रेगिस्तानी तपिश में निखर रहा असम और कर्नाटक का कच्चा माल, बिना खेती के भी हर महीने 300 टन सुपारी खपा रहा बीकानेर बीकानेर में सुपारी की खेती नहीं होती, लेकिन यहां की तेज धूप और खुश्क मौसम में असम और कर्नाटक से आने वाली कच्ची सुपारी को सुखाकर खास स्वाद दिया जाता है। हर महीने 300 टन की खपत वाले इस कारोबार से सैकड़ों स्थानीय लोगों को रोजगार मिल रहा है। राजस्थान के रेतीले धोरों और शुष्क मौसम के लिए पहचाने जाने वाले बीकानेर शहर ने व्यापार की दुनिया में एक अनोखी मिसाल कायम की है। जिस शहर की रेतीली मिट्टी में सुपारी का एक भी पौधा नहीं उगता, वहां आज सुपारी का इतना विशाल और व्यवस्थित कारोबार खड़ा हो चुका है जो किसी को भी हैरान कर सकता है। व्यापारिक आंकड़ों के अनुसार, इस शहर में हर महीने लगभग 300 टन सुपारी की खपत और बिक्री होती है। यह कोई साधारण व्यापार नहीं है, बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा एक ऐसा कुशल उद्योग है जिसने देश भर के बाजारों में 'मारवाड़ी सुपारी' या 'बीकानेरी सुपारी' के नाम से अपनी एक खास पहचान और मजबूत ब्रांड वैल्यू स्थापित कर ली है। शहर के परकोटे के भीतर स्थित पुराने बाजारों में जब आप कदम रखते हैं, तो वहां जगह-जगह चलने वाली कटाई, छंटाई और पॉलिशिंग की आवाजें इस जीवंत अर्थव्यवस्था की कहानी खुद-ब-बखुद बयां करती हैं। असम और कर्नाटक से रेगिस्तान तक का लंबा सफर बीकानेर में बिकने वाली इस मशहूर सुपारी का सफर भारत के उन दक्षिणी और पूर्वोत्तर राज्यों से शुरू होता है जहां भारी बारिश और नम जलवायु होती है। स्थानीय व्यापारी मुख्य रूप से असम और कर्नाटक जैसे राज्यों से बड़े पैमाने पर कच्ची सुपारी ट्रकों और मालगाड़ियों के जरिए मंगवाते हैं। इन राज्यों के हरे-भरे बागानों से निकलने वाला यह कच्चा माल जब बीकानेर के गोदामों में पहुंचता है, तो उसके बाद असली जादुई खेल शुरू होता है। दरअसल, बीकानेर की तेज चिलचिलाती धूप और यहां की बेहद शुष्क जलवायु वह प्राकृतिक वरदान है जो इस कच्ची सुपारी को एक बेहतरीन और महंगे उत्पाद में बदल देती है। खुले मैदानों, बड़ी छतों और खाली पड़े भूखंडों पर इन कच्ची सुपारियों को सुखाने के लिए बड़े पैमाने पर फैला दिया जाता है। मौसम के मिजाज, धूप की तेजी और सुपारी की शुरुआती गुणवत्ता को देखते हुए यह सुखाने की प्रक्रिया कुछ दिनों से लेकर तीन-चार महीने तक लंबी चल सकती है। चिलचिलाती धूप से निखरता है स्वाद और रंग इतनी लंबी अवधि तक तेज धूप में तपने के कारण इस कच्ची सुपारी के रासायनिक और भौतिक गुणों में एक बहुत बड़ा बदलाव आता है। यह रेगिस्तानी मौसम सुपारी के भीतर मौजूद प्राकृतिक नमी को पूरी तरह से सोख लेता है। स्थानीय व्यापारियों का स्पष्ट कहना है कि यही वह सबसे अहम प्रक्रिया है जिससे सुपारी का मूल रंग, उसकी सख्त बनावट और सबसे महत्वपूर्ण बात, उसका स्वाद निखर कर सामने आता है। यही अनूठा और कड़क स्वाद बीकानेर की सुपारी को बाजार में मौजूद अन्य विकल्पों से बिल्कुल अलग और खास बनाता है। नमी पूरी तरह से खत्म हो जाने के कारण इसकी शेल्फ लाइफ यानी खराब होने की अवधि भी काफी बढ़ जाती है, जिससे इसे देश के किसी भी कोने में आसानी से महीनों तक स्टोर किया जा सकता है। बाजार की मांग के अनुसार होती है कटाई धूप में अच्छी तरह से सूख जाने के बाद, साबुत सुपारी को सीधा बाजार में बिक्री के लिए नहीं भेजा जाता है। इसके बाद इसे प्रोसेसिंग के एक लंबे और मेहनत भरे चरण से गुजरना पड़ता है। शहर में चल रही सैकड़ों छोटी-बड़ी इकाइयों में इस सूखी हुई कड़क सुपारी को भारी मशीनों और पारंपरिक धारदार औजारों की मदद से अलग-अलग आकारों में काटा जाता है। ग्राहकों की पसंद और देशभर के पान मसाला बाजार की मांग को ध्यान