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  "title": "संसद की बैठक में यूपीआई चार्ज पर हंगामा, विपक्ष ने फैसले को बताया जनविरोधी",
  "summary": "मर्चेंट यूपीआई भुगतानों पर नए शुल्क तय किए जाने के बाद राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की बैठक में विपक्ष ने इस कदम को आम जनता और दुकानदारों के लिए नुकसानदेह बताया।",
  "content": "नई दिल्ली में संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की एक हालिया बैठक के दौरान राजनीतिक माहौल उस समय गरमा गया जब विपक्षी सांसदों ने यूपीआई भुगतानों पर शुल्क लगाने के सरकार के फैसले का कड़ा विरोध किया। इस कदम को कड़े शब्दों में जनविरोधी करार देते हुए विपक्षी नेताओं का यह तर्क रहा कि इससे देश भर के आम नागरिकों के साथ-साथ छोटे दुकानदारों की वित्तीय स्थिति बुरी तरह प्रभावित होगी। हालांकि इस बैठक का मूल एजेंडा कुछ और था, लेकिन दो हजार रुपये से अधिक के मर्चेंट भुगतानों पर शून्य दशमलव चार प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट तय किए जाने के मुद्दे ने पूरी चर्चा को अपनी ओर मोड़ लिया और इस पर तीखी बहस छिड़ गई।\n\nविपक्ष का कड़ा रुख और यूपीआई चार्ज पर घमासान\nसंसदीय समिति की इस बैठक में आरएसपी सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन ने सरकार के इस कदम को सीधे तौर पर जनता के हितों के खिलाफ एक बड़ा कदम बताया। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि दो हजार रुपये से अधिक के हर एक भुगतान पर शुल्क वसूले जाने से हर घर के मासिक बजट पर सीधा असर पड़ेगा। वहीं कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि पूरे देश में इस नए लेनदेन शुल्क को लेकर काफी गहरी चिंता और रोष का माहौल बना हुआ है। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि आम जनता की इन परेशानियों का संसद के भीतर गूंजना पूरी तरह स्वाभाविक है। हालांकि समिति के अध्यक्ष भर्तृहरि महताब ने यह स्वीकार किया कि यह विषय तय की गई कार्यसूची में शामिल नहीं था, लेकिन सदस्यों की ओर से जताई गई भारी चिंता को देखते हुए आगामी बैठकों में इस पर विस्तार से चर्चा की जा सकती है।\n\nनए नियमों के लागू होने की तारीख और इसका दायरा\nसरकार द्वारा लाई गई इस नई व्यवस्था के तहत जनवरी 2020 से चली आ रही जीरो-एमडीआर प्रणाली को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है, क्योंकि बैंक और फिनटेक कंपनियां इस मुफ्त सेवा का लंबे समय से विरोध कर रही थीं। नए दिशा-निर्देशों के अनुसार दो हजार रुपये से ऊपर के मर्चेंट भुगतानों पर शून्य दशमलव चार प्रतिशत का शुल्क वसूला जाएगा, जिसमें अधिकतम सीमा तीन सौ रुपये तय की गई है जो पचहत्तर हजार रुपये या उससे अधिक के भुगतान पर लागू होगी। यह नया नियम पंद्रह अक्टूबर 2026 से प्रभावी होने जा रहा है। हालांकि तकनीकी तौर पर यह शुल्क व्यापारियों के खातों से काटा जाएगा, लेकिन वित्तीय जानकारों का यह मानना है कि अंततः इस बोझ को किसी न किसी रूप में ग्राहकों की जेब पर ही डाला जाएगा।\n\nजीडीपी ग्रोथ के आंकड़ों और वर्चुअल एसेट्स पर उठे सवाल\nसंसदीय समिति की इस बैठक में केवल यूपीआई शुल्क तक ही चर्चा सीमित नहीं रही, बल्कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में दर्ज सात दशमलव आठ प्रतिशत की जीडीपी ग्रोथ रेट पर भी गंभीर सवाल उठाए गए। सांसद मनीष तिवारी ने सरकार के सामने यह मांग रखी कि जीडीपी की गणना करने के फॉर्मूले को पूरी तरह से पारदर्शी बनाया जाए। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि आधार वर्ष में बदलाव किए जाने के बाद कौन से नए इंडेक्स जोड़े गए और किन पुराने इंडिकेटर्स को हटाया गया है। विपक्ष की ओर से यह सीधा आरोप लगाया गया है कि आंकड़ों में बाजीगरी करके जमीनी हकीकत को छिपाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके अलावा बैठक का एक अन्य महत्वपूर्ण केंद्र वर्चुअल डिजिटल एसेट्स यानी क्रिप्टोकरेंसी जैसे टूल्स का भविष्य भी रहा, जिस पर समिति पिछले एक साल से आरबीआई और सीबीडीटी जैसे शीर्ष संस्थानों के साथ विचार-विमर्श कर रही है। चेयरमैन महताब ने इस बात को उजागर किया कि सरकार न तो इन्हें आधिकारिक मान्यता दे रही है और न ही कोई कड़ा रेगुलेशन तैयार कर रही है, जिसके कारण बिना स्पष्ट नियमों के यह ग्रे-मार्केट संदिग्ध गतिविधियों का अड्डा बनता जा रहा है और वित्तीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा पैदा हो रहा है।\n\nइसका आप पर असर\nमर्चेंट यूपीआई भुगतानों पर शुल्क लगने के फैसले का सीधा असर देश के आम उपयोगकर्ताओं, छोटे दुकानदारों और डिजिटल लेनदेन करने वाले करोड़ों नागरिकों की जेब पर पड़ेगा।\n\n• भारत में: पंद्रह अक्टूबर 2026 से दो हजार रुपये से अधिक के मर्चेंट भुगतानों पर शून्य दशमलव चार प्रतिशत एमडीआर लागू होने से डिजिटल लेन-देन की लागत बढ़ जाएगी। हालांकि यह शुल्क सीधे व्यापारियों के खातों से काटा जाएगा, लेकिन व्यापारियों द्वारा इसका वित्तीय बोझ अंततः ग्राहकों पर ही स्थानांतरित किए जाने की पूरी संभावना है।\n• आर्थिक गतिविधियों पर असर: छोटे और मध्यम स्तर के दुकानदारों को डिजिटल भुगतान स्वीकार करने पर अधिक शुल्क चुकाना होगा, जिससे उनके रोजमर्रा के मुनाफे पर असर पड़ सकता है। इससे कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा देने के सरकारी अभियानों की गति भी प्रभावित हो सकती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nमर्चेंट यूपीआई भुगतानों पर शुल्क लगाने का निर्णय लंबे समय से चली आ रही वित्तीय और तकनीकी माँगों का परिणाम है, जिस पर संसद के भीतर तीखा विरोध शुरू हो गया है।\n\n• फिनटेक दबाव: बैंक और फिनटेक कंपनियाँ जनवरी 2020 से लागू जीरो-एमडीआर व्यवस्था के कारण हो रहे वित्तीय नुकसान का लगातार विरोध कर रही थीं और इस सेवा के एवज में शुल्क तय करने की मांग कर रही थीं।\n• राजस्व संतुलन: भारी मात्रा में हो रहे डिजिटल भुगतानों के रख-रखाव और भुगतान बुनियादी ढाँचे को बनाए रखने के लिए वित्तीय संस्थानों की तरफ से लगातार दबाव बनाया जा रहा था, जिसके चलते सरकार को नए नियम लागू करने पड़े।\n• नियामक चिंताएं: वर्चुअल डिजिटल एसेट्स और क्रिप्टोकरेंसी के मोर्चे पर स्पष्ट नियमों के अभाव में ग्रे-मार्केट के विस्तार ने वित्तीय नियामकों और संसदीय समितियों की चिंता बढ़ा दी है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. यूपीआई भुगतानों पर नया शुल्क कब से लागू होगा?\nयह नया नियम 15 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होने जा रहा है।\n\n2. कितनी राशि से अधिक के भुगतान पर चार्ज लगेगा?\nदो हजार रुपये से अधिक के मर्चेंट भुगतानों पर शून्य दशमलव चार प्रतिशत शुल्क लागू होगा।\n\n3. नए शुल्क की अधिकतम सीमा क्या तय की गई है?\nइस शुल्क की अधिकतम सीमा तीन सौ रुपये तय की गई है, जो 75,000 रुपये या उससे अधिक के भुगतान पर लागू होगी।\n\n4. जीडीपी ग्रोथ के आंकड़े पर किस बैठक में सवाल उठे?\nसंसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की ताजा बैठक में चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़ों पर सवाल उठाए गए।",
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  "publishedAt": "2026-09-16",
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