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  "type": "article",
  "title": "सिलिकॉन वैली के अरबपतियों का रुख ट्रंप की तरफ कैसे मुड़ा, टेक मंदी और कर्मचारी टकराव की पूरी कहानी",
  "summary": "सस्ते कर्ज के दौर में अंधाधुंध नियुक्तियां करने वाली दिग्गज टेक कंपनियों ने ब्याज दरें बढ़ते ही छंटनी का दौर शुरू किया और कर्मचारियों की मुखरता व कड़े नियमों के बीच ट्रंप के पाले में चली गईं।",
  "content": "वैश्विक महामारी के दौरान जब डिजिटल सेवाओं का उपयोग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा, तब बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों के बीच नए कर्मियों को जोड़ने की जबरदस्त होड़ शुरू हो गई थी। बीते दशक में सॉफ्टवेयर डेवलपर्स और इंजीनियरों का श्रम बाजार में पहले से खासा प्रभाव था, लेकिन महामारी के बाद की तेज मांग ने संतुलन को पूरी तरह कर्मचारियों के हक में झुका दिया। तकनीकी ज्ञान और कोडिंग कौशल की भारी मांग को देखते हुए प्रौद्योगिकी दिग्गजों ने प्रोग्रामरों, डिजाइनरों और डेटा वैज्ञानिकों की ताबड़तोड़ भर्तियां शुरू कर दीं, हालांकि उस वक्त कई कंपनियों के पास इस बात की स्पष्ट रूपरेखा भी नहीं थी कि इन कर्मचारियों से तुरंत क्या काम कराया जाएगा।\n\nवर्ष 2019 से 2022 के बीच अमेज़न और फेसबुक ने अपने कर्मचारियों की संख्या लगभग दोगुनी कर ली, जिसमें अमेज़न में 92 प्रतिशत और फेसबुक में 93 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इसी समयावधि के दौरान माइक्रोसॉफ्ट ने अपने पेरोल पर लगभग 80,000 नए कर्मचारी जोड़े, जबकि गूगल ने 60,000 से अधिक लोगों की भर्ती की। कार्यबल में इतनी तेजी से हुए इजाफे के कारण बड़ी संख्या में लोगों को ऐसी टीमों में शामिल कर लिया गया जिनके पास कोई तात्कालिक प्रोजेक्ट नहीं था। उन्हें केवल भविष्य की संभावित योजनाओं के लिए रिजर्व में रखा गया था, यानी व्यावहारिक रूप से कई नियुक्तियां बिना किसी तय कार्यभार के की गई थीं।\n\nसस्ते कर्ज का दौर और दफ्तरों में कर्मचारियों की ताकत\nमहामारी के वर्षों में हुआ यह व्यापक विस्तार वास्तव में एक दशक से अधिक समय तक चली बेहद आसान मौद्रिक नीति की बुनियाद पर टिका था। वर्ष 2008 के वित्तीय संकट के बाद अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने आर्थिक गतिविधियों को गति देने के लिए ब्याज दरों को लगभग शून्य के स्तर पर ला दिया था। इसके बाद 2010 के पूरे दशक में उधारी की दरें शून्य के आसपास ही बनी रहीं, जिसे अर्थशास्त्री ज़ीरो इंटरेस्ट रेट पॉलिसी यानी ZIRP का युग कहते हैं।\n\nबैंकों से बेहद सस्ती दरों पर कर्ज मिलने और वेंचर कैपिटल फंड्स के पास प्रचुर मात्रा में पूंजी उपलब्ध होने के कारण प्रौद्योगिकी कंपनियों ने आक्रामक रूप से अपने कारोबार का विस्तार किया। इस दौर का सीधा फायदा कॉरपोरेट दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों को मिला, जहां वेतन में अप्रत्याशित उछाल आया, नौकरी बदलने के असीम अवसर बने और नियोक्ताओं के सामने अपनी शर्तें रखने की शक्ति मिली। यह टेक जगत के कर्मचारियों के लिए एक स्वर्णिम काल था, जिसमें कई प्रोफेशनल्स अपनी पसंद के प्रोजेक्ट्स चुन सकते थे, काम के घंटों के दौरान नई स्किल सीख सकते थे और हमेशा के लिए रिमोट वर्क यानी घर से काम करने की व्यवस्था तय कर सकते थे।