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  "title": "रांची के कृषि मेले में बिना मिट्टी की खेती का जलवा, छत और बालकनी पर सालभर सब्जी उगाने का रास्ता खोल रही हाइड्रोपोनिक तकनीक",
  "summary": "रांची के मोराबादी मैदान में चल रहे तीन दिवसीय कृषि व्यापार मेले में हाइड्रोपोनिक खेती लोगों की पहली पसंद बन गई है, जिसमें बिना मिट्टी के पानी में घुले पोषक तत्वों से सब्जियां और स्ट्रॉबेरी तक उगाई जा रही हैं।",
  "content": "घटती खेती की जमीन और बढ़ते शहरों के बीच एक ऐसी तकनीक चर्चा में है, जो मिट्टी की जरूरत ही खत्म कर देती है। रांची के मोराबादी मैदान में झारखंड सरकार की ओर से लगाए गए तीन दिवसीय कृषि व्यापार मेले में यही तकनीक, यानी हाइड्रोपोनिक खेती, सबसे ज्यादा भीड़ खींच रही है। सोशल मीडिया पर अक्सर वायरल होने वाली इस आधुनिक खेती को अब झारखंड के लोग करीब से देख और समझ रहे हैं।\n\nमेले में Sashanka Agriculture Technology के स्टॉल पर किसानों से लेकर आम शहरी लोगों तक को बताया जा रहा है कि किस तरह घर की छत, बालकनी या किसी खाली पड़े कमरे में भी पूरे साल ताजी और पौष्टिक सब्जियां उगाई जा सकती हैं। जानकारों का कहना है कि बढ़ते शहरीकरण और सिकुड़ती कृषि भूमि के दौर में यह खेती का एक भरोसेमंद विकल्प बनकर उभर रही है।\n\nआखिर बिना मिट्टी के पौधे बढ़ते कैसे हैं\nकंपनी के डिप्टी मैनेजर संजीव कुमार के मुताबिक, हाइड्रोपोनिक तकनीक खासकर उन इलाकों के लिए वरदान है जहां मिट्टी की गुणवत्ता खराब है या खेती लायक जमीन ही नहीं बची। इसमें मिट्टी का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं होता। इसके बजाय पौधों को वह पोषण सीधे पानी में घोलकर दिया जाता है, जिसकी उन्हें बढ़ने के लिए जरूरत होती है। नतीजा यह कि बहुत कम जगह में भी अच्छी पैदावार मिल जाती है।\n\nइसकी रीढ़ है एनएफटी यानी न्यूट्रिएंट फिल्म टेक्नोलॉजी। संजीव कुमार बताते हैं कि इसमें कई परतों वाला सिस्टम बनाया जाता है, जहां पीवीसी पाइपों के अंदर पोषक तत्वों से भरा पानी लगातार बहता रहता है। पाइप के ऊपरी हिस्से में नेट पॉट लगाए जाते हैं और कोकोपीट की मदद से पौधे उनमें टिकाए जाते हैं। पौधों की जड़ें हर वक्त इसी पोषक पानी के संपर्क में रहती हैं, जिससे वे एक समान और तेजी से बढ़ती हैं।\n\nपालक से लेकर स्ट्रॉबेरी तक, सब मुमकिन\nसंजीव कुमार के अनुसार, इस तरीके से उगाई गई फसलें न सिर्फ एक जैसी बढ़ती हैं, बल्कि मिट्टी से फैलने वाले कई कीड़ों और बीमारियों से भी बची रहती हैं। पालक, धनिया, मेथी, तरह-तरह के साग, टमाटर, मिर्च, खीरा और यहां तक कि स्ट्रॉबेरी जैसी फसलें इस प्रणाली में आसानी से उगाई जा सकती हैं। हां, जिन पौधों का तना बहुत सख्त होता है, उन्हें इस सिस्टम के लिए ठीक नहीं माना जाता।\n\nलागत के सवाल पर उन्होंने बताया कि छोटे स्तर पर हाइड्रोपोनिक सिस्टम लगाने का खर्च करीब 8 से 10 हजार रुपये से शुरू होता है। जैसे-जैसे जरूरत और उत्पादन क्षमता बढ़ाई जाती है, सिस्टम का आकार बड़ा होता जाता है और उसी हिसाब से लागत भी बढ़ती है।\n\nबंद कमरे में सूरज की जगह लेती है एलईडी लाइट\nअगर कोई बिना खिड़की वाले बंद कमरे में भी यह खेती करना चाहे तो वह भी संभव है। संजीव कुमार बताते हैं कि ऐसी जगहों पर ब्रॉड स्पेक्ट्रम व्हाइट एलईडी लाइट लगाई जाती है, जो सूरज की रोशनी की भरपाई कर देती है। इससे पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बेहतर ढंग से चलती है, जड़ें मजबूत बनती हैं और पत्तियां हरी-भरी रहती हैं।\n\nजानकारों का मानना है कि आने वाले समय में हाइड्रोपोनिक खेती टिकाऊ खेती का एक अहम जरिया साबित हो सकती है। यह तकनीक सिर्फ किसानों के लिए नहीं, बल्कि शहरों में रहने वाले उन लोगों के लिए भी खेती के नए दरवाजे खोल रही है, जिनके पास जमीन का टुकड़ा तक नहीं है।\n\nइसका आप पर असर\n• भारत में: जिनके पास खेती की जमीन नहीं है, वे भी करीब 8 से 10 हजार रुपये में छोटा हाइड्रोपोनिक सिस्टम लगाकर घर पर सालभर पालक, टमाटर और स्ट्रॉबेरी जैसी सब्जियां उगा सकते हैं।\n• रांची में: मोराबादी मैदान के तीन दिवसीय कृषि मेले में जाकर लोग इस तकनीक और उसकी लागत की जानकारी सीधे विशेषज्ञों से ले सकते हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. हाइड्रोपोनिक खेती में मिट्टी की जगह क्या इस्तेमाल होता है?\nइसमें मिट्टी का बिल्कुल उपयोग नहीं होता, पौधों को पानी में घुले पोषक तत्वों के जरिए बढ़ाया जाता है। पीवीसी पाइपों में यह पोषक पानी लगातार बहता रहता है और जड़ें उसी के संपर्क में रहती हैं।\n\n2. इस तकनीक से कौन-कौन सी फसलें उगाई जा सकती हैं?\nपालक, धनिया, मेथी, तरह-तरह के साग, टमाटर, मिर्च, खीरा और स्ट्रॉबेरी जैसी फसलें इससे उगाई जा सकती हैं। बहुत सख्त तने वाले पौधे इसके लिए उपयुक्त नहीं माने जाते।\n\n3. छोटा हाइड्रोपोनिक सिस्टम लगाने में कितना खर्च आता है?\nछोटे स्तर पर इसकी लागत करीब 8 से 10 हजार रुपये से शुरू होती है। जरूरत और उत्पादन क्षमता बढ़ने पर सिस्टम का आकार और लागत दोनों बढ़ते हैं।\n\n4. क्या बिना धूप वाले बंद कमरे में भी यह खेती हो सकती है?\nहां, बंद कमरे में ब्रॉड स्पेक्ट्रम व्हाइट एलईडी लाइट लगाई जाती है जो सूरज की रोशनी की भरपाई करती है। इससे प्रकाश संश्लेषण बेहतर होता है और जड़ें मजबूत बनती हैं।",
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  "category": "व्यापार",
  "publishedAt": "2026-06-17",
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