रियल एस्टेट में भारी टैक्स और बढ़ती लागत से सस्ते फ्लैटों का निर्माण अटका, क्रेडाई ने की नीतिगत बदलाव की मांग रियल एस्टेट बिल्डरों के शीर्ष निकाय क्रेडाई के अनुसार अत्यधिक करों और निर्माण खर्चों के कारण 45 लाख रुपये तक के बजट घर बनाना अव्यावहारिक हो गया है। संगठन ने केंद्र सरकार से किफायती आवास की परिभाषा से मूल्य सीमा हटाने का आग्रह किया है। देश भर में मकानों की बढ़ती निर्माण लागत और आवासीय बिक्री पर लगने वाले ऊंचे करों ने किफायती आवासीय परियोजनाओं के विकास को बेहद कठिन बना दिया है। रियल एस्टेट कंपनियों के शीर्ष राष्ट्रीय संगठन क्रेडाई ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में डेवलपर्स के लिए 45 लाख रुपये तक की सीमा में सस्ते घर तैयार करना व्यावहारिक नहीं रह गया है। इस गंभीर समस्या को रेखांकित करते हुए संगठन ने सस्ते आवासीय फ्लैटों की मांग और आपूर्ति चक्र को दोबारा गति देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार से विशेष नीतिगत प्रोत्साहन और राहत उपायों की आवश्यकता जताई है। किफायती आवास के तय मानकों में संशोधन की उठी आवाज क्रेडाई के राष्ट्रीय अध्यक्ष शेखर पटेल ने शुक्रवार को आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में बताया कि किफायती आवास की पुरानी परिभाषा अब जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाती। उन्होंने जोर देकर कहा कि केंद्र सरकार को प्रत्येक फ्लैट के लिए निर्धारित 45 लाख रुपये की अधिकतम मूल्य सीमा को पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए। शेखर पटेल ने भरोसा जताया कि शासन उद्योग जगत की इस वाजिब मांग पर सकारात्मक फैसला लेगा। उन्होंने स्वीकार किया कि मौजूदा आर्थिक ढांचे के तहत बिल्डर्स पर्याप्त संख्या में किफायती मकान उपलब्ध कराने में पूरी तरह सक्षम नहीं हो पा रहे हैं। बिक्री मूल्य का 30 से 50 प्रतिशत तक सरकारी खजाने में जाता है टैक्स सस्ते मकानों की किल्लत के प्रमुख कारणों का विश्लेषण करते हुए शेखर पटेल ने जमीन की बेतहाशा बढ़ती कीमतों, महंगे निर्माण सामान और भारी टैक्स ढांचे को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने रेखांकित किया कि मकान की कुल बिक्री कीमत का 30 से 50 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और संबंधित नगर निगमों के पास विभिन्न करों और शुल्कों के रूप में चला जाता है। इतने भारी वित्तीय बोझ के चलते परियोजनाएं आर्थिक रूप से अलाभकारी हो जाती हैं। पटेल ने बताया कि संगठन इन तमाम जटिल अड़चनों और नीतिगत चुनौतियों को दूर करने के लिए लगातार सरकारी अधिकारियों के साथ समन्वय बनाकर काम कर रहा है। मूल्य सीमा समाप्त कर केवल क्षेत्रफल को आधार बनाने का प्रस्ताव किफायती श्रेणी के घरों की मांग और आपूर्ति में संतुलन कायम करने के लिए क्रेडाई ने उम्मीद जताई है कि आगामी 6 महीनों के भीतर सरकार की ओर से कुछ ठोस नीतिगत कदम उठाए जा सकते हैं। परिभाषा में बदलाव के संबंध में शेखर पटेल ने कहा कि संगठन सरकारी स्तर पर निरंतर विमर्श कर रहा है। संगठन का मुख्य प्रस्ताव यह है कि 45 लाख रुपये की अधिकतम वित्तीय सीमा को पूरी तरह हटाया जाए। इसके स्थान पर किसी मकान को किफायती मानने के लिए केवल उसके कारपेट एरिया को पैमाना बनाया जाए, जिसके तहत महानगरों में 60 वर्ग मीटर और गैर महानगरों में 90 वर्ग मीटर तक के क्षेत्रफल वाले मकानों को किफायती आवास का दर्जा मिलना चाहिए। इसका आप पर असर किफायती मकानों की घटती आपूर्ति और प्रस्तावित नीतिगत बदलावों का सीधा असर मध्यमवर्गीय घर खरीदारों की जेब और बजट पर पड़ेगा। • घर खरीदारों के लिए: बिल्डरों द्वारा 45 लाख रुपये तक के मकान बनाना बंद करने से पहली बार घर खरीदने वाले