सार्वजनिक बैंकों की सेहत पर विपक्ष के हमलों के बीच वित्त मंत्रालय का बड़ा दावा, सालभर में हुआ ₹2 लाख करोड़ का मुनाफा वित्त मंत्रालय ने बैंकिंग सिस्टम पर उठे सवालों का आंकड़ों के साथ खंडन किया है। सरकार का कहना है कि सुधारों के दम पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने रिकॉर्ड मुनाफा कमाया है और एनपीए में भी भारी कमी आई है। देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की वित्तीय स्थिति को लेकर हाल ही में राजनीतिक गलियारों में गरमागरम बहस देखने को मिली है। एक तरफ जहां विपक्ष ने बैंकिंग व्यवस्था की कार्यप्रणाली और नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए, वहीं दूसरी ओर सरकार ने पुख्ता आंकड़ों के जरिए इन सभी आलोचनाओं का कड़ा जवाब दिया है। वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान लागू किए गए ढांचागत सुधारों और नीतिगत बदलावों का ही नतीजा है कि आज देश के सरकारी बैंक पहले से कहीं अधिक मजबूत स्थिति में खड़े हैं। मंत्रालय की ओर से जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, इन तमाम सुधारों के चलते बीते साल देश के सभी सार्वजनिक बैंकों ने मिलकर करीब दो लाख करोड़ रुपये का शानदार शुद्ध लाभ कमाया है। सरकार का यह भी कहना है कि बैंकों के बही-खातों को साफ-सुथरा बनाने की दिशा में काम चल रहा है, जिसके कारण लंबे समय से बैंकों के गले की फांस बना फंसा हुआ कर्ज अब काफी हद तक कम हो चुका है और इसी की बदौलत बैंकों के मुनाफे में लगातार इजाफा हो रहा है। अखिलेश यादव के तीखे हमलों पर वित्त मंत्रालय का पलटवार यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने देश की मौजूदा बैंकिंग व्यवस्था को लेकर सरकार पर तीखे हमले बोले। उन्होंने सोशल मीडिया और अन्य मंचों से सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए यह तक कह दिया कि मौजूदा सरकार ने देश के बैंकिंग सिस्टम को सूदखोरी से भी बदतर स्थिति में ला दिया है। उन्होंने साल 2014 के बाद से देश में हुए बैंकिंग सुधारों के क्रियान्वयन के तौर-तरीकों पर भी कई तरह की उंगलियां उठाईं। उनके इस हमले में मुख्य रूप से बचत खातों में मिनिमम बैलेंस न रखने पर लगने वाले भारी-भरकम जुर्माने, नोटबंदी के फैसले, विभिन्न प्रकार के सेवा शुल्कों, बड़े उद्योगपतियों के कर्ज माफ किए जाने, आम आदमी की ऋण तक पहुंच और बैंक कर्मचारियों के साथ होने वाले कथित दुर्व्यवहार जैसे कई संवेदनशील मुद्दे शामिल थे। इन तमाम आरोपों का सिलसिलेवार जवाब देते हुए वित्त मंत्रालय ने आंकड़े सामने रखे और बताया कि सरकारी बैंकों ने वित्तवर्ष 2025-26 के दौरान अब तक का सबसे अधिक 1.98 लाख करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया है। मंत्रालय ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर जानकारी दी कि इन सुधारों के कारण सरकारी बैंकों का कुल एनपीए यानी गैर-निष्पादित संपत्तियां घटकर कई दशकों के सबसे निचले स्तर यानी महज 1.93 फीसदी पर आ गया है। मिनिमम बैलेंस और वसूली एजेंटों की मनमानी पर सफाई मिनिमम बैलेंस के मुद्दे पर सरकार की ओर से सफाई दी गई कि देश के अधिकांश प्रमुख सरकारी बैंकों