4. भारत अपनी जरूरत की कितनी एलपीजी और एलएनजी आयात करता है?
भारत अपनी आवश्यकता की लगभग 60 प्रतिशत एलपीजी और 50 प्रतिशत एलएनजी विदेशों से आयात करता है।

### 5. कतर की गैस आपूर्ति में गिरावट का मुख्य कारण क्या रहा?
मार्च महीने में कतर के प्रमुख गैस हब रास लफान पर हुए हमलों के बाद से उसकी उत्पादन और निर्यात क्षमता प्रभावित हुई है।

### 6. खाड़ी से आपूर्ति बहाल होने के बावजूद क्या चुनौतियां बनी हुई हैं?
होर्मुज जलमार्ग पर सुरक्षा जोखिमों के कारण जहाजों का समुद्री भाड़ा और युद्ध जोखिम बीमा खर्च काफी बढ़ गया है।

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