पाली के कृषि विज्ञान केंद्र का अनोखा प्रयोग, कैक्टस का चारा बढ़ाने में मददगार पशुओं में दूध की पैदावार बढ़ाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र पाली ने एक विशेष कैक्टस आधारित चारे का विकास किया है। इससे महंगे पशु आहार पर होने वाले खर्च से राहत मिलती है और उत्पादन में बढ़ोतरी होती है। पशुपालन से जुड़े लोगों के लिए अक्सर महंगे बांटे और चारे का बढ़ता खर्च चिंता का विषय बना रहता है। कई बार अच्छी देखभाल के बावजूद मवेशियों से मिलने वाले दूध की मात्रा में अचानक गिरावट आने लगती है, जिससे मुनाफे पर सीधा असर पड़ता है। इस चुनौती से निपटने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र पाली के विशेषज्ञों ने एक ऐसा अनूठा प्राकृतिक चारा तैयार किया है जो इस समस्या का समाधान साबित हो सकता है। कैक्टस की इस विशेष प्रजाति को मवेशियों के दैनिक आहार में शामिल करने से दूध उत्पादन में उल्लेखनीय उछाल देखने को मिल रहा है। दूध की मात्रा और गुणवत्ता में सुधार कृषि विज्ञान केंद्र पाली के पशुपालन विशेषज्ञ झाबर तेतरवाल के शोध के अनुसार, इस खास हरे चारे को खिलाने से मवेशियों की क्षमता बेहतर होती है। सामान्य तौर पर जो मवेशी रोजाना 10 से 12 लीटर दूध देते हैं, वे इस आहार के सेवन के बाद 15 लीटर तक दूध देने लगते हैं। इसके अलावा दूध में फैट और उसका गाढ़ापन भी बेहतर होता है, जिससे बाजार में उसका अधिक मूल्य मिलता है। महंगे पशु आहार से मिलती है मुक्ति बाजार में मिलने वाले केमिकल युक्त पशु आहार और खल का खर्च हर पशुपालक के बजट को प्रभावित करता है। इस कैक्टस चारे की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह प्राकृतिक रूप से पोषक तत्वों और प्रोटीन से भरपूर है। इसे आहार में जोड़ने के बाद अलग से महंगे बांटे की जरूरत लगभग समाप्त हो जाती है, जिससे कुल लागत आधी रह जाती है और शुद्ध बचत में इजाफा होता है। किस मवेशी के लिए कितनी है खुराक विशेषज्ञों ने अलग-अलग पशुओं के लिए इसकी मात्रा तय की है ताकि उसका सर्वोत्तम परिणाम मिल सके। गाय और भैंस के लिए प्रतिदिन 2 से 2.5 किलोग्राम की मात्रा निर्धारित की गई है। वहीं भेड़ और बकरियों के लिए यह मात्रा 1 किलोग्राम प्रतिदिन है, जो विशेष रूप से पाली जिले के बकरी पालकों के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो रही है। गर्मी के मौसम में डिहाइड्रेशन से सुरक्षा पश्चिमी राजस्थान की चिलचिलाती धूप और भीषण गर्मी में अक्सर पानी की कमी के कारण मवेशी सुस्त पड़ जाते हैं और उनका उत्पादन घट जाता है। इस खास चारे में प्राकृतिक जल तत्व प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है जो पशुओं के शरीर में नमी का स्तर बनाए रखता है। इससे मवेशी लू और डिहाइड्रेशन के दुष्प्रभावों से सुरक्षित रहते हैं और तापमान बढ़ने पर भी उनके दूध देने की क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता। इसका आप पर असर यह नवाचार पशुपालकों की आय बढ़ाने और लागत कम करने में सीधा योगदान देता है। • भारत में: देशभर के पशुपालक महंगे बांटे पर निर्भरता कम करके इस तरह के प्राकृतिक और स्थानीय चारे अपना सकते हैं, जिससे पशुपालन का खर्च आधा हो जाएगा। • पाली में: स्थानीय किसानों और विशेषकर बकरी पालकों को भीषण गर्मी और पानी की कमी के दौरान चारे की समस्या से राहत मिलेगी और उत्पादन बढ़ेगा। ऐसा क्यों हुआ पारंपरिक पशु आहार की उच्च लागत और पश्चिमी राजस्थान की मौसमी परिस्थितियों के कारण इस प्राकृतिक विकल्प की आवश्यकता महसूस की गई। • बढ़ता खर्च: बाजार में उपलब्ध महंगे पशु आहार और खल के कारण पशुपालकों का मासिक बजट बिगड़ रहा था। • गर्मी का असर: पश्चिमी क्षेत्र के उच्च तापमान और पानी की कमी के चलते मवेशियों में डिहाइड्रेशन की समस्या आम हो जाती है। • शोध निष्कर्ष: कृषि विशेषज्ञों के अध्ययन से यह साबित हुआ कि कैक्टस की यह खास प्रजाति पोषक तत्वों और नमी की पूर्ति एक साथ करती है। सवाल-जवाब 1. यह विशेष चारा कौन सा है? यह कैक्टस की एक विशेष पौष्टिक प्रजाति है जिसे पशुओं के आहार के रूप में विकसित किया गया है। 2. इससे दूध उत्पादन में कितनी वृद्धि होती है? यह चारा मवेशियों का दूध उत्पादन 20 प्रतिशत तक बढ़ा देता है, जिससे 10 लीटर तक देने वाले पशु 15 लीटर तक दूध देते हैं। 3. गाय और भैंस के लिए प्रतिदिन कितनी मात्रा तय की गई है? गाय और भैंस के लिए प्रतिदिन 2 से 2.5 किलोग्राम की खुराक निर्धारित की गई है। 4. भेड़ और बकरियों को कितना चारा देना चाहिए? भेड़ और बकरियों के लिए प्रतिदिन 1 किलोग्राम की मात्रा तय की गई है। 5. यह चारा गर्मी के मौसम में कैसे मददगार है? इसमें मौजूद प्रचुर जल तत्व पशुओं के शरीर में पानी का संतुलन बनाए रखते हैं जिससे डिहाइड्रेशन नहीं होता। https://trendkia.com/business/pali-ke-krishi-vijnana-kendra-ka-anokha-prayoga-kaiktasa-ka-chara-barhane-men-madadagara-29541 TrendKia — Har trend, sabse pehle.