ने अपने सामान्य बचत खातों के मामले में नियमों को काफी सरल कर दिया है। अब ऐसे खातों में न्यूनतम शेष राशि न रखे जाने की स्थिति में लगाए जाने वाले दंड शुल्क या तो पूरी तरह से माफ कर दिए गए हैं या फिर उन्हें काफी हद तक कम कर दिया गया है ताकि आम खाताधारकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े। इसके अलावा, कर्ज वसूली के दौरान एजेंटों द्वारा अपनाए जाने वाले तौर-तरीकों पर भी सरकार और नियामक संस्थाओं ने सख्त रुख अपनाया है। मंत्रालय ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि बैंकों के ऋण वसूली एजेंटों पर अब पूरी तरह से कड़ा नियंत्रण रखा जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी इस संबंध में बेहद स्पष्ट और कड़े निर्देश जारी किए हैं जिनके तहत किसी भी सूरत में वसूली एजेंट ग्राहकों को डरा-धमका नहीं सकते और न ही उन्हें किसी प्रकार की मानसिक या शारीरिक परेशानी में डाल सकते हैं। इसके साथ ही देश के दूरदराज के इलाकों में बैठे हर एक नागरिक तक बैंकिंग सेवाओं की आसान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए महज पांच किलोमीटर के दायरे में नए बैंकिंग सेवा केंद्र खोले गए हैं, जिससे देश का लगभग हर गांव औपचारिक बैंकिंग तंत्र से सीधे जुड़ चुका है। नोटबंदी के दूरगामी प्रभाव और लॉकर सुरक्षा के कड़े नियम देश में लागू की गई नोटबंदी के कदम को लेकर विपक्ष की आलोचनाओं का जवाब देते हुए मंत्रालय ने इसे एक बेहद दूरदर्शी और साहसिक आर्थिक निर्णय करार दिया। सरकार का मानना था कि इस कदम का मुख्य उद्देश्य देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना, काले धन के प्रवाह पर लगाम लगाना, जाली नोटों के कारोबार को नेस्तनाबूद करना और अवैध सीमा पार वित्तपोषण के रास्तों को पूरी तरह से बंद करना था। इस प्रक्रिया के चलते देश में होने वाले वित्तीय लेनदेन का एक बहुत बड़ा हिस्सा औपचारिक वित्तीय व्यवस्था के दायरे में आ गया, जिससे देश में यूपीआई जैसी आधुनिक डिजिटल भुगतान प्रणालियों को अपनाने की संस्कृति को अभूतपूर्व बढ़ावा मिला। आर्थिक गतिविधियों के औपचारिक होने और देश में मजबूत डिजिटल बुनियादी ढांचे के तेजी से विस्तार होने से भारत की विशाल असंगठित अर्थव्यवस्था को मुख्यधारा की बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने में बहुत बड़ी मदद मिली है, जिससे आने वाले लंबे समय तक देश की अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता और शुचिता बनी रहेगी। वहीं दूसरी तरफ, बैंकों के लॉकरों में रखी बहुमूल्य धातुओं, निवेश प्रमाणपत्रों या अन्य विरासत से जुड़ी कीमती वस्तुओं के गायब होने या चोरी होने के आरोपों पर मंत्रालय ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि लॉकर की सुरक्षित कस्टडी से इस तरह की वस्तुओं का खो जाना एक बहुत ही असाधारण घटना है। यदि किसी मामले में यह साबित होता है कि बैंक की सेवा में किसी भी प्रकार की कोई कमी रही है, तो ऐसी स्थिति में बैंक सीधे तौर पर ग्राहक को उचित मुआवजा देने के लिए कानूनी रूप से उत्तरदायी और जवाबदेह होगा। इसका आप पर असर वित्त मंत्रालय की ओर से जारी इन आंकड़ों और स्पष्टीकरणों का