पंचरत्न खेती: कम जमीन से ज्यादा मुनाफा कमाने का नया जरिया गोंडा के किसान अब पंचरत्न खेती के जरिए एक ही खेत से पांच अलग-अलग फसलों का उत्पादन कर रहे हैं, जिससे जोखिम कम होता है और आय बढ़ती है। खेती के पारंपरिक तरीकों में बदलाव आ रहा है, क्योंकि अब किसान सीमित जमीन से अधिक उत्पादन और बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिए नवाचार की ओर बढ़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में एक विशेष तकनीक चर्चा का विषय बनी हुई है, जिसे पंचरत्न खेती के नाम से जाना जाता है। इस अनोखे मॉडल के तहत किसान अपने खेत के एक ही टुकड़े पर पांच विभिन्न फसलों को एक साथ उगाते हैं। यह पद्धति न केवल फसलों की विविधता को बढ़ावा देती है, बल्कि किसानों के लिए खेती से जुड़े आर्थिक जोखिमों को भी काफी हद तक कम करती है। पंचरत्न खेती का सफल मॉडल इटियाथोक विकासखंड के ब्लॉक कोऑर्डिनेटर कपीश जायसवाल ने बताया कि यह मॉडल किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रहा है। इस पद्धति की मुख्य विशेषता फसलों का चयन है, जहां ऐसी पांच फसलों को चुना जाता है जो आपस में प्रतिस्पर्धा करने के बजाय एक-दूसरे के अनुकूल होती हैं और मिट्टी को कोई नुकसान नहीं पहुंचातीं। इस ढांचे में मुख्य रूप से अरहर, सांवा, रागी, मक्का और बाजरा को शामिल किया जाता है। चूंकि अरहर एक लंबी अवधि की फसल है, इसलिए उसे इस मॉडल का आधार माना जाता है। जोखिम कम करने का अचूक उपाय कपीश जायसवाल के अनुसार, एक ही खेत में विविध फसलों की बुवाई से भूमि का अधिकतम और सही उपयोग सुनिश्चित होता है। खेती में अक्सर किसी एक फसल के खराब होने या बाजार में उस उत्पाद के दाम अचानक गिरने से किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ता है। पंचरत्न खेती इस स्थिति में एक सुरक्षा कवच का काम करती है। यदि एक फसल का उत्पादन प्रभावित होता है, तो अन्य चार फसलें आय का जरिया बनी रहती हैं, जिससे किसान को कभी खाली हाथ नहीं लौटना पड़ता। मिट्टी की उर्वरता और पोषक तत्व पंचरत्न खेती केवल आर्थिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि जमीन की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए भी एक बेहतर विकल्प है। विभिन्न फसलों की जड़ें मिट्टी में अलग-अलग गहराई तक जाती हैं, जिसके कारण उन्हें मिलने वाले पोषक तत्वों की खपत भी अलग-अलग होती है। यह प्रक्रिया मिट्टी के प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने और उसकी उर्वरता को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद करती है। इसके अलावा, इस तरीके से किसानों को दलहन और मोटे अनाज जैसे पौष्टिक उत्पाद प्राप्त होते हैं, जिनकी वर्तमान बाजार में मांग बहुत अधिक है। सफलता के लिए जरूरी सावधानियां इस नई कृषि पद्धति को अपनाने से पहले कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। कपीश जायसवाल ने किसानों को सुझाव दिया है कि वे खेत तैयार करने से लेकर बेहतर गुणवत्ता वाले बीजों के चयन तक पूरी प्रक्रिया को वैज्ञानिक तरीके से अपनाएं। सही समय पर बुवाई करना और फसलों की निरंतर देखरेख करना अच्छे उत्पादन के लिए अनिवार्य है। यदि किसान इन वैज्ञानिक मानकों का पालन करते हैं, तो वे न्यूनतम निवेश के साथ अधिकतम मुनाफे की प्राप्ति सुनिश्चित कर सकते हैं। भविष्य में छोटे किसानों के लिए यह मॉडल उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने का एक बड़ा आधार बन सकता है। इसका आप पर असर भारत में: पंचरत्न मॉडल जैसे मिश्रित कृषि के तरीके छोटे किसानों को बाजार के उतार-चढ़ाव और फसल की बर्बादी से बचाकर उनकी आय स्थिर रखने में मदद कर सकते हैं। गोंडा में: स्थानीय किसान इस तकनीक को अपनाकर अपनी भूमि की उर्वरता को लंबे समय तक बनाए रखते हुए कम लागत में अधिक फसलों का उत्पादन कर सकते हैं। सवाल-जवाब 1. पंचरत्न खेती में कौन सी फसलें लगाई जाती हैं? इस मॉडल में आमतौर पर सांवा, रागी, अरहर, मक्का और बाजरा जैसी फसलों का चयन किया जाता है। 2. अरहर को मुख्य फसल क्यों माना जाता है? अरहर एक लंबी अवधि की फसल है, इसलिए इसे पंचरत्न मॉडल का आधार या मुख्य हिस्सा माना जाता है। 3. क्या यह खेती मिट्टी के लिए अच्छी है? जी हां, अलग-अलग जड़ों और पोषण की जरूरतों वाली फसलें होने से मिट्टी का संतुलन बना रहता है और उर्वरता सुरक्षित रहती है। 4. यह मॉडल किसानों के जोखिम को कैसे कम करता है? एक ही खेत में पांच अलग फसलें होने से यदि एक फसल का नुकसान होता है, तो दूसरी फसलें आय का स्रोत बनी रहती हैं। https://trendkia.com/business/panchratna-kheti-kama-jamina-se-jyada-munapha-kamane-ka-naya-jariya-7039 TrendKia — Har trend, sabse pehle.