# अल-नीनो की आहट से बढ़ी चिंता, क्या आपकी थाली और रसोई का बजट बिगाड़ देगा नया मौसम संकट?

> प्रशांत महासागर में सक्रिय होता अल-नीनो भारत की खाद्य अर्थव्यवस्था और महंगाई के मोर्चे पर नई मुश्किलें खड़ी कर सकता है, जिससे कृषि उत्पादन और खुदरा कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

**Type:** article · **Category:** व्यापार · **Published:** 2026-08-21 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/business/new-weather-threat-looms-over-india-as-pacific-ocean-warming-poses-double-risk-to-food-supply-and-economy-19252 · **Language:** Hindi
**Tags:** अल-नीनो, महंगाई, कृषि, मानसून, भारतीय अर्थव्यवस्था, शिवराज सिंह चौहान, फसल उत्पादन

भारतीय बाजारों में चीनी और सब्जियों के बढ़ते दाम इस बात का संकेत दे रहे हैं कि आम आदमी की रसोई पर महंगाई का दबाव फिर से गहराने लगा है। इस उठापटक के पीछे प्रशांत महासागर में तेजी से मजबूत हो रहा अल-नीनो बड़ा कारण माना जा रहा है, जो देश की फूड इकॉनमी के लिए एक गंभीर चुनौती के रूप में उभर रहा है। यदि आने वाले दिनों में इसका दायरा और प्रभाव बढ़ता है, तो यह मौसमी बदलाव फसलों के कुल उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। इससे न केवल अनाज और अन्य कृषि उपजों की बाजार में आवक घटेगी, बल्कि खाने-पीने की जरूरी चीजों के दाम भी आसमान छूने लगेंगे।

 

## अर्थव्यवस्था और विकास दर पर मंडराते खतरे
 यह संभावित संकट ऐसे संवेदनशील समय में सामने आया है जब इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च यानी Ind-Ra ने पहले ही चेतावनी जारी कर दी है कि वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान ईंधन और खाद्य पदार्थों की महंगाई देश की आर्थिक वृद्धि दर की रफ्तार को धीमा कर सकती है। इस रेटिंग एजेंसी ने चालू वर्ष के लिए जीडीपी ग्रोथ 6.8 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, जो बीते वित्त वर्ष 2025-26 के 7.6 प्रतिशत के आंकड़े से काफी कम है। एजेंसी का मानना है कि खुदरा महंगाई इस अवधि में औसतन 4.9 प्रतिशत तक पहुंच सकती है, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह मात्र 2 प्रतिशत दर्ज की गई थी। हालांकि खेती-किसानी के मोर्चे पर फिलहाल हालात पूरी तरह नियंत्रण से बाहर नहीं हुए हैं, लेकिन मौसमी अनिश्चितता ने नीति निर्माताओं की नींद उड़ा दी है।

 

## कृषि मंत्री का बयान और खरीफ फसलों की मौजूदा स्थिति
 केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 18 अगस्त को स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा था कि इस साल की खरीफ फसल पर अल-नीनो का बहुत बड़ा नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका काफी कम है, हालांकि कुछ चुनिंदा इलाकों में स्थानीय स्तर पर फसलों को छिटपुट नुकसान जरूर झेलना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि कुछ खास जगहों को छोड़कर अल-नीनो का कोई व्यापक असर दिखाई नहीं दे रहा है और कुल मिलाकर स्थिति काफी संतोषजनक बनी हुई है। उनके मुताबिक देश के अधिकांश हिस्सों में हुई मानसूनी बारिश ने फसलों की पानी से जुड़ी जरूरतों को बखूबी पूरा किया है।

 

## भारतीय खाद्य बाजार के लिए क्यों खतरनाक है अल-नीनो
 विज्ञान के दृष्टिकोण से देखा जाए तो अल-नीनो प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में समुद्री जल के असामान्य रूप से गर्म होने की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसका सीधा असर दुनिया भर के तापमान, हवाओं और बारिश के चक्र पर पड़ता है। भारत के संदर्भ में इसका सबसे गहरा और प्रत्यक्ष प्रभाव दक्षिण-पश्चिम मानसून और कृषि क्षेत्र पर देखने को मिलता है। जब मानसून कमजोर या असमान रहता है, तो उन फसलों की पैदावार सीधे तौर पर घट जाती है जो पूरी तरह से बारिश के पानी पर निर्भर करती हैं, खासकर उन इलाकों में जहां सिंचाई के आधुनिक और पक्के साधन आज भी उपलब्ध नहीं हैं। उत्पादन में गिरावट आते ही थोक और खुदरा बाजारों में सामान की किल्लत पैदा हो जाती है और कीमतें बढ़ने लगती हैं।

 इस संकट का दायरा केवल खेतों और किसानों तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरी खाद्य आपूर्ति श्रृंखला को अपनी चपेट में ले लेता है, जिसमें फसल की खरीद से लेकर स्टोरेज, ट्रांसपोर्टेशन, प्रोसेसिंग और अंत में रिटेल बाजार तक सब कुछ शामिल है। प्रमुख फसलों की पर्याप्त उपलब्धता न होने पर सरकार और व्यापारियों को आयात का सहारा लेना पड़ता है, जिससे देश के उपभोक्ता सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय बाजार की ऊंची कीमतों के संपर्क में आ जाते हैं और देश का आयात बिल भी काफी हद तक बढ़ जाता है।

 

