{
  "type": "article",
  "title": "पति के लोन पर पत्नी के खाते से काटे 17.30 लाख रुपये, इलाहाबाद हाई कोर्ट का एसबीआई को रकम लौटाने का आदेश",
  "summary": "पति की मृत्यु के बाद बीमा राशि से 17.29 लाख रुपये लोन रिकवरी के नाम पर काटने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एसबीआई को अंतरिम राहत देते हुए राशि लौटाने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बीमा का पैसा मृतक की संपत्ति नहीं बल्कि लाभार्थी का अधिकार है।",
  "content": "इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी करते हुए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को निर्देश दिया है कि वह एक दिवंगत लोन धारक की पत्नी के बैंक खाते से काटी गई पूरी रकम तुरंत लौटाए। बैंक ने अपने एक ग्राहक की मृत्यु के बाद उसके बकाया व्यक्तिगत ऋण की भरपाई के लिए उसकी विधवा के खाते से 17,29,999 रुपये की राशि काट ली थी। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जीवन बीमा से मिलने वाला पैसा मृतक की संपत्ति का हिस्सा नहीं होता, बल्कि वह उसके नामांकित व्यक्ति का स्वतंत्र अधिकार है।\n\nबीमा राशि और बैंक की कार्रवाई का पूरा मामला\nयह मामला उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले से जुड़ा है, जहां एक प्राथमिक विद्यालय में पदस्थ प्रधानाध्यापक अंबेश कुमार ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से पर्सनल लोन लिया था। बीते वर्ष जून महीने में एक सड़क हादसे में अंबेश कुमार का अचानक निधन हो गया था। उनके चले जाने के बाद उनकी पत्नी के बैंक खाते में पति के जीवन बीमा की 50 लाख रुपये की दावा राशि प्राप्त हुई। हालांकि, बैंक ने इस बीमा राशि में से 17,29,999 रुपये बकाया लोन चुकता करने के नाम पर स्वतः ही काट लिए।\n\nउच्च न्यायालय में विधवा की दलील और अदालत का रुख\nबैंक की इस कार्रवाई के खिलाफ मृतक की पत्नी ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ता ने अदालत में पक्ष रखा कि उन्होंने न तो बैंक से कोई कर्ज लिया था और न ही वे उस लोन के लिए किसी तरह की गारंटर थीं। ऐसी स्थिति में बैंक को उनके व्यक्तिगत खाते से बिना अनुमति धनराशि काटने का कोई कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है।\n\nअदालत का निर्णय और धारा 18(iii) का विश्लेषण\nमामले की सुनवायी कर रही न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने बैंक की इस कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की। पीठ ने माना कि यद्यपि बैंक के लोन समझौते की धारा 18(iii) में समायोजन (सेट-ऑफ) के अधिकार काफी व्यापक लिखे गए हैं, फिर भी ये प्रावधान बैंक को किसी विधवा को प्राप्त बीमा लाभ से मृतक के कर्ज की वसूली की अनुमति नहीं देते हैं। अदालत ने जोर देकर कहा कि बीमा राशि मृतक की एस्टेट नहीं होती जिसे उत्तराधिकारियों के लिए छोड़ी गई देनदारी मान लिया जाए। यह एक सामाजिक सुरक्षा लाभ है, जो लाभार्थी को उसकी व्यक्तिगत हैसियत में हासिल होता है।\n\nक्या होता है लोन एग्रीमेंट में समायोजन का अधिकार?\nबैंकों के लोन एग्रीमेंट की धारा 18(iii) के तहत वित्तीय संस्थाओं को सेट-ऑफ का अधिकार मिलता है। इसके माध्यम से यदि कोई उधारकर्ता लोन चुकाने में डिफॉल्ट करता है, तो बैंक को बिना किसी पूर्व सूचना के उसके अन्य खातों जैसे बचत खाता, फिक्स्ड डिपॉजिट या रिकरिंग डिपॉजिट में जमा रकम का उपयोग बकाया ऋण, ब्याज और जुर्माने के समायोजन के लिए करने की सहमति मिल जाती है। हालांकि, इस मामले में उच्च न्यायालय के रुख ने स्पष्ट किया है कि लाभार्थी के अलग खाते में आई सामाजिक सुरक्षा राशि पर यह नियम लागू नहीं होता। अदालत में इस याचिका पर अगली विस्तृत सुनवाई 7 अक्टूबर, 2026 को निर्धारित की गई है।