रूसी तेल पर अमेरिकी टैरिफ बिल के बीच भारत ने साफ की नीति, ऊर्जा सुरक्षा से नहीं होगा समझौता अमेरिकी संसद में रूसी तेल खरीदारों पर भारी शुल्क लगाने का प्रस्ताव पारित होने के बाद भारत ने दो टूक कहा है कि 1.4 अरब नागरिकों की ऊर्जा जरूरतें सर्वोपरि हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई लंबा असर नहीं पड़ेगा। अमेरिकी संसद ने रूस के खिलाफ आर्थिक शिकंजा कसने के मकसद से एक सख्त विधेयक 262-159 के अंतर से पारित कर दिया है। इस विधायी प्रस्ताव के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ऐसे सभी मुल्कों पर कड़े आयात शुल्क लगाने की शक्ति मिल जाएगी जो रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस की खरीद जारी रखे हुए हैं। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होते ही यह कानून अमल में आ जाएगा। इस फैसले के बाद भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर भी अतिरिक्त शुल्क का जोखिम देखा जा रहा है। हालांकि आर्थिक और व्यापार जगत का विश्लेषण करने वालों का मानना है कि इस कदम से भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी सेहत या लंबी अवधि के विकास पर कोई गंभीर झटका नहीं लगेगा। घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए घबराने जैसी स्थिति नहीं मुंबई में कार्यरत व्यापार और बाजार विशेषज्ञ ए. पी. शुक्ला का कहना है कि नए अमेरिकी नियमों से भारत के लिए कोई बड़ा संकट पैदा नहीं होने वाला। उनके मुताबिक ब्रिक्स के हालिया घटनाक्रमों के बाद अमेरिका की ओर से इस तरह के कदम की संभावना पहले से जताई जा रही थी। बाजार ने इस दबाव को काफी हद तक पहले ही अपने अनुमानों में शामिल कर लिया था, जिससे हाल के दिनों में दर्ज हुई गिरावट के बाद अब किसी बहुत बड़े नकारात्मक झटके की गुंजाइश कम है। शुक्ला ने उल्लेख किया कि बाब-अल-मंदेब और होर्मुज के अहम समुद्री व्यापार मार्गों में आई रुकावटों और ताजा प्रतिबंधों की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें अस्थायी तौर पर चढ़ सकती हैं। कच्चे तेल की कीमतों का रुख और व्यापारिक विकल्प बाजार के मौजूदा हालात पर बात करते हुए ए. पी. शुक्ला ने रेखांकित किया कि वैश्विक बाजार में क्रूड ऑयल का भाव 108 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच चुका है। भारत अपनी तेल जरूरतों के लिए केवल एक स्रोत पर निर्भर नहीं है, बल्कि रूस के अलावा दुनिया भर के लगभग 25 देशों से पेट्रोलियम आयात करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बाहरी दबाव के चलते भारत अपनी स्वतंत्र आर्थिक और व्यापारिक नीतियों से पीछे हटने वाला नहीं है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अमेरिकी प्रतिबंधों के जवाब में चीन अधिक तीखा और आक्रामक रुख अपना सकता है, जबकि भारत टकराव के बजाय व्यावहारिक विकल्पों और नए अवसरों के जरिए संतुलित रास्ते निकालने की नीति पर चलता है। यह व्यवधान कुछ समय के लिए लागत जरूर बढ़ा सकता है, किंतु दीर्घकालिक दृष्टि से भारत की तुलना में इसका उल्टा प्रभाव स्वयं अमेरिकी अर्थव्यवस्था को अधिक भुगतना पड़ सकता है। नागरिकों की ऊर्जा आपूर्ति पर सरकार का स्पष्ट संदेश अमेरिकी संसद में मतदान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक रुख सामने रखते हुए अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट कर दी हैं। विदेश मंत्रालय ने साफ कहा कि देश अपने 1.4 अरब नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा की निर्बाध पूर्ति के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। सरकार ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार की बदलती परिस्थितियों और उपलब्ध विकल्पों को देखते हुए अलग-अलग आपूर्तिकर्ता देशों से ऊर्जा संसाधनों की खरीद जारी रखी जाएगी। इसके साथ ही भारत ने सचेत किया कि अमेरिका के इस एकतरफा फैसले का प्रतिकूल असर दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों और दुनिया भर के ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। सरकार ने दोहराया कि देश के वाणिज्यिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए हर जरूरी और व्यावहारिक कदम उठाया जाएगा। इसका आप पर असर अमेरिकी कानून और कच्चे तेल में उछाल से आम नागरिकों और घरेलू उद्योगों पर तात्कालिक लागत का दबाव बढ़ सकता है। • भारत में: अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड 108 डॉलर प्रति बैरल पहुंचने से तेल कंपनियों की इनपुट लागत बढ़ सकती है। यदि यह स्तर बना रहा तो आने वाले हफ्तों में घरेलू स्तर पर पेट्रोल, डीजल और लॉजिस्टिक्स के दामों पर असर दिख सकता है। • ऊर्जा उपलब्धता पर: भारत 25 अलग-अलग देशों से तेल आयात करता है, जिससे देश में ईंधन की किल्लत नहीं होगी। सरकार ने साफ किया है कि आपूर्ति निरंतर बनी रहेगी ताकि घरेलू उपभोक्ताओं को परेशानी न हो। • आर्थिक वृद्धि पर: विशेषज्ञों के अनुसार यह दबाव केवल अल्पकालिक रहेगा और लंबी अवधि में भारत के आर्थिक विकास की गति प्रभावित नहीं होगी। निवेशकों और व्यवसायों को नीतिगत स्थिरता के कारण बड़े नुकसान की आशंका नहीं है। • मुद्रास्फीति और घरेलू बजट पर: परिवहन लागत में किसी भी वृद्धि से रोजमर्रा के सामानों के दाम थोड़े बढ़ सकते हैं। हालांकि बहुपक्षीय आयात व्यवस्था से भारत आयातित मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के विकल्प तलाशता रहेगा। ऐसा क्यों हुआ अमेरिकी संसद द्वारा यह कदम रूसी अर्थव्यवस्था के मुख्य राजस्व स्रोत पर चोट करने के लिए उठाया गया है, जबकि वैश्विक आपूर्ति मार्गों में आई बाधाओं ने ऊर्जा संकट को और बढ़ा दिया है। • सीधा कारण: अमेरिकी कांग्रेस ने 262-159 के मत से एक कड़ा विधेयक पारित किया, जो राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर भारी आयात शुल्क लगाने की शक्ति देता है। इसका उद्देश्य रूस के ऊर्जा राजस्व प्रवाह को बाधित करना है। • भौगोलिक और कूटनीतिक पृष्ठभूमि: ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद बदले समीकरणों और रणनीतिक गतिरोधों के चलते वाशिंगटन ने यह कड़ा रुख अपनाया है। साथ ही बाब-अल-मंदेब और होर्मुज जैसे अहम समुद्री जलमार्गों में आई रुकावटों ने आपूर्ति श्रृंखला को पहले ही संवेदनशील बना रखा है। • भारत की विविधीकरण नीति: भारत रूस के अतिरिक्त लगभग 25 देशों से कच्चा तेल खरीदता है ताकि किसी एक स्रोत पर निर्भरता न रहे। अपनी 1.4 अरब आबादी की बुनियादी जरूरतों को सुरक्षित रखना भारत की विदेश और आर्थिक नीति का मुख्य आधार है। सवाल-जवाब 1. अमेरिकी कांग्रेस में पारित नए बिल में क्या प्रावधान हैं? यह विधेयक अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि वह रूस से कच्चा तेल या गैस आयात करने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगा सकें। 2. अमेरिकी संसद में यह बिल कितने मतों से पास हुआ? यह विधेयक अमेरिकी कांग्रेस में 262-159 के बहुमत से पारित हुआ है। 3. इस कानून पर भारत सरकार का क्या रुख है? विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत अपने 1.4 अरब नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न स्रोतों से तेल खरीदना जारी रखेगा। 4. कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत किस स्तर तक पहुंच गई है? बाजार के घटनाक्रमों और समुद्री मार्गों में व्यवधान के बीच कच्चा तेल करीब 108 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। 5. भारत कुल कितने देशों से तेल का आयात करता है? भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए रूस के अलावा दुनिया के लगभग 25 देशों से तेल का आयात करता है। https://trendkia.com/business/russian-tela-para-us-tariff-bill-ke-bicha-india-ne-sapha-ki-niti-urja-suraksha-se-nahin-hoga-samajhauta-36341 TrendKia — Har trend, sabse pehle.