## कच्चे तेल की कीमतों और महंगाई का गणित
 Ind-Ra ने आगाह किया है कि अल-नीनो जनित महंगाई से मिलने वाले झटके कच्चे तेल की नरम कीमतों के कारण भारत को मिलने वाले फायदों को पूरी तरह बेअसर कर सकते हैं। वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान कच्चे तेल की औसत कीमत करीब 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहने का अनुमान जताया गया है। आमतौर पर तेल के दाम कम रहने से भारत को व्यापार घाटा और चालू खाते का घाटा नियंत्रित रखने में बड़ी मदद मिलती है, लेकिन अल-नीनो के कारण घरेलू स्तर पर भड़कने वाली खाद्य महंगाई इस राहत के असर को काफी हद तक सीमित कर देगी।

 

## खरीफ बुवाई के आंकड़े और क्षेत्रीय असमानताएं
 देश के कुछ हिस्सों में बारिश की कमी के बावजूद कृषि क्षेत्र ने अब तक बड़े पैमाने पर किसी भी बड़े व्यवधान का सफलतापूर्वक सामना किया है। आगामी 14 अगस्त तक के आंकड़ों के अनुसार देश भर में 1,016.57 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में खरीफ फसलों की बुवाई पूरी हो चुकी थी, जो इस मौसम के सामान्य औसत रकबे का लगभग 92 प्रतिशत है। यह आंकड़ा पिछले साल के मुकाबले लगभग 2 प्रतिशत ही कम है। शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि बुवाई में जो अंतर पहले दिख रहा था वह अब काफी कम हो गया है और संवेदनशील जिलों की संख्या भी 262 से घटकर लगभग 100 पर आ गई है।

 हालांकि राज्यों के स्तर पर तस्वीर एक जैसी नहीं है। कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों को पानी की भारी किल्लत से जूझना पड़ा है, जबकि पूर्वी, पूर्वोत्तर और दक्षिणी भारत के कई इलाकों में सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज की गई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग यानी IMD की रिपोर्ट बताती है कि 12 अगस्त तक पूरे देश में कुल मानसूनी घाटा 12 प्रतिशत रहा, जिसमें पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में यह कमी 26 प्रतिशत, दक्षिणी प्रायद्वीप में 19 प्रतिशत और उत्तर-पश्चिम भारत में 11 प्रतिशत तक आंकी गई। क्षेत्रीय भिन्नता का यह अंतर बेहद अहम है क्योंकि अल-नीनो का प्रभाव हर जगह एक समान रूप से महसूस नहीं किया जाता है।

 

## सप्लाई चेन से लेकर आम आदमी की जेब तक मार
 जब मौसम की मार से फसलों को व्यापक नुकसान पहुंचता है, तो इसका सबसे पहला असर कृषि जिंसों के थोक मूल्यों पर साफ दिखाई देता है। यदि यह समस्या लंबे समय तक बनी रहती है और खाद्य आपूर्ति बाधित होती है, तो इसका असर धीरे-धीरे पूरी अर्थव्यवस्था के ढांचे में फैल जाता है। अनाज, दाल, तिलहन और सब्जियों का उत्पादन कम होने पर बाजार में इनकी मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे कीमतें तेजी से ऊपर चढ़ने लगती हैं। इसके चलते खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों और खुदरा विक्रेताओं को भी महंगा कच्चा माल खरीदना पड़ता है, जिसका अंततः पूरा बोझ आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है और परिवारों का मासिक बजट बिगड़ जाता है।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** खाद्य पदार्थों की कीमतों में संभावित उछाल और खुदरा महंगाई बढ़ने से पूरे देश में आम परिवारों का रसोई बजट प्रभावित हो सकता है।

**कर्नाटक और तेलंगाना में:** पानी की कमी और कम बारिश का सामना कर रहे इन राज्यों के किसानों को फसल उत्पादन में स्थानीय स्तर पर दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।

## सवाल-जवाब

### 1. भारत में खाद्य पदार्थों की कीमतों पर अचानक दबाव क्यों बढ़ रहा है?
प्रशांत महासागर में अल-नीनो के मजबूत होने के कारण मौसम चक्र प्रभावित हो रहा है, जिससे कृषि उत्पादन और खाद्य आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका है।

### 2. वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का क्या अनुमान लगाया गया है?
इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च ने चालू वर्ष के लिए जीडीपी ग्रोथ 6.8 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, जो पिछले वित्त वर्ष के 7.6 प्रतिशत से कम है।

### 3. वित्त वर्ष 2026-27 में खुदरा महंगाई औसतन कितनी रहने की उम्मीद है?
रेटिंग एजेंसी के अनुसार इस अवधि में खुदरा महंगाई औसतन 4.9 प्रतिशत तक रह सकती है, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह केवल 2 प्रतिशत थी।

### 4. 14 अगस्त तक देश में खरीफ फसलों की बुवाई कितने क्षेत्र में हो चुकी थी?
14 अगस्त तक 1,016.57 लाख हेक्टेयर में खरीफ फसलों की बुवाई पूरी हो चुकी थी, जो इस मौसम के सामान्य औसत रकबे का 92 प्रतिशत है।

### 5. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खरीफ फसल पर अल-नीनो के असर को लेकर क्या कहा है?
कृषि मंत्री ने कहा है कि इस साल की खरीफ फसल पर अल-नीनो का कोई बहुत बड़ा असर पड़ने की संभावना कम है और कुल स्थिति संतोषजनक बनी हुई है।

### 6. 12 अगस्त तक देश में कुल मानसूनी घाटा कितना दर्ज किया गया था?
भारत मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों के अनुसार 12 अगस्त तक कुल मानसूनी कमी 12 प्रतिशत दर्ज की गई थी।

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