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  "type": "article",
  "title": "रिकॉर्ड ऊंचाई से 24 फीसदी फिसला सोना, जानिए क्यों त्योहारी सीजन में बड़े खरीदार बना रहे दूरी",
  "summary": "अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने के भाव में 24 फीसदी की तेज गिरावट के बावजूद प्रमुख भारतीय ज्वैलर्स नई खरीदारी टाल रहे हैं। आयात शुल्क और कीमतों में और नरमी की संभावना के बीच बाजार दिग्गज सही समय का इंतजार कर रहे हैं।",
  "content": "दिवाली और धनतेरस के पारंपरिक त्योहारी दौर में भारतीय सर्राफा कारोबार का माहौल आमतौर पर बेहद चमकदार रहता है, लेकिन मौजूदा सीजन में व्यापार की रफ्तार काफी सुस्त दिखाई दे रही है। आम खुदरा ग्राहकों की हिचकिचाहट के साथ-साथ अब देश के बड़े ज्वैलरी घराने भी नया स्टॉक उठाने से साफ तौर पर बच रहे हैं। वैश्विक और स्थानीय स्तर पर सोने की दरों में 24 फीसदी तक का बड़ा गोता लगने के बाद भी प्रमुख व्यापारियों की ओर से कोई आक्रामक खरीद देखने को नहीं मिल रही है। सामान्य कारोबारी चक्र में जब भी कीमती धातुओं के दाम गिरते हैं, तब थोक व्यापारी बड़े पैमाने पर माल सुरक्षित करते हैं, लेकिन इस बार दिग्गज कारोबारी केवल स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। इस असाधारण रुख ने खुदरा उपभोक्ताओं और निवेशकों के मन में यह उत्सुकता पैदा कर दी है कि क्या पीली धातु आने वाले दिनों में और अधिक सस्ती होने जा रही है।\n\nशीर्ष स्तर से भारी फिसलन और 4,000 डॉलर का आंकड़ा\nकीमतों के पिछले आंकड़ों पर गौर करें तो इसी साल जनवरी के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 5,400 डॉलर प्रति औंस के ऐतिहासिक शिखर को पार कर गया था। उस रिकॉर्ड ऊंचाई के बाद से बाजार में लगातार दबाव बना रहा और अब तक दरों में लगभग 24 फीसदी का बड़ा करेक्शन आ चुका है। बीते सप्ताह के दौरान बिकवाली का दबाव इतना गहरा गया कि भाव 4,000 डॉलर प्रति औंस के मनोवैज्ञानिक स्तर से भी नीचे लुढ़क गए। अंतरराष्ट्रीय एक्सचेंज पर इतनी तेज गिरावट दर्ज होने के बाद भी भारत के प्रमुख बुलियन कारोबारियों का शांत बैठना बाजार के जानकारों और रोजमर्रा के खरीदारों को हैरान कर रहा है।\n\nबड़े कारोबारियों की हिचकिचाहट के पीछे की रणनीति\nघरेलू बुलियन रिफाइनरी एमएमटीसी-पीएएमपी इंडिया के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर समीत गुहा के अनुसार, देश के शीर्ष ज्वैलरी ब्रांड्स फिलहाल किसी भी तरह की जल्दबाजी या आक्रामक खरीदारी के मूड में नहीं हैं। बुलियन व्यापार का स्थापित नियम बताता है कि जब बाजार में तेजी का दौर होता है, तो कारोबारी भविष्य के संभावित नुकसान से बचने के लिए तुरंत स्टॉक बढ़ा लेते हैं। इसके विपरीत जब कीमतों में लगातार गिरावट की एक मंदी की लहर चल पड़ती है, तब कारोबारी यह मानकर चलते हैं कि बाजार का अंतिम निचला स्तर यानी बॉटम अभी बनना शेष है। बड़े ज्वैलर्स को अंदेशा है कि अंतरराष्ट्रीय दरों में अभी और गिरावट देखने को मिल सकती है, जिस वजह से वे सबसे निचले भाव का धैर्यपूर्वक इंतजार कर रहे हैं। वर्तमान समय में केवल छोटे और मध्यम स्तर के जौहरी ही अपनी दैनिक और अनिवार्य जरूरतों को पूरा करने के लिए सीमित मात्रा में सोना उठा रहे हैं।