\n\nइसका आप पर असर\nयह फैसला लोन लेने वाले परिवारों और जीवन बीमा के लाभार्थियों के वित्तीय अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।\n\n• भारत भर में: किसी भी बैंक ग्राहक की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी या कानूनी वारिस द्वारा प्राप्त बीमा राशि को बैंक बिना सहमति के बकाया कर्ज में समायोजित नहीं कर सकते। यदि बैंक ऐसा कदम उठाता है तो प्रभावित लाभार्थी अदालत के माध्यम से अपनी राशि वापस हासिल करने का दावा कर सकते हैं।\n• उत्तर प्रदेश में: राज्य में एसबीआई या अन्य बैंकों से लोन लेने वाले परिवारों के लिए यह अंतरिम आदेश एक बड़ी कानूनी नजीर प्रदान करता है। कौशांबी जैसी घटनाओं से पीड़ित लोग अब बैंक की मनमानी कार्रवाई के खिलाफ तुरंत न्यायिक राहत की मांग कर सकते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nएसबीआई ने मृतक ग्राहक के लोन खाते में डिफॉल्ट होने के बाद अपने लोन समझौते की धारा 18(iii) के तहत यह कटौती की थी, जिसके खिलाफ पीड़िता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।\n\n• बैंक की कार्रवाई की वजह: कौशांबी के प्राथमिक शिक्षक अंबेश कुमार की जून में सड़क हादसे में मौत के बाद उनके पर्सनल लोन का भुगतान रुक गया था, जिसके बाद बैंक ने सेट-ऑफ अधिकार का हवाला देते हुए रिकवरी की।\n• अदालत के हस्तक्षेप का कारण: मृतक की पत्नी न तो लोन में सह-उधारकर्ता थीं और न ही गारंटर, इसलिए कोर्ट ने माना कि लाभार्थी के निजी खाते से पैसा काटना प्रथम दृष्टया अनुचित है।\n• कानूनी स्थिति का आधार: अदालत के अनुसार जीवन बीमा से मिला पैसा मृतक द्वारा छोड़ी गई संपत्ति (एस्टेट) का हिस्सा नहीं है, बल्कि वह लाभार्थी को मिलने वाला एक स्वतंत्र सामाजिक सुरक्षा लाभ है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने किस मामले में एसबीआई को राशि लौटाने का आदेश दिया?\nअदालत ने दिवंगत शिक्षक अंबेश कुमार की पत्नी के खाते से एसबीआई द्वारा बकाया पर्सनल लोन के लिए काटे गए 17,29,999 रुपये लौटाने का अंतरिम आदेश दिया है।\n\n2. बैंक ने मृतक की पत्नी के खाते से कुल कितनी रकम काटी थी?\nस्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने बीमा से प्राप्त 50 लाख रुपये में से 17,29,999 रुपये की कटौती की थी।\n\n3. याचिकाकर्ता की मुख्य दलील क्या थी?\nमृतक की पत्नी ने कहा कि वे लोन की न तो मुख्य उधारकर्ता थीं और न ही गारंटर, इसलिए बैंक उनके निजी खाते से पैसे नहीं काट सकता।\n\n4. लोन समझौते का क्लॉज़ 18(iii) क्या कहता है?\nयह क्लॉज़ बैंकों को डिफॉल्ट की स्थिति में बिना किसी पूर्व सूचना के उधारकर्ता के अन्य खातों से जमा राशि को लोन और ब्याज में सेट-ऑफ (समायोजित) करने का अधिकार देता है।\n\n5. अदालत ने बीमा राशि के बारे में क्या स्पष्ट किया?\nपीठ ने कहा कि बीमा का पैसा मृतक की संपत्ति नहीं होता, बल्कि वह लाभार्थी को मिलने वाला स्वतंत्र सामाजिक सुरक्षा लाभ है।\n\n6. इस मामले पर अगली सुनवाई कब होगी?\nउच्च न्यायालय में इस याचिका पर अगली सुनवाई 7 अक्टूबर, 2026 को तय की गई है।",
  "url": "https://trendkia.com/business/pati-ke-lona-para-patni-ke-khate-se-kate-17-30-lakha-rupaye-allahabad-high-court-ka-sbi-ko-rakama-lautane-ka-adesha-39182",
  "category": "व्यापार",
  "publishedAt": "2026-09-26",
  "tags": [
    "इलाहाबाद हाई कोर्ट",
    "एसबीआई लोन रिकवरी",
    "पर्सनल लोन नियम",
    "जीवन बीमा क्लेम",
    "कौशांबी न्यूज़",
    "बैंकिंग कानून"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}