मत्स्य पालकों का मुनाफा बढ़ाने को समस्तीपुर कृषि विश्वविद्यालय ने तैयार की खास वैल्यू एडिशन योजना डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय में मत्स्य पालकों को वैल्यू एडिशन का निशुल्क प्रशिक्षण देकर 150 रुपये की मछली से 300 रुपये तक कमाई कराने की पहल शुरू की गई है. मत्स्य पालन के व्यवसाय में लगे किसानों को जब मंडियों में अपनी उपज का वाजिब दाम नहीं मिल पाता, तो उनकी पूरी लागत और मेहनत पर पानी फिर जाता है. इसी आर्थिक संकट को दूर करने और किसानों की जेब में ज्यादा पैसा पहुंचाने के मकसद से समस्तीपुर में स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने एक ठोस पहल की है. संस्थान के विशेषज्ञ अब किसानों को साधारण कच्ची मछली को प्रसंस्कृत कर विभिन्न प्रकार के खाद्य उत्पाद बनाने की तकनीक सिखा रहे हैं, जिससे बाजार में उत्पाद की मांग के साथ-साथ उसका मूल्य भी कई गुना बढ़ सके. कच्ची मछली से खाद्य उत्पाद बनाने की विशेष तकनीक बाजार में सामान्य तौर पर जो मछली करीब 150 रुपये में बिकती है, किसान उसी मछली के अलग-अलग खाद्य उत्पाद तैयार करके 300 रुपये तक की कमाई आसानी से हासिल कर सकते हैं. विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक किसानों को इस बदलाव का व्यावहारिक प्रशिक्षण दे रहे हैं. जब किसी कृषि या मत्स्य उत्पाद में वैल्यू एडिशन किया जाता है, तो न केवल उसकी शेल्फ लाइफ बढ़ जाती है, बल्कि शहरी और कस्बाई बाजारों में उसकी कीमत भी काफी बढ़ जाती है. इसी फॉर्मूले को जमीन पर उतारने के लिए संस्थान ने कमर कसी है. सरकारी प्रोजेक्ट के तहत किसानों को निशुल्क प्रशिक्षण डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले कृषि से जुड़े महाविद्यालय के मत्स्य विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. पी.पी. श्रीवास्तव ने इस संबंध में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि विभाग में एक नया प्रोजेक्ट विधिवत शुरू किया गया है, जिसका मुख्य लक्ष्य मत्स्य पालकों को वैल्यू एडिशन के हर पहलू से रूबरू कराना और उन्हें प्रशिक्षित करना है ताकि उनकी कुल आय में ठोस बढ़ोतरी दर्ज की जा सके. डॉ. पी.पी. श्रीवास्तव के मुताबिक, मत्स्य उत्पादों से जुड़े नए खाद्य उत्पाद विकसित करने के लिए सरकार की तरफ से यह अहम प्रोजेक्ट विश्वविद्यालय को सौंपा गया है. इस दिशा में विशेषज्ञ लगातार अनुसंधान और व्यावहारिक मॉड्यूल पर काम कर रहे हैं. वैज्ञानिकों का साफ मानना है कि किसानों को केवल तालाब से मछली निकालकर सीधे बाजार में बेचने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. अगर वे उससे तरह-तरह के खाद्य पदार्थ बनाना सीख लें, तो उन्हें अपनी उपज का बेहतरीन अतिरिक्त मुनाफा मिलेगा. राहत की बात यह है कि विश्वविद्यालय की ओर से यह संपूर्ण प्रशिक्षण सेवा किसानों को पूरी तरह निशुल्क उपलब्ध कराई जा रही है, और कोई भी इच्छुक किसान विभाग से संपर्क कर इसका लाभ ले सकता है. रोगों की पहचान, उपचार और बेहतर प्रबंधन के गुर इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का दायरा केवल मछली से नए उत्पाद तैयार करने तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि इसमें मत्स्य पालन की बुनियादी वैज्ञानिक बारीकियों को भी शामिल किया गया है. डॉ. पी.पी. श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि कार्यशाला के दौरान किसानों को मछलियों में फैलने वाले तरह-तरह के संक्रामक रोगों के लक्षण पहचानने का तरीका सिखाया जाएगा. समय पर बीमारी के लक्षणों की पहचान होने से किसान सही वक्त पर उचित उपचार कर सकेंगे, जिससे तालाबों में मछलियों की अकाल मौत और किसानों को होने वाले भारी वित्तीय नुकसान से पूरी तरह बचा जा सके. विशेषज्ञों का कहना है कि जब किसान मछली की वैज्ञानिक देखभाल, बीमारियों से बचाव, नए उत्पादों के निर्माण, गुणवत्ता नियंत्रण और पैकेजिंग की तकनीक समझ जाएंगे, तो उनकी आजीविका पूरी तरह से आत्मनिर्भर बन जाएगी. जो किसान पहले से इस पेशे में हैं या जो नए सिरे से मछली पालन के क्षेत्र में कदम रखने का मन बना रहे हैं, वे सभी विश्वविद्यालय के मत्स्य विभाग में जाकर सीधे मार्गदर्शन और ट्रेनिंग हासिल कर सकते हैं. इसका आप पर असर यह पहल मछली पालकों को अपनी उपज सीधे औने-पौने दामों में बेचने के बजाय प्रसंस्कृत उत्पाद बनाकर बाजार में दोगुना मुनाफा कमाने का व्यावहारिक मौका देती है. • भारत में: देशभर के जलीय कृषि से जुड़े किसान वैल्यू एडिशन की तकनीक अपनाकर अपनी मौसमी कमाई को स्थायी और संगठित व्यवसाय में बदल सकते हैं. प्रसंस्कृत उत्पादों की मांग शहरी बाजारों में बढ़ने से ग्रामीण उत्पादकों को बिचौलियों से मुक्ति पाने में भी बड़ी मदद मिलेगी. • समस्तीपुर में: स्थानीय और आसपास के जिलों के मछली पालक बिना किसी शुल्क के विश्वविद्यालय के मत्स्य विभाग में जाकर सीधे प्रशिक्षण ले सकते हैं. किसान अपनी 150 रुपये की मछली से 300 रुपये तक की कमाई का कौशल सीखने के साथ-साथ तालाब की बीमारियों से होने वाले नुकसान को भी रोक सकेंगे. ऐसा क्यों हुआ बाजार में कच्ची मछली की अनिश्चित कीमतों और उचित मूल्य न मिल पाने के कारण किसानों की होने वाली आर्थिक हानि को रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है. • मंडी में कम दाम की समस्या: स्थानीय बाजारों में कच्ची मछली की अधिक आवक होने पर किसानों को 150 रुपये जैसी कम दरों पर अपनी उपज बेचनी पड़ती है, जिससे उनकी लागत तक नहीं निकल पाती. सरकार और वैज्ञानिकों ने इस समस्या का स्थायी समाधान निकालने के लिए प्रसंस्करण आधारित मॉडल तैयार किया. • सरकारी परियोजना की स्वीकृति: मछली से जुड़े नए खाद्य उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से कृषि विश्वविद्यालय को एक विशेष अनुसंधान और प्रशिक्षण परियोजना सौंपी गई है. इस प्रोजेक्ट का प्राथमिक उद्देश्य किसानों को वैल्यू एडिशन और आधुनिक तकनीकी ज्ञान से सशक्त बनाना है. • रोगों से होने वाला नुकसान: तालाबों में संक्रमण और बीमारियों की पहचान देर से होने के कारण किसानों को भारी क्षति उठानी पड़ती थी. इसलिए विश्वविद्यालय ने मूल्य संवर्धन के साथ-साथ मत्स्य रोगों की पहचान और उपचार को भी इस प्रशिक्षण मॉड्यूल का अनिवार्य हिस्सा बनाया. सवाल-जवाब 1. डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय में कौन सा नया प्रोजेक्ट शुरू हुआ है? विश्वविद्यालय के मत्स्य विभाग में सरकार की ओर से मछली के वैल्यू एडिशन और नए खाद्य उत्पाद तैयार करने का प्रोजेक्ट शुरू किया गया है. 2. वैल्यू एडिशन से मछली पालकों की कमाई में कितना फर्क आ सकता है? तकनीकी प्रशिक्षण के जरिए जिस मछली का बाजार भाव 150 रुपये है, उससे खाद्य उत्पाद बनाकर किसान 300 रुपये तक की आमदनी कमा सकते हैं. 3. क्या किसानों को इस प्रशिक्षण के लिए कोई फीस देनी होगी? नहीं, विश्वविद्यालय द्वारा यह प्रशिक्षण सेवा मछली पालकों को पूरी तरह निशुल्क दी जा रही है. 4. मछली से नए उत्पाद बनाने के अलावा इस कोर्स में और क्या सिखाया जाएगा? किसानों को मछलियों में होने वाली बीमारियों के लक्षण पहचानने, सही समय पर उनका निदान करने और उचित उपचार करने की जानकारी दी जाएगी. https://trendkia.com/business/samastipur-agriculture-university-ne-shuru-ki-machhali-ke-vailyu-edishana-ki-khasa-taiyari-41378 TrendKia — Har trend, sabse pehle.