\n\nआयात शुल्क का दबाव और सरकारी नीतियां\nसोने के प्रति कारोबारियों के ठंडे रुख के पीछे केवल वैश्विक रुझान ही नहीं, बल्कि देश की व्यापारिक नीतियां भी एक अहम वजह बनी हुई हैं। केंद्र सरकार ने मई के महीने में सोने पर लागू आयात शुल्क को बढ़ाकर 15 फीसदी के स्तर पर पहुंचा दिया था। इस नीतिगत निर्णय के चलते घरेलू सर्राफा बाजार में सोने की वास्तविक लैंडिंग लागत में भारी बढ़ोतरी हो गई। भारत अपनी कुल घरेलू खपत का लगभग पूरा हिस्सा विदेशी बाजारों से खरीदकर पूरा करता है, जिसके कारण देश के व्यापार घाटे पर सीधा नकारात्मक असर पड़ता है। इसी असंतुलन को नियंत्रित करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अलग-अलग अवसरों पर देशवासियों से अनावश्यक सोने के आयात और निजी स्तर पर भारी खरीदारी को सीमित रखने का आह्वान करते रहे हैं। वर्तमान में 15 फीसदी कस्टम ड्यूटी लागू होने की वजह से बड़ी ज्वैलरी कंपनियों के लिए भारी पूंजी लगाकर बड़ा स्टॉक जाम करना काफी जोखिम भरा और महंगा सौदा साबित हो रहा है।\n\nअक्टूबर से दिसंबर तिमाही पर सुस्ती का साया\nभारतीय कैलेंडर में अक्टूबर से दिसंबर की तीन महीने की अवधि को आभूषण उद्योग के लिए सबसे अहम और व्यस्ततम समय माना जाता है। इसी दौरान धनतेरस, दिवाली और उसके तुरंत बाद शुरू होने वाले शादियों के सीजन की खरीदारी एक साथ निकलती है। इसके बावजूद बड़े खिलाड़ियों द्वारा भारी इन्वेंट्री न जोड़ने के कारण इस साल पूरे त्योहारी सीजन की समग्र मांग प्रभावित होने की आशंका खड़ी हो गई है। सिटी रिसर्च के एक प्रक्षेपण के अनुसार, अक्टूबर से दिसंबर के दौरान भारत का कुल सोने का आयात घटकर मात्र 106 टन तक सिमट सकता है।\n\nसमीत गुहा ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि पिछले वर्ष की इसी समान अवधि की तुलना में इस बार एमएमटीसी-पीएएमपी की कुल बिक्री में नरमी दर्ज की गई है, हालांकि अक्टूबर के शुरुआती पखवाड़े में खुदरा उपभोक्ताओं की खरीदारी की गति में कुछ हल्का सुधार जरूर देखा गया है। बाजार के विश्लेषक मानते हैं कि जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार से यह स्पष्ट संकेत मिलेगा कि कीमतें अपने अंतिम निचले स्तर को छू चुकी हैं या वहां से किसी प्रकार की रिकवरी की शुरुआत हो रही है, वैसे ही बड़े ज्वैलर्स फिर से बड़े पैमाने पर आक्रामक लिवाली शुरू कर सकते हैं।\n\nइसका आप पर असर\nसोने की कीमतों में 24 फीसदी की गिरावट और बड़े ज्वैलर्स के सतर्क रुख का सीधा असर आम खरीदारों की जेब और त्योहारी बजट पर पड़ेगा।\n\n• खरीदारी की योजना: खुदरा खरीदारों को तुरंत बड़ी मात्रा में खरीदारी करने के बजाय बाजार के स्थिर होने का इंतजार करने का विकल्प मिल रहा है। बड़े व्यापारियों का मानना है कि दरें और गिर सकती हैं, इसलिए शादियों की खरीदारी थोड़ा रुककर करना फायदेमंद साबित हो सकता है।\n• आभूषणों के प्रीमियम: मई में आयात शुल्क बढ़कर 15 फीसदी होने से घरेलू दुकानों पर मेकिंग चार्ज और अंतिम कीमतें अंतरराष्ट्रीय गिरावट के अनुपात में पूरी तरह कम नहीं हुई हैं। ग्राहकों को खरीदारी करते समय बिल में कस्टम ड्यूटी और अतिरिक्त लागत की जांच करनी चाहिए।