\n\nमहंगाई का झटका, ब्याज दरों में उछाल और टेक बाजार में मंदी\nयह माहौल तब बदला जब महामारी के दौरान उपभोक्ताओं के हाथों में पहुंचे भारी राहत पैकेज के कारण मुद्रास्फीति बेकाबू होने लगी। बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए फेडरल रिजर्व ने दशकों का सबसे आक्रामक मौद्रिक शिकंजा कसा। केंद्रीय बैंक ने केवल 15 महीनों के भीतर लगातार 10 बार बढ़ोतरी करते हुए ब्याज दरों को शून्य से सीधे लगभग 5.5 प्रतिशत तक पहुंचा दिया। सख्त मौद्रिक कदमों का असर दिखा और समूची अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ गई। एसएंडपी 500 सूचकांक 19.4 प्रतिशत गिर गया, जो 2008 के बाद की सबसे बड़ी सालाना गिरावट थी। महंगे होम लोन के चलते रियल एस्टेट कारोबार ठप होने लगा, जबकि उपभोक्ता खर्च घटने से वॉल्ट डिज्नी, नाइकी और होम डिपो जैसी दिग्गज रिटेल और एंटरटेनमेंट कंपनियां भी दबाव में आ गईं।\n\nलेकिन अर्थव्यवस्था के किसी भी अन्य क्षेत्र की तुलना में सबसे करारी चोट उसी टेक उद्योग पर पड़ी, जिसने महामारी के दौरान असाधारण उड़ान भरी थी। आसान पैसों के दौर में भारी मूल्यांकन हासिल करने वाली कंपनियों की किस्मत ब्याज दरें बढ़ते ही तेजी से पलट गई।\n\nचार ट्रिलियन डॉलर का नुकसान और खर्चों में कटौती का नया दौर\nप्रमुख कंपनियों के तिमाही नतीजे वॉल स्ट्रीट के अनुमानों से पीछे रहने लगे। अमेज़न का मुनाफा बेहद कम हो गया और विकास दर सुस्त पड़ गई। डिजिटल विज्ञापनों में कमी आने से गूगल को लगातार चार तिमाहियों तक मुनाफे में गिरावट झेलनी पड़ी। इसी तरह माइक्रोसॉफ्ट के प्रमुख ग्रोथ इंजन माने जाने वाले क्लाउड कारोबार की रफ्तार भी धीमी पड़ गई। इसके चलते अमेज़न, फेसबुक, एप्पल, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट के संयुक्त बाजार मूल्यांकन से करीब 4 ट्रिलियन डॉलर स्वाहा हो गए। फेसबुक का बाजार मूल्य दो-तिहाई घट गया, अमेज़न आधा रह गया और माइक्रोसॉफ्ट के मूल्यांकन में करीब 1 ट्रिलियन डॉलर की कमी आई। साल 2022 के अंत तक टेक सेक्टर 30 प्रतिशत गिर चुका था, जिससे यह 2000 के डॉट-कॉम बबल और 2008 के वित्तीय संकट के बाद उद्योग के इतिहास का तीसरा सबसे खराब साल साबित हुआ।\n\nकेंद्रीय बैंक की दरों में वृद्धि के साथ ही टेक कंपनियों ने अनवरत विकास के अपने पुराने वादों को छोड़कर खर्चों में भारी कटौती और बड़े पैमाने पर छंटनी का सिलसिला शुरू किया। जो उद्योग कभी भव्य परिसरों, मुफ्त सुविधाओं और भारी भरकम पैकेज के लिए जाना जाता था, उसने अचानक वित्तीय अनुशासन और बचत की वकालत शुरू कर दी।\n\nजब कर्मचारियों के काम पर उठाए गए सवाल\nअचानक बदले वित्तीय माहौल में कंपनियों के शीर्ष अधिकारी विकास के नाम पर नकदी फूंकने के अपने पुराने फैसलों का बचाव करने में असमर्थ हो गए। आलीशान दफ्तरों और भारी पैकेजों पर होने वाले भारी खर्च को अब दूरदर्शिता के बजाय वित्तीय लापरवाही माना जाने लगा। लेकिन अपने अनियंत्रित विस्तार की जिम्मेदारी लेने के बजाय कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों और वेंचर कैपिटलिस्टों ने इसका दोष कर्मचारियों पर मढ़ना शुरू कर दिया।\n\nसिलिकॉन वैली के प्रमुख निवेशक कीथ रबोइस ने सार्वजनिक रूप से कहा कि फेसबुक और गूगल जैसी कंपनियों में हजारों कर्मचारी फर्जी काम कर रहे थे। उनका आरोप था कि महामारी के दौरान रखे गए नए कर्मचारियों को दफ्तर में बैठकर केवल समय काटने के अलावा कोई वास्तविक काम नहीं था। इसी तरह प्रतिष्ठित वेंचर कैपिटल फर्म आंद्रेसेन होरोविट्ज़ के जनरल पार्टनर डेविड उलेविच ने दावा किया कि गूगल के लगभग आधे व्हाइट-कॉलर कर्मचारी कोई सार्थक योगदान नहीं दे रहे थे और वे केवल हेडकाउंट बढ़ाने के लिए रखी गई गैर-जरूरी नौकरियों का हिस्सा थे।\n\nकंपनियों के शीर्ष प्रबंधकों ने भी इस रुख को आगे बढ़ाया। गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने 2022 की एक आंतरिक बैठक में स्पष्ट कहा कि उत्पादकता को लेकर वास्तविक चिंताएं हैं और कर्मचारियों को अपना ध्यान भटकाए बिना प्रदर्शन का स्तर ऊंचा उठाना होगा। वेफेयर के सीईओ नीरज शाह ने कर्मचारियों को भेजे एक कड़े ईमेल में चेतावनी दी कि आलस को कभी सफलता से नहीं नवाजा जाता। वहीं फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग ने इस बहस के बीच 2023 को अपनी कंपनी के लिए दक्षता का वर्ष घोषित कर दिया। भारी वित्तीय नुकसान के बाद कॉरपोरेट नेतृत्व को जवाबदेही से बचने के लिए एक निशाने की जरूरत थी।\n\nसॉफ्टवेयर कोड की बनावट और व्यापक छंटनी का गणित\nप्रौद्योगिकी उद्योग की प्रकृति पारंपरिक विनिर्माण उद्योग से अलग होती है। पारंपरिक कंपनियों में यदि कर्मचारियों को निकाला जाए तो तुरंत उत्पादन और राजस्व पर असर पड़ता है। लेकिन डिजिटल कंपनियों में पूर्व कर्मचारियों द्वारा किया गया काम पहले ही कोड के रूप में उत्पादों में शामिल हो चुका होता है। इसलिए इंजीनियरों और प्रोडक्ट टीमों को तुरंत हटाने पर कंपनी की तात्कालिक आय पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता, बल्कि उनका वेतन बचने से कंपनी का मुनाफा तुरंत सुधर जाता है।\n\nनिवेशकों का भरोसा दोबारा जीतने के लिए टेक दिग्गजों ने इसी फार्मूले का सहारा लिया। साल 2022 के आखिर में फेसबुक ने 11,000 कर्मचारियों यानी अपने कुल कार्यबल के 10 प्रतिशत से अधिक की छंटनी कर दी। इसके बाद अमेज़न ने 10,000 कॉरपोरेट पदों को खत्म किया। सबसे बड़ा बदलाव ट्विटर में देखने को मिला, जहां एलन मस्क द्वारा अधिग्रहण किए जाने के बाद करीब 80 प्रतिशत स्टाफ को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। साल 2022 के अंत तक अमेरिका में करीब 93,000 टेक कर्मी नौकरी गंवा चुके थे। यह सिलसिला 2023 में और तेज हुआ, जब कुल छंटनी का आंकड़ा 191,000 के पार निकल गया। गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी बेहद स्थिर मानी जाने वाली कंपनियों ने भी 10,000 से अधिक कर्मियों को निकाला। हर छंटनी के बाद वॉल स्ट्रीट ने कंपनियों के शेयर भाव बढ़ा दिए, जहां फेसबुक की पहली बड़ी छंटनी के अगले दिन उसके शेयर 5 प्रतिशत चढ़ गए थे।\n\nइसके साथ ही नौकरी बाजार में कर्मचारियों की मोलभाव की क्षमता पूरी तरह खत्म हो गई। सैकड़ों जगह बायोडाटा भेजने के बावजूद अनुभवी पेशेवरों को इंटरव्यू तक के बुलावे नहीं मिल रहे थे और कंप्यूटर साइंस के नए स्नातकों के लिए 2023 डॉट-कॉम संकट के बाद का सबसे कठिन दौर बन गया।\n\nमुनाफे की वापसी के बावजूद अनुशासन का स्थायी मॉडल\nसाल 2023 के दौरान अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने कई मायनों में मंदी की आशंकाओं को खारिज किया। उपभोक्ता मांग स्थिर रही, रोजगार के आंकड़े बेहतर आए और महंगाई 9 प्रतिशत से घटकर 3 प्रतिशत के करीब आ गई। फेसबुक, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेज़न ने 2023 की पहली तिमाही में अनुमान से बेहतर मुनाफा दर्ज किया। इसी बीच ओपनएआई द्वारा चैटजीपीटी पेश किए जाने के बाद पूरे सेक्टर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर नई पूंजी का प्रवाह शुरू हो गया।\n\nहालांकि मुनाफा लौटने और मंदी का खतरा टलने के बाद भी कंपनियों ने छंटनी और कड़े नियंत्रण की नीति को वापस नहीं लिया। शेयर बाजार में छंटनी को शेयरधारकों द्वारा लगातार सराहा गया, जिसके चलते प्रबंधन ने कार्यबल पर दोबारा हासिल किए गए कड़े नियंत्रण को बनाए रखने का फैसला किया।\n\nराजनीतिक तनाव, बाइडन प्रशासन का रुख और अविश्वास\nइस बीच अमेरिकी राजनीति में कॉर्पोरेट एकाधिकार के खिलाफ प्रगतिशील नेताओं की आवाजें बुलंद होने लगी थीं। बर्नी सैंडर्स, एलिजाबेथ वॉरेन और एलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज जैसे नेताओं ने बिग टेक के एकाधिकार, श्रमिकों की स्थिति और एल्गोरिदम के प्रभाव को लेकर कड़े सवाल खड़े किए।\n\nजब 2020 में जो बाइडन राष्ट्रपति बने, तो इस प्रगतिशील धड़े के विचार प्रशासन की नीतियों का मुख्य हिस्सा बन गए। इसके बाद बाइडन प्रशासन दशकों में सिलिकॉन वैली के प्रति सबसे अधिक संशयवादी सरकार बनकर उभरा। फेडरल ट्रेड कमीशन की प्रमुख लीना खान के नेतृत्व में अमेज़न और फेसबुक के खिलाफ बड़े एंटीट्रस्ट मुकदमे दायर किए गए। प्रतिभूति और विनिमय आयोग तथा ट्रेजरी विभाग ने क्रिप्टोकरेंसी बाजार पर कड़े वित्तीय नियम लागू किए जिससे डिजिटल संपत्तियों के मूल्यांकन में भारी गिरावट आई। इसके साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता को भी नियामकीय दायरे में लाने की कवायद शुरू कर दी गई, जिसे टेक जगत के कई दिग्गजों ने अपने पुराने राजनीतिक रिश्तों पर प्रहार के रूप में देखा।\n\nसिलिकॉन वैली के कई प्रमुख चेहरे व्यक्तिगत स्तर पर भी उपेक्षित महसूस करने लगे। वर्ष 2021 में व्हाइट हाउस द्वारा आयोजित इलेक्ट्रिक वाहन शिखर सम्मेलन में जनरल मोटर्स, फोर्ड और क्रिसलर को तो आमंत्रित किया गया, लेकिन टेस्ला के एलन मस्क को छोड़ दिया गया। इसी तरह मार्क आंद्रेसेन और बेन होरोविट्ज़ जैसे प्रमुख निवेशकों ने वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों से मुलाकात का समय न मिलने की शिकायत की। पूर्ववर्ती क्लिंटन और ओबामा प्रशासनों के दौरान जिस तरह टेक उद्योग को प्रोत्साहन और नियामकीय ढील मिलती थी, वह दौर अब खत्म हो चुका था।\n\nदफ्तरों के भीतर असंतोष और कर्मचारियों का संