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  "type": "article",
  "title": "ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी में बैंक की चूक पर ग्राहकों को पूरा हर्जाना मिले: शीर्ष अदालत",
  "summary": "शीर्ष अदालत ने कहा है कि वित्तीय संस्थानों की पड़ताल में लापरवाही मिलने पर ऑनलाइन धोखाधड़ी के पीड़ितों को गंवाई रकम के बराबर मुआवजा दिया जाना चाहिए। अदालत ने संदिग्ध लेन-देन पकड़ने के लिए बैंकों को आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करने की सलाह दी।",
  "content": "देश की शीर्ष अदालत ने गुरुवार को एक अहम सुनवाई के दौरान कहा कि ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में अगर किसी बैंक या वित्तीय संस्था की तरफ से जरूरी जांच-पड़ताल में कोताही पाई जाती है, तो प्रभावित खाताधारकों को कम-से-कम उनके नुकसान के बराबर मुआवजा दिया जाना चाहिए। अदालत ने इस बात पर कड़ा रुख अपनाया कि वित्तीय धोखाधड़ी की रोकथाम और ग्राहकों की सुरक्षा को लेकर वित्तीय संस्थानों की ठोस जवाबदेही तय की जानी बेहद जरूरी है।\n\nइस साल अब तक आठ सौ करोड़ रुपये का नुकसान\nचीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ ने सुनवाई के दौरान चिंताजनक आंकड़े सामने रखे। पीठ ने रेखांकित किया कि साइबर अपराधों के कुल मामलों में पचास प्रतिशत की गिरावट दर्ज होने के बाद भी केवल इस साल लोगों को लगभग आठ सौ करोड़ रुपये की वित्तीय चपत लग चुकी है। इतनी बड़ी राशि का नुकसान यह साबित करता है कि मौजूदा सुरक्षा उपाय आम नागरिकों की गाढ़ी कमाई की रक्षा करने के लिए नाकाफी साबित हो रहे हैं।\n\nआरबीआई के नए नियमों की होगी समीक्षा\nअदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा तैयार किए जा रहे नए नियामकीय तंत्र में पीड़ितों के मुआवजे, धोखाधड़ी रोकने की रणनीति और वित्तीय संस्थानों की स्पष्ट जिम्मेदारी से जुड़े कड़े दिशा-निर्देश शामिल होने चाहिए। अदालत आरबीआई के प्रस्तावित 'अपने ग्राहक को जानें' (केवाईसी) संशोधन निर्देश, 2026 की स्वयं विस्तृत समीक्षा करेगी। निर्धारित कार्यक्रम के तहत इन नए नियमों को तीस नवंबर तक अधिसूचित करने और इकतीस दिसंबर तक पूर्ण रूप से लागू करने की योजना बनाई गई है।\n\nलापरवाही पर हर्जाना और दंडात्मक कार्रवाई का आदेश\nअपने आधिकारिक आदेश में पीठ ने दर्ज किया कि केंद्रीय बैंक के आगामी विनियामक उपायों में ऐसा स्पष्ट नियम होना चाहिए जिसके तहत 'डिजिटल अरेस्ट' या अन्य ऑनलाइन जालसाजी के शिकार बने लोगों को वित्तीय कंपनियां उचित क्षतिपूर्ति दें। यह भरपाई किसी भी स्थिति में ग्राहक द्वारा गंवाई गई रकम से कम नहीं होनी चाहिए, यदि यह सिद्ध हो जाता है कि चूक बैंक की लचर पड़ताल की वजह से हुई। चीफ जस्टिस ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि वित्तीय संस्थानों के लिए दंडात्मक शर्तें लागू करना अपरिहार्य हो चुका है, क्योंकि कड़े दंड के बिना बैंक अपनी कार्यप्रणाली और सुरक्षा मानकों में बदलाव करने को तैयार नहीं होंगे।\n\nलेन-देन के पैटर्न और एआई के इस्तेमाल पर जोर\nअदालत ने इस पहलू पर भी विचार किया कि बैंक अपने सुरक्षा तंत्र को आधुनिक तकनीकों से क्यों नहीं लैस कर रहे हैं। पीठ ने सवाल उठाया कि वित्तीय संस्थान खाताधारकों के खातों को उनकी प्रकृति और सामान्य लेन-देन के तौर-तरीकों के अनुसार अलग-अलग श्रेणियों में क्यों नहीं बांटते। इसके साथ ही असामान्य और संदेहास्पद गतिविधियों को समय रहते पकड़ने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का दायरा क्यों नहीं बढ़ाया जा रहा है।