\n• त्योहारी डिस्काउंट: मांग कमजोर रहने और बड़े प्लेयर्स द्वारा खरीद टालने के कारण छोटे और मझोले ज्वैलर्स ग्राहकों को खींचने के लिए आकर्षक ऑफर्स दे सकते हैं। खरीदार धनतेरस और दिवाली के दौरान मेकिंग चार्ज पर विशेष छूट का लाभ उठा सकते हैं।\n• निवेश का नजरिया: सोने में एकमुश्त बड़ा निवेश करने वालों को मौजूदा अनिश्चितता के दौरान आक्रामक खरीदारी से बचना चाहिए। बाजार के बॉटम का संकेत मिलने तक किस्तों में छोटी खरीदारी करना ज्यादा सुरक्षित रणनीति होगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nसोने की कीमतों में तेज गिरावट के बावजूद बड़े ज्वैलर्स की अनुपस्थिति वैश्विक तकनीकी मंदी, सरकारी टैरिफ और व्यापार घाटे के नियंत्रण से जुड़ी नीतियों का परिणाम है।\n\n• बॉटम का इंतजार: अंतरराष्ट्रीय बाजार में जनवरी के 5,400 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड से फिसलकर सोना 4,000 डॉलर के नीचे पहुंच गया है। कारोबारी मंदी के दौरान खरीद रोककर रखते हैं ताकि सबसे निचले स्तर पर माल उठाया जा सके।\n• आयात शुल्क में वृद्धि: केंद्र सरकार ने मई में सोने पर आयात शुल्क बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया था। इस उच्च टैक्स के कारण थोक व्यापारियों के लिए भारी स्टॉक जमा करना बेहद महंगा और वित्तीय रूप से जोखिम भरा हो गया है।\n• व्यापार घाटे को सीमित करने की नीति: भारत अपनी खपत का लगभग पूरा सोना आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा बाहर जाती है और व्यापार घाटा बढ़ता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गैर-जरूरी सोने की खरीद घटाने की अपील और टैरिफ नीतियों ने आयात पर दबाव बनाया है।\n• त्योहारी मांग में नरमी: सिटी रिसर्च के अनुसार अक्टूबर से दिसंबर तिमाही में भारत का कुल सोना आयात गिरकर महज 106 टन रहने का अनुमान है। पिछली अवधि के मुकाबले एमएमटीसी-पीएएमपी की बिक्री में आई सुस्ती भी बड़े आर्डर्स रुकने की वजह बनी है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सोने की कीमतों में जनवरी के उच्चतम स्तर से कितनी गिरावट आई है?\nजनवरी में 5,400 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर से सोने की कीमतों में करीब 24 फीसदी की गिरावट आ चुकी है, और यह 4,000 डॉलर के नीचे फिसल गया है।\n\n2. भाव गिरने के बावजूद बड़े ज्वैलर्स भारी मात्रा में सोना क्यों नहीं खरीद रहे हैं?\nबड़े ज्वैलर्स का मानना है कि कीमतें अभी और गिर सकती हैं, इसलिए वे बाजार के निचले स्तर यानी बॉटम बनने और सबसे सस्ते भाव का इंतजार कर रहे हैं।\n\n3. सरकार ने सोने पर आयात शुल्क कब और कितना बढ़ाया था?\nसरकार ने इसी साल मई में सोने पर आयात शुल्क बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया था, जिससे घरेलू बाजार में सोने की लागत बढ़ गई है।\n\n4. अक्टूबर से दिसंबर तिमाही में भारत में सोने के आयात का क्या अनुमान है?\nसिटी रिसर्च के अनुमान के अनुसार, अक्टूबर से दिसंबर की तिमाही के दौरान भारत का कुल सोने का आयात गिरकर सिर्फ 106 टन रह सकता है।\n\n5. एमएमटीसी-पीएएमपी के अनुसार खुदरा बाजार की स्थिति कैसी है?\nएमएमटीसी-पीएएमपी के प्रबंध निदेशक समीत गुहा के अनुसार कुल बिक्री में सुस्ती रही है, हालांकि अक्टूबर के पहले पखवाड़े में खुदरा खरीदारी में मामूली सुधार दिखा है।",
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