परिवारों के सामने सस्ते फ्लैटों का भारी संकट पैदा हो गया है। यदि सरकार मूल्य सीमा हटाकर केवल क्षेत्रफल का दायरा तय करती है, तो ग्राहकों को ज्यादा शहरों में बेहतर लोकेशन पर किफायती दर्जे के तहत घर मिल सकेंगे। • टैक्स के बोझ पर: फ्लैट की कीमत में 30 से 50 प्रतिशत तक सरकारी कर शामिल होने के कारण सामान्य खरीदार को मकान पर भारी रकम अतिरिक्त चुकानी पड़ रही है। रियल एस्टेट नियमों में बदलाव या टैक्स में रियायत मिलने पर ही नए मकानों की कीमतें आम आदमी की पहुंच में आ सकेंगी। • आगामी 6 महीनों में: क्रेडाई की मांगों पर विचार करते हुए केंद्र सरकार अगले 6 महीनों में नई नीतिगत घोषणाएं कर सकती है। नए फ्लैट या प्लॉट की तलाश कर रहे लोगों को इस दौरान सरकारी नियमों और परिभाषा में संभावित बदलावों पर नजर रखनी चाहिए। • महानगरों और अन्य शहरों में दायरा: नए प्रस्ताव के तहत महानगरों में 60 वर्ग मीटर और गैर-महानगरों में 90 वर्ग मीटर तक के फ्लैट्स को लाभ मिलेगा। इससे दोनों श्रेणियों के शहरों में मध्यम आकार के घरों की खरीद पर खरीदारों और बिल्डरों को नीतिगत इंसेंटिव का फायदा मिल सकता है। ऐसा क्यों हुआ बढ़ती लागत, महंगे जमीन के भाव और भारी टैक्स संरचना के कारण रियल एस्टेट क्षेत्र में किफायती मकानों की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे उद्योग को नीतिगत बदलाव की गुहार लगानी पड़ी है। • अत्यधिक टैक्स भार: डेवलपर्स को केंद्र, राज्यों और नगर निगमों को कुल बिक्री मूल्य का 30 से 50 प्रतिशत तक विभिन्न करों के रूप में देना पड़ता है। इस भारी वित्तीय कटौती के बाद 45 लाख रुपये के सीमित बजट में मकान तैयार करना घाटे का सौदा बन जाता है। • निर्माण और जमीन की ऊंची लागत: जमीन के बढ़ते दाम और निर्माण सामग्री के महंगे होने से प्रति वर्ग फुट लागत काफी बढ़ चुकी है। इस कारण डेवलपर्स के लिए पुराने 45 लाख रुपये के दायरे में परियोजनाएं चलाना आर्थिक रूप से असंभव हो गया है। • अव्यावहारिक पुरानी परिभाषा: वर्तमान में किफायती आवास की परिभाषा में 45 लाख रुपये की सख्त वित्तीय सीमा लगी हुई है। क्रेडाई का कहना है कि यह सीमा महंगाई और मौजूदा बाजार भावों के अनुकूल नहीं है, इसलिए इसे खत्म कर केवल क्षेत्रफल को मानक बनाया जाना चाहिए। सवाल-जवाब 1. क्रेडाई के अनुसार डेवलपर्स किफायती घर बनाने में क्यों असमर्थ हैं? जमीन की बढ़ती कीमतों, निर्माण लागत में वृद्धि और बिक्री मूल्य पर 30 से 50 प्रतिशत तक के सरकारी टैक्स के कारण बिल्डर 45 लाख रुपये में घर नहीं बना पा रहे हैं। 2. क्रेडाई ने किफायती आवास की परिभाषा में क्या बदलाव मांगा है? क्रेडाई ने 45 लाख रुपये की अधिकतम मूल्य सीमा को समाप्त करने और केवल फ्लैट के क्षेत्रफल (कारपेट एरिया) को ही पात्रता मानक बनाने की मांग की है। 3. सस्ते फ्लैट के लिए क्रेडाई ने क्या क्षेत्रफल सीमा सुझाई है? संगठन ने महानगरों के लिए 60 वर्ग मीटर और गैर-महानगरों के लिए 90 वर्ग मीटर तक के क्षेत्रफल की सीमा तय करने का प्रस्ताव दिया है। 4. डेवलपर्स कितना टैक्स सरकारी एजेंसियों को चुकाते हैं? डेवलपर्स बिक्री मूल्य का 30 से 50 प्रतिशत तक केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और नगर निगमों को टैक्स एवं शुल्कों के रूप में चुकाते हैं। 5. सरकार से इस मुद्दे पर कब तक कदम उठाने की उम्मीद की जा रही है? क्रेडाई अध्यक्ष शेखर पटेल के अनुसार अगले 6 महीनों में सस्ते मकानों की डिमांड और सप्लाई बढ़ाने के लिए नीतिगत पहल होने की उम्मीद है। https://trendkia.com/business/riyala-esteta-men-bhari-taiksa-aura-barhati-lagata-se-saste-phlaiton-ka-nirmana-ataka-credai-ne-ki-nitigata-badalava-ki-manga-42258 TrendKia — Har trend, sabse pehle.