सीधा असर देश के आम बैंक ग्राहकों और निवेशकों पर पड़ता है। • भारत में: देश भर के आम बचत खाताधारकों को अब अधिकांश सरकारी बैंकों में मिनिमम बैलेंस न रखने पर भारी जुर्माने से बड़ी राहत मिली है, क्योंकि बैंकों ने इन शुल्कों को या तो हटा दिया है या कम कर दिया है। • भारत में: ऋण वसूली के नियमों के सख्त होने से अब बैंक ग्राहकों को रिकवरी एजेंटों की तरफ से दी जाने वाली धमकियों या अनावश्यक मानसिक प्रताड़ना से कानूनी सुरक्षा मिल गई है। • भारत में: ग्रामीण इलाकों में पांच किलोमीटर के दायरे में बैंकिंग सेवा केंद्र खुलने से गांवों के लोगों को बैंकिंग और वित्तीय कामकाज के लिए दूर नहीं जाना पड़ता है। • भारत में: बैंक लॉकर में रखी कीमती वस्तुओं के नुकसान के मामलों में बैंकों की जवाबदेही तय होने से ग्राहकों के कानूनी अधिकारों को मजबूत सुरक्षा कवच मिला है। ऐसा क्यों हुआ सार्वजनिक बैंकों के मुनाफे में वृद्धि और एनपीए में आई गिरावट के पीछे सरकार द्वारा पिछले कुछ वर्षों में उठाए गए नीतिगत कदम और संस्थागत सुधार हैं। • बैंकिंग सुधार: सरकार द्वारा लगातार किए गए हस्तक्षेप और एनपीए रिकवरी पर फोकस करने से बैंकों के बही-खाते साफ हुए हैं, जिससे उनकी वित्तीय सेहत सुधरी है। • डिजिटल बुनियादी ढांचा: नोटबंदी और यूपीआई जैसी डिजिटल भुगतान प्रणालियों को बढ़ावा मिलने से अर्थव्यवस्था औपचारिक दायरे में आई, जिससे बैंकिंग तंत्र का दायरा बढ़ा। • नियामक नियंत्रण: भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ऋण वसूली और ग्राहक सेवाओं को लेकर तय किए गए कड़े नियमों ने व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाई है। सवाल-जवाब 1. वित्त वर्ष 2025-26 में सरकारी बैंकों ने कितना शुद्ध लाभ दर्ज किया है? सरकारी बैंकों ने इस अवधि में अब तक का सबसे अधिक 1.98 लाख करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया है। 2. सरकारी बैंकों का एनपीए घटकर कितना रह गया है? सरकारी बैंकों का कुल एनपीए घटकर कई दशकों के निचले स्तर पर यानी 1.93 फीसदी पर पहुंच गया है। 3. अखिलेश यादव ने सरकार पर क्या मुख्य आरोप लगाए थे? उन्होंने बैंकिंग व्यवस्था को सूदखोरी से बदतर बनाने, मिनिमम बैलेंस जुर्माना, नोटबंदी और सेवा शुल्कों को लेकर आलोचना की थी। 4. मिनिमम बैलेंस न रखने पर लगने वाले शुल्क को लेकर क्या स्थिति है? अधिकांश सरकारी बैंकों ने सामान्य बचत खातों में मिनिमम बैलेंस न रखने पर लगने वाले शुल्क को या तो पूरी तरह माफ कर दिया है या कम कर दिया है। 5. बैंक वसूली एजेंटों के संबंध में आरबीआई के क्या निर्देश हैं? आरबीआई ने साफ किया है कि एजेंट ग्राहकों को डरा-धमका या परेशान नहीं कर सकते हैं। 6. बैंक लॉकर से कीमती वस्तुएं गायब होने पर किसकी जिम्मेदारी होती है? यदि बैंक की सेवा में कमी के कारण लॉकर से सामान गायब होता है, तो बैंक ग्राहक को मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी है। https://trendkia.com/business/sarvajanika-bainko-ki-sehata-para-vipaksha-ke-hamalo-ke-bicha-vitta-mntralaya-ka-bara-dava-salabhara-men-hua-2-lakha-karora-ka-mun-48681 TrendKia — Har trend, sabse pehle.