में रखते हुए इसके छोटे-बड़े टुकड़े किए जाते हैं। इनमें सबसे अधिक मांग 'चिकनी सुपारी' की रहती है। व्यापारियों के अनुसार, इस विशेष किस्म का उपयोग मुख्य रूप से मीठी सुपारी और सुगंधित माउथ फ्रेशनर तैयार करने में होता है, जिसे लोग भोजन के बाद बड़े चाव से खाते हैं। कटाई के साथ-साथ इन टुकड़ों पर विशेष पॉलिश भी की जाती है ताकि वे दिखने में भी आकर्षक और चमकदार लगें। कीमतों में अंतर और स्थानीय लोगों को रोजगार गुणवत्ता, आकार, पॉलिश और उसके मूल राज्य के आधार पर सुपारी की कीमत बाजार में अलग-अलग तय होती है। अगर मौजूदा भाव की बात करें, तो असम से आने वाली सुपारी स्थानीय बाजार में 700 रुपये से लेकर 800 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच आसानी से बिक जाती है। वहीं, कर्नाटक की सुपारी को अधिक प्रीमियम और कड़क माना जाता है, इसलिए इसकी कीमत 1000 रुपये से लेकर 1600 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच जाती है। यह विशाल कारोबार सिर्फ बड़े व्यापारियों को ही मुनाफा नहीं दे रहा है, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का एक बहुत बड़ा जरिया भी बन चुका है। बीकानेर शहर में सुपारी को ट्रकों से उतारने, उसे सुखाने, उसके टुकड़े करने, पॉलिश करने और अंत में छोटे-बड़े पैकेटों में पैकिंग करने के काम से करीब 600 से 700 लोगों की रोजी-रोटी सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। पीढ़ियों से चला आ रहा व्यापारिक दबदबा कच्चे माल के लिए पूरी तरह से अन्य राज्यों की कृषि पर निर्भर होने के बावजूद, बीकानेर के व्यापारियों ने अपनी व्यापारिक सूझबूझ और इस खास प्रोसेसिंग कला के दम पर इस क्षेत्र में एकछत्र राज कायम किया है। परकोटे के भीतर के पुराने और संकरे बाजार आज भी इस व्यापार के प्रमुख केंद्र बने हुए हैं। कई व्यापारिक परिवार ऐसे हैं जो पीढ़ियों से सिर्फ इसी कारोबार में लगे हुए हैं और उन्होंने इसे आधुनिक रूप दे दिया है। यह सिर्फ एक व्यापार नहीं रहा, बल्कि अब यह बीकानेर की व्यावसायिक पहचान और अर्थव्यवस्था का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। इसने साबित कर दिया है कि अगर सही तकनीक और प्राकृतिक मौसम का सही इस्तेमाल किया जाए, तो खेती किए बिना भी कोई शहर किसी विशेष उत्पाद का देश में सबसे बड़ा हब बन सकता है। इसका आप पर असर • भारत में: पान मसाला और मीठी सुपारी का सेवन करने वाले लोगों को मिलने वाला खास कड़क स्वाद और रंग बीकानेर की इसी प्राकृतिक प्रोसेसिंग का नतीजा होता है। • बीकानेर में: स्थानीय निवासियों के लिए यह बिना खेती वाला उद्योग एक जीवनरेखा है, जो कटाई, पॉलिशिंग और पैकिंग के जरिए 700 से अधिक परिवारों को सीधा रोजगार दे रहा है। सवाल-जवाब 1. बीकानेर में हर महीने कितनी सुपारी की खपत होती है? बीकानेर में हर महीने लगभग 300 टन सुपारी की खपत और बिक्री होती है। 2. बीकानेर में कच्ची सुपारी किन राज्यों से आती है? बीकानेर के व्यापारी मुख्य रूप से असम और कर्नाटक जैसे राज्यों से कच्ची सुपारी मंगवाते हैं। 3. कच्ची सुपारी को सुखाने में कितना समय लगता है? मौसम और धूप की तेजी के आधार पर, कच्ची सुपारी को पूरी तरह सुखाने में कुछ दिनों से लेकर तीन-चार महीने तक का समय लग सकता है। 4. बीकानेर में असम और कर्नाटक की सुपारी की कीमत क्या है? असम की सुपारी 700 से 800 रुपये प्रति किलो बिकती है, जबकि प्रीमियम मानी जाने वाली कर्नाटक की सुपारी 1000 से 1600 रुपये प्रति किलो तक बिकती है। https://trendkia.com/business/registani-tapisha-men-nikhara-raha-assam-aura-karnataka-ka-kachcha-mala-bina-kheti-ke-bhi-hara-mahine-300-tana-supari-khapa-raha-b-8909 TrendKia — Har trend, sabse pehle.