# मानसून में मछली पालन से बंपर मुनाफा चाहिए? 15 जून से पहले तालाब की वैज्ञानिक तैयारी जरूर निपटा लें

> मानसून के साथ मत्स्य पालन का नया सत्र शुरू हो रहा है और 15 जून से मछली बीज का वितरण होगा। बिलासपुर के सहायक मत्स्य पालन अधिकारी दीनदयाल के मुताबिक इससे पहले तालाब की सही तैयारी कर लेने वाले किसान ही पूरे सीजन अच्छी कमाई कर पाते हैं।

**Category:** व्यापार · **Published:** 2026-06-13 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/business/manasuna-men-machhali-palana-se-bnpara-munapha-chahie-15-juna-se-pahale-talaba-k-479

बारिश की पहली बौछारों के साथ ही गांव-देहात के तालाबों में मछली पालन की हलचल तेज हो जाती है। मानसून आते ही मत्स्य पालन का नया सत्र दस्तक दे रहा है, और इसी मौसम में की गई तैयारी तय करती है कि किसान को साल भर कितना मुनाफा मिलेगा। बिलासपुर के सहायक मत्स्य पालन अधिकारी दीनदयाल का कहना है कि **15 जून** से मछली बीज वितरण की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी, इसलिए उससे पहले हर तैयारी पूरी कर लेना ही समझदारी है।

उनके मुताबिक बीज मिलने से पहले किसानों को तालाब की जुताई, चूने का इस्तेमाल, प्राकृतिक चारे का इंतजाम और मछलियों के स्वास्थ्य से जुड़ी सारी व्यवस्था कर लेनी चाहिए। दीनदयाल बताते हैं कि अगर सही समय पर सही प्रबंधन हो जाए तो मछलियां तेजी से बढ़ती हैं, उत्पादन ऊपर जाता है और किसान की जेब में ज्यादा पैसा आता है।

## सबसे पहला और सबसे अहम कदम — तालाब की तैयारी
मछली पालन की पूरी कामयाबी तालाब की तैयारी पर टिकी होती है। दीनदयाल समझाते हैं कि जो तालाब गर्मियों में सूख जाते हैं, उनकी अच्छी तरह जुताई कर देनी चाहिए ताकि मिट्टी पलट जाए। वहीं जो तालाब बारहों महीने पानी से भरे रहते हैं, उनमें प्रति हेक्टेयर करीब **100 kg** चूना डालना जरूरी है। चूना तालाब में पनपने वाले हानिकारक जीवाणुओं और कीटाणुओं पर लगाम लगाता है और पानी को मछलियों के लिए अनुकूल बना देता है।

## बीज डालने से 24 घंटे पहले का काम
अधिकारी के अनुसार मछली बीज तालाब में छोड़ने से ठीक **24 घंटे** पहले प्राकृतिक चारे की व्यवस्था कर लेनी चाहिए। इसके लिए गोबर खाद, सरसों खली और सिंगल सुपर फॉस्फेट काम में लिया जाता है। इन तीनों चीजों के मेल से तालाब के पानी में प्लैंकटन बनने लगते हैं, जो मछली के नन्हे बच्चों की सबसे पहली खुराक होते हैं।

## पानी भरे तालाबों में चारा बनाने का तरीका
जिन तालाबों में पहले से पानी मौजूद है, वहां तरीका थोड़ा अलग है। तालाब के किनारे एक गड्ढा खोदकर उसमें गोबर खाद, सरसों खली और सुपर फॉस्फेट मिला दें और इस मिश्रण को दो दिन तक सड़ने के लिए छोड़ दें। तीसरे दिन जब यह घोल तालाब में डाला जाता है तो प्लैंकटन बहुत तेजी से विकसित होते हैं और मछलियों को भरपूर भोजन मिल जाता है।

## आखिर प्लैंकटन इतना जरूरी क्यों
दीनदयाल इसकी वजह भी बताते हैं। मछली के बीज आकार में बेहद छोटे होते हैं और वे बड़े दानों वाला चारा खा ही नहीं पाते। यही कारण है कि तालाब में पहले से प्लैंकटन तैयार किए जाते हैं। ये सूक्ष्म पौधे और जीव-जंतु होते हैं, जिन्हें मछली के बच्चे आसानी से निगल लेते हैं और जल्दी बढ़ने लगते हैं।

## लगातार चारा देने से तेज बढ़त, कम मौतें
बीज छोड़ देने के बाद सरसों खली को पानी में भिगोकर पतला घोल तैयार करें और तालाब में डालें। इसके करीब **15 दिन** बाद धान से निकलने वाले कोड़हा यानी भूसी मिले अवशेष को भी चारे के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। दीनदयाल जोर देकर कहते हैं कि नियमित रूप से चारा देने पर मछलियों की बढ़त बेहतर होती है और उनकी मृत्यु दर भी काबू में रहती है।

## हर दो महीने पर सेहत की जांच
मछलियां ठीक से बढ़ रही हैं या नहीं, यह जानने के लिए हर दो महीने में जाल डालकर उनकी जांच करनी चाहिए। इससे एक तरफ उनकी वृद्धि का अंदाजा लगता है और दूसरी तरफ अगर किसी बीमारी के लक्षण हों तो वे समय रहते पकड़ में आ जाते हैं।

## बीमारी दिखे तो चूने का सहारा
अगर मछलियां बीमार नजर आएं तो चूने का घोल बनाकर तालाब के चारों ओर डालना चाहिए। इससे पानी में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया और कीटाणु खत्म हो जाते हैं और मछलियों की सेहत सुधरने लगती है।

## साल में दो बार फसल भी मुमकिन
दीनदयाल रात्रि के मुताबिक अगर सही प्रबंधन अपनाया जाए तो एक ही साल में दो बार मछली उत्पादन लिया जा सकता है। बड़ी हो चुकी मछलियों को बीच-बीच में निकालते रहने से छोटी मछलियों को ज्यादा जगह और भोजन मिलता है, जिससे वे भी तेजी से बढ़ती हैं। उनका कहना है कि कुछ पुरानी प्रजातियों की मछलियां तो महज तीन महीने में ही बाजार में बेचने लायक आकार हासिल कर लेती हैं।

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