\n\nचीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि बैंकों के पास प्रत्येक खाताधारक के लेन-देन का विस्तृत ब्योरा मौजूद रहता है। ऐसी स्थिति में अगर कोई ग्राहक अमूमन छोटी रकम का लेन-देन करता है और उसके खाते से अचानक असामान्य रूप से बड़ी रकम किसी दूसरे खाते में भेजने की कोशिश की जाती है, तो बैंक के सुरक्षा तंत्र को तत्काल सक्रिय होकर बीच में दखल देना चाहिए ताकि जालसाजों के मंसूबे पूरे न हो सकें।\n\nइसका आप पर असर\nबैंकों की जवाबदेही तय होने से आम खाताधारकों के लिए ऑनलाइन लेन-देन के दौरान वित्तीय सुरक्षा का दायरा पहले से कहीं अधिक मजबूत होगा।\n\n• पीड़ितों को पूरा हर्जाना: अगर बैंक की जांच प्रणाली में कमी की वजह से आपके खाते से धोखाधड़ी होती है, तो संस्था को पूरी गंवाई हुई रकम लौटानी होगी। इससे ग्राहकों को अपनी डूबी हुई पूंजी वापस पाने का कानूनी आधार मिलेगा।\n• संदिग्ध लेन-देन पर स्वतः रोक: सामान्य खर्च से हटकर अगर कोई बड़ा लेन-देन अचानक होगा, तो बैंक सुरक्षा तंत्र तत्काल हस्तक्षेप करेगा। ऐसे संदिग्ध ट्रांसफर को बैंक द्वारा रोककर ग्राहक से पुष्टि कराई जाएगी।\n• लापरवाह बैंकों पर दंडात्मक कार्रवाई: वित्तीय सुरक्षा मानकों की अनदेखी करने वाली वित्तीय कंपनियों के खिलाफ दंडात्मक नियम तय किए जाएंगे। इसके दबाव में बैंक अपने सिस्टम को सुरक्षित करने के लिए अतिरिक्त कदम उठाएंगे।\n• दिसंबर से नए केवाईसी नियम: संशोधित केवाईसी निर्देशों को इकतीस दिसंबर तक पूरे देश में प्रभावी रूप से लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके बाद खाता सत्यापन और फर्जी खातों की रोकथाम के उपाय और सख्त हो जाएंगे।\n\nऐसा क्यों हुआ\nसाइबर अपराधों की संख्या में पचास प्रतिशत कमी के बावजूद चालू वर्ष में खाताधारकों ने लगभग आठ सौ करोड़ रुपये गंवाए हैं। मौजूदा विनियामक और तकनीकी खामियों के कारण ही शीर्ष अदालत को बैंकों की सख्त जवाबदेही तय करने का फैसला लेना पड़ा।\n\n• भारी वित्तीय नुकसान: कुल वारदातों में कमी आने के बावजूद संगठित साइबर गिरोहों ने बड़े स्तर पर डिजिटल अरेस्ट और ठगी कर जनता को आठ सौ करोड़ रुपये का चूना लगाया। इसी भारी भरकम नुकसान को देखते हुए अदालत ने सीधे हस्तक्षेप किया।\n• बैंकों की लचर जांच प्रणाली: कई मामलों में वित्तीय संस्थान संदिग्ध खातों और असामान्य धन हस्तांतरण की समय रहते पड़ताल करने में असफल रहे। जवाबदेही और दंडात्मक प्रावधान न होने से बैंक सुरक्षा तंत्र को लगातार नजरअंदाज कर रहे थे।\n• आधुनिक तकनीक की अनुपस्थिति: अधिकांश बैंक खातों के लेन-देन व्यवहार का विश्लेषण करने और संदेहास्पद गतिविधियों को पकड़ने के लिए एआई आधारित निगरानी तकनीकों का प्रभावी उपयोग नहीं कर रहे थे। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने नियामक ढांचे की समीक्षा का निर्णय लिया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सुप्रीम कोर्ट ने साइबर धोखाधड़ी पर क्या नया रुख अपनाया है?\nअदालत ने कहा है कि यदि बैंक या वित्तीय संस्था की लापरवाही से धोखाधड़ी हुई है, तो पीड़ित को गंवाई गई पूरी रकम का हर्जाना मिलना चाहिए।\n\n2. इस वर्ष साइबर फ्रॉड के जरिए लोगों को कितना नुकसान हुआ है?\nमामलों में पचास प्रतिशत की कमी आने के बावजूद इस साल अब तक नागरिकों को लगभग आठ सौ करोड़ रुपये का वित्तीय नुकसान हुआ है।\n\n3. आरबीआई के नए केवाईसी संशोधन निर्देश कब तक लागू होने की योजना है?\nइन निर्देशों को तीस नवंबर तक अधिसूचित करने और इकतीस दिसंबर तक पूरे देश में लागू करने का प्रस्ताव रखा गया है।\n\n4. पीठ ने असामान्य लेन-देन को रोकने के लिए बैंकों को क्या सलाह दी?\nपीठ ने सुझाव दिया कि बैंक खातों को व्यवहार के आधार पर वर्गीकृत करें और अचानक बड़े संदिग्ध लेन-देन की पहचान के लिए एआई का इस्तेमाल कर हस्तक्षेप करें।",
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