पलामू के किसानों में रागी की खेती का क्रेज, सरकार से मिल रही मदद और ऐसे बढ़ रही कमाई पलामू के चैनपुर प्रखंड में किसानों का रुझान अब पारंपरिक मोटे अनाज यानी रागी की खेती की ओर तेजी से बढ़ रहा है। सरकार से मिलने वाले प्रोत्साहन और बेहतर बाजार भाव के चलते किसान इसे मुनाफे का सौदा मान रहे हैं। बदलते दौर और खानपान की आदतों में आ रहे बदलाव के बीच पलामू के किसान अब आधुनिक तौर-तरीकों के साथ-साथ अपनी पुरानी कृषि विरासत को भी फिर से जीवित कर रहे हैं। सेहत के प्रति लोगों में बढ़ती सजगता और बाजार में लगातार बढ़ती मांग के कारण मोटे अनाज की खेती किसानों की आमदनी बढ़ाने का एक नया माध्यम बनती जा रही है। इस दिशा में सरकार भी पूरी मुस्तैदी से जुटी हुई है और किसानों को खेती से जुड़ा प्रशिक्षण, उन्नत बीज और विभिन्न स्तरों पर वित्तीय प्रोत्साहन मुहैया करा रही है। इन तमाम प्रयासों का सकारात्मक असर अब पलामू के सुदूर ग्रामीण इलाकों में साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। चैनपुर प्रखंड की महिला किसान ने की शुरुआत इस बदलाव की एक मिसाल पलामू जिले के चैनपुर प्रखंड में देखने को मिलती है, जहां की महिला किसान कुंती देवी मोटे अनाज की खेती के प्रति काफी उत्साहित नजर आ रही हैं। उन्होंने अपने खेतों में रागी यानी मंडुआ की फसल उगाने का फैसला लिया है। कुंती देवी ने बताया कि बचपन के दिनों में उनके घर पर नियमित रूप से मंडुआ की खेती की जाती थी। अपने मायके के दिनों से ही उन्हें इसकी खेती करने के सही तरीकों और इसके फायदों की पूरी जानकारी थी। हालांकि, आधुनिकता की दौड़ में समय के साथ इसकी खेती लगभग छूट गई थी, लेकिन कृषि विभाग से उचित प्रशिक्षण मिलने के बाद उन्होंने एक बार फिर से रागी की खेती की ओर कदम बढ़ाया है। शुरुआत में लोगों ने समझा घास कुंती देवी को आत्मा की तरफ से रागी के बीज उपलब्ध कराए गए थे, जिन्हें उन्होंने अपने दो कट्ठे के खेत में बोया है। जब बुवाई के बाद फसल के शुरुआती दिनों में छोटे-छोटे पौधे बाहर निकलने लगे, तो आसपास के कई ग्रामीण इसे पहचान नहीं पाए और इसे महज फालतू घास समझ बैठे। लेकिन कुंती देवी को अपने पुराने अनुभवों के कारण पूरी तरह से पता था कि ये पौधे किसी घास के नहीं बल्कि रागी के ही हैं। उनके पारिवारिक जीवन में पहले से ही मोटे अनाज की खेती और खानपान का पुराना इतिहास रहा है। उनके घर में मक्के का घटा, ज्वार की रोटी और मंडुआ की रोटी जैसे पारंपरिक और पौष्टिक व्यंजन हमेशा से ग्रामीण जीवन का अहम हिस्सा रहे हैं। पोषण और बेहतर मुनाफे की उम्मीद प्रशिक्षण के दौरान कुंती देवी को मोटे अनाज में मौजूद पोषक तत्वों और इसकी खेती से होने वाले आर्थिक फायदों के बारे में बारीकी से जानकारी दी गई। सामान्य गेहूं और चावल के मुकाबले अपने भोजन में मोटे अनाज को शामिल करना सेहत के दृष्टिकोण से काफी लाभकारी माना जाता है। यही वजह है कि उन्होंने एक बार फिर इस पारंपरिक फसल को अपने खेतों में जगह दी है। यदि इस वर्ष उनकी रागी की फसल की पैदावार अच्छी होती है और उन्हें बाजार में इसका उचित दाम मिलता है, तो वह आने वाले समय में इसकी खेती का दायरा बढ़ाकर बड़े पैमाने पर करने का विचार कर रही हैं। एमएसपी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बाजार में रागी की लगातार बढ़ती मांग किसानों के लिए मुनाफे के नए रास्ते खोल रही है। केंद्र सरकार की ओर से खरीफ विपणन सीजन 2026-27 के लिए रागी का न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी 5,205 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है, जबकि इसकी उत्पादन लागत लगभग 3,470 रुपये प्रति क्विंटल आंकी गई है। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर भी फिंगर मिलेट यानी रागी की मांग में उछाल आया है। साल 2026 के दौरान भारतीय रागी के साबुत दाने के निर्यात मूल्य लगभग 420 से 560 डॉलर प्रति टन के दायरे में रहने का अनुमान है, जो भारतीय मुद्रा के हिसाब से करीब 36 से 48 रुपये प्रति किलो बैठता है। हालांकि, यह वास्तविक कीमत उत्पाद की गुणवत्ता, साफ-सफाई, पैकेजिंग, प्रमाणन और निर्यातक के आधार पर ऊपर-नीचे हो सकती है। कृषि वैज्ञानिकों की क्या है राय कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार, यदि एक एकड़ जमीन में लगभग 8 से 10 क्विंटल तक रागी की पैदावार हासिल हो जाए और उसे 5,205 रुपये प्रति क्विंटल के तय एमएसपी पर बेचा जाए, तो किसान आसानी से सकल आय के रूप में करीब 50 हजार से 60 हजार रुपये तक की कमाई कर सकते हैं, जो कि लगभग 52,050 रुपये हो सकती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस पूरी खेती में प्रति एकड़ लगभग 15 से 20 हजार रुपये तक की लागत आ सकती है। यदि फसल की गुणवत्ता बेहतर हो और स्थानीय अथवा प्रीमियम बाजारों में अधिक कीमत मिल जाए, तो किसानों का यह मुनाफा और भी ज्यादा बढ़ सकता है। इसका आप पर असर भारत में: मोटे अनाज की खेती को बढ़ावा मिलने से स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं को पौष्टिक विकल्प मिल रहे हैं और किसानों की आय में सुधार हो रहा है। पलामू में: चैनपुर और आसपास के स्थानीय किसानों को प्रशिक्षण और न्यूनतम समर्थन मूल्य का सीधा लाभ मिलने से पारंपरिक खेती के प्रति नया उत्साह जगा है। सवाल-जवाब 1. पलामू के किस प्रखंड में रागी की खेती की जा रही है? पलामू के चैनपुर प्रखंड में महिला किसान कुंती देवी द्वारा रागी की खेती शुरू की गई है। 2. खरीफ विपणन सीजन 2026-27 के लिए रागी का एमएसपी कितना तय किया गया है? सरकार ने खरीफ विपणन सीजन 2026-27 के लिए रागी का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5,205 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। 3. रागी की खेती में प्रति एकड़ कितना खर्च आ सकता है? कृषि विशेषज्ञों के अनुसार रागी की खेती में प्रति एकड़ लगभग 15 से 20 हजार रुपये तक की लागत आ सकती है। 4. एक एकड़ रागी की खेती से कितनी सकल आय हो सकती है? बेहतर उपज मिलने पर किसान प्रति एकड़ लगभग 50 हजार से 60 हजार रुपये तक की सकल आय अर्जित कर सकते हैं। प्रेरणा और सबक अपने पारंपरिक ज्ञान को पहचानें: पुरानी और पारंपरिक पद्धतियों में आज के समय में भी भारी आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी संभावनाएं छिपी हो सकती हैं। प्रशिक्षण का लाभ लें: आधुनिक कृषि योजनाओं और आधिकारिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जुड़कर अपनी पैदावार और मुनाफे को कई गुना बढ़ाया जा सकता है। बाजार की मांग को समझें: उपभोक्ता रुझानों और सरकारी समर्थन मूल्यों का अध्ययन करके सही फसल का चुनाव करने से व्यवसाय में जोखिम कम होता है। https://trendkia.com/business/palamu-ke-kisano-mein-ragi-ki-kheti-ka-krez-20497 TrendKia — Har trend, sabse pehle.