प्रयागराज की महिलाओं ने गोबर से मूर्तियां बनाकर खड़ा किया स्टार्टअप, दूसरे राज्यों तक पहुंची मांग प्रयागराज की महिलाओं ने गोबर और गंगा की मिट्टी से पर्यावरण के अनुकूल दीये और मूर्तियां बनाकर आत्मनिर्भरता की एक मिसाल कायम की है। वर्तिका स्वयं सहायता समूह के जरिए आज 400 से अधिक महिलाएं इस कारोबार से जुड़कर अच्छी कमाई कर रही हैं। प्रयागराज में घर की चारदीवारी के भीतर रहकर हुनर दिखाने वाली महिलाओं ने साबित कर दिया है कि लगन हो तो किसी भी काम को सफल व्यवसाय में बदला जा सकता है। शहर की ये महिलाएं गाय के गोबर से सुंदर दीये और मूर्तियां तैयार कर रही हैं, जिससे उन्हें अच्छी खासी कमाई हो रही है। कभी इस अनूठे काम को लेकर समाज के ताने सुनने वाली इन महिलाओं के हाथों के बने दीये और मूर्तियां अब केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि दूसरे जिलों और अन्य राज्यों तक अपनी पहुंच बना चुके हैं। खास तौर पर त्योहारों के सीजन में इनकी मांग में जबरदस्त तेजी देखने को मिलती है। वर्तिका स्वयं सहायता समूह के बैनर तले महिलाएं घरों में ही रहकर पूरी मेहनत से ये उत्पाद तैयार कर रही हैं और अपनी एक अलग आर्थिक पहचान बना रही हैं। गणेश चतुर्थी से हुई थी इस अनूठी पहल की शुरुआत इस पूरे उद्यम की रूपरेखा वर्तिका द्विवेदी ने तैयार की थी। उन्होंने अपनी बातचीत में बताया कि इस समूह की स्थापना करीब छह साल पहले की गई थी। इसकी शुरुआत गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर हुई थी, जब कुछ महिलाएं आपस में मिलकर बैठी थीं और उन्होंने विचार करके गौरी-गणेश की मूर्तियां बनाई थीं। यहीं से गोबर के जरिए पर्यावरण के अनुकूल और पूरी तरह शुद्ध सामान बनाने का विचार जन्मा। इसके बाद महिलाओं को संगठित करके विधिवत रूप से काम को आगे बढ़ाया गया। हालांकि शुरुआती दौर बिल्कुल भी आसान नहीं था। जब लोगों को यह पता चलता था कि गोबर से कलात्मक वस्तुएं बनाई जा रही हैं, तो वे हंसते थे। समाज के कई लोग ताने कसते हुए कहते थे कि गोबर से जुड़े इस काम से महिलाएं कितनी आगे बढ़ पाएंगी, लेकिन इन सब बाधाओं को दरकिनार कर महिलाओं ने अपना सफर जारी रखा। बनाया गया है दस हजार से अधिक दीयों और मूर्तियों का लक्ष्य इस समूह द्वारा हर साल करीब पांच से दस हजार दीये और मूर्तियां तैयार करने का लक्ष्य रखा जाता है। इस बार तो मूर्तियों की संख्या ने दस हजार के आंकड़े को भी पार कर लिया है। हालांकि इस बार मौसम की चुनौती भी सामने आई थी क्योंकि लगातार बारिश के कारण मूर्तियों को प्राकृतिक रूप से सुखाने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा। स्थिति यह थी कि कई मूर्तियों को समय पर तैयार करने के लिए ड्रायर की मदद से सुखाना पड़ा। तमाम मुश्किलों और चुनौतियों के बावजूद समूह की महिलाओं ने हार नहीं मानी और अपना काम समय पर पूरा किया। इसके बाद अधिकांश मूर्तियों को बिक्री के लिए विभिन्न स्थानों पर भेजा जा चुका है। अपने इस कारोबार को कानूनी और औपचारिक रूप देने के लिए इस बार जीएसटी के वास्ते भी आधिकारिक आवेदन किया गया है, जिससे व्यवसाय को और अधिक विस्तार मिल सके। दूर-दूर तक फैला नेटवर्क और मिला पेशेवर प्रशिक्षण इस लघु उद्योग से अब तक 400 से अधिक महिलाएं जुड़ चुकी हैं। प्रयागराज के अलावा इस समूह का दायरा कौशांबी, ललितपुर, फिरोजाबाद, कासगंज, बांदा, फर्रुखाबाद, बुलंदशहर और राजस्थान के जैसलमेर तक फैल चुका है। वर्तिका खुद अलग-अलग जिलों में जाकर अन्य महिलाओं को इस हुनर का पेशेवर प्रशिक्षण देती हैं। उन्होंने अपनी सफलता के पीछे जिला नगरीय विकास अभिकरण यानी डूडा से जुड़े स्वयं सहायता समूह के माध्यम को अहम बताया, जिसकी मदद से उन्हें शुरुआत करने का अवसर मिला। इसके बाद उन्होंने बड़ौदा स्वरोजगार विकास संस्थान से उचित प्रशिक्षण प्राप्त किया। अब वह उसी संस्थान के माध्यम से विभिन्न जिलों में जाकर दूसरी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का पाठ पढ़ा रही हैं और उन्हें यह हुनर सिखा रही हैं। गोबर और पवित्र गंगा की मिट्टी का अनूठा संगम इस समूह से वर्ष 2022 से जुड़ी शालिनी श्रीवास्तव अपने अनुभव साझा करते हुए बताती हैं कि पहले उनके पास आय का कोई साधन नहीं था और वह हमेशा से अपने दम पर कुछ करने की इच्छा रखती थीं। जब वह इस समूह के साथ जुड़ीं, तो उन्हें दिवाली के मौके पर गोबर और गंगा की मिट्टी मिलाकर मूर्तियां तैयार करने का कार्य सौंपा गया। शुरुआत में उनके आसपास के लोग भी तरह-तरह की बातें बनाकर उनका मनोबल गिराने की कोशिश करते थे, लेकिन उन्होंने किसी की नकारात्मक बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया। आज स्थिति यह है कि वही लोग उनसे संपर्क करके खुद दीये और मूर्तियां खरीदने आते हैं, जो उनकी मेहनत की सबसे बड़ी जीत है। अगले साल पचास हजार मूर्तियां तैयार करने का बड़ा लक्ष्य समूह की एक अन्य सक्रिय सदस्य रमा मलिक बताती हैं कि बहराना इलाके में समूह की महिलाओं की ओर से एक विशेष स्टॉल भी लगाई गई है। इस स्टॉल पर लगभग पांच हजार दीये और मूर्तियां बिक्री के लिए प्रदर्शित की गई हैं। इस काम के जरिए समूह से जुड़ी सभी महिलाएं अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारने में पूरा सहयोग दे रही हैं। वर्तिका के अनुसार, उनके हौसले अब और बुलंद हैं और उनका अगला लक्ष्य आगामी वर्ष में 25 से 50 हजार मूर्तियां तैयार करने का है। इस बड़े लक्ष्य के पीछे उद्देश्य यह है कि अधिक से अधिक महिलाओं को इस सकारात्मक रोजगार से जोड़ा जा सके और उन्हें आर्थिक रूप से पूरी तरह सशक्त बनाया जा सके। इसका आप पर असर यह पहल ग्रामीण और अर्ध-शहरी महिलाओं को घर बैठे आत्मनिर्भर बनने का एक ठोस अवसर प्रदान करती है, जिससे उनकी पारिवारिक आय में सीधा सुधार होता है। • भारत में: पर्यावरण के अनुकूल स्वदेशी उत्पादों की मांग बढ़ने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है और पारंपरिक कलाओं को नया बाजार मिलता है। • प्रयागराज में: स्थानीय महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण और रोजगार के नए विकल्प मिलने से उनके जीवन स्तर में सकारात्मक बदलाव आ रहा है। ऐसा क्यों हुआ पारंपरिक रोजगार के सीमित अवसरों और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले प्लास्टिक व चीनी सामानों के विकल्प की तलाश के कारण इस अनूठे व्यवसाय की नींव रखी गई। • शुरुआत की वजह: गणेश चतुर्थी के दौरान महिलाओं द्वारा मिलकर पर्यावरण के अनुकूल मूर्तियां बनाने के सफल प्रयोग ने इसे बड़े पैमाने पर शुरू करने की प्रेरणा दी। • चुनौतियां और विस्तार: गोबर से सामान बनाने को लेकर शुरुआती सामाजिक उपहास और भारी बारिश के कारण सूखने की समस्याओं के बावजूद महिलाओं ने डटकर मुकाबला किया। • सरकारी सहायता: जिला नगरीय विकास अभिकरण और बड़ौदा स्वरोजगार विकास संस्थान से मिले तकनीकी प्रशिक्षण ने इस छोटे समूह को बड़े उद्यम में बदल दिया। सवाल-जवाब 1. प्रयागराज में गोबर से दीये और मूर्तियां बनाने की शुरुआत किसने की थी? इस समूह की शुरुआत वर्तिका द्विवेदी ने करीब छह साल पहले गणेश चतुर्थी के दौरान की थी। 2. इस काम से अब तक कितनी महिलाएं जुड़ चुकी हैं? प्रयागराज और अन्य जिलों की 400 से अधिक महिलाएं इस रोजगार से जुड़ चुकी हैं। 3. इस बार कितनी मूर्तियां और दीये तैयार करने का लक्ष्य था? इस बार मूर्तियों और दीयों का लक्ष्य 10 हजार से अधिक का था, जिसे पूरा कर लिया गया है। 4. यह उत्पाद प्रयागराज के अलावा किन अन्य राज्यों तक पहुँच रहा है? इन उत्पादों की मांग कौशांबी, ललितपुर, फिरोजाबाद, बांदा और राजस्थान के जैसलमेर तक पहुँच चुकी है। 5. मूर्तियों को बनाने में किस सामग्री का उपयोग किया जाता है? मूर्तियां गाय के गोबर और पवित्र गंगा की मिट्टी के मिश्रण से तैयार की जाती हैं। प्रेरणा और सबक इन महिलाओं की सफलता से यह स्पष्ट होता है कि सीमित संसाधनों और सामाजिक बाधाओं के बावजूद कड़ी मेहनत से आत्मनिर्भर बना जा सकता है। • दृढ़ संकल्प: सामाजिक आलोचनाओं और ताने सुनने के बावजूद अपने लक्ष्य पर अडिग रहें और नकारात्मकता को खुद पर हावी न होने दें। • कौशल विकास: उपलब्ध सरकारी और संस्थागत प्रशिक्षण कार्यक्रमों का लाभ उठाकर अपने हुनर को व्यावसायिक रूप दें। • सामूहिक शक्ति: स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर छोटे प्रयासों को बड़े पैमाने पर एक सफल व्यवसाय में बदला जा सकता है। • नवाचार: स्थानीय और पारंपरिक सामग्रियों का उपयोग करके पर्यावरण के अनुकूल नए उत्पादों की माँग को पूरा किया जा सकता है। https://trendkia.com/business/prayagraj-ki-mahilaon-ne-gobar-se-moortiyan-banakar-khada-kiya-startup-doosre-rajyon-tak-pahunchi-maang-57231 TrendKia — Har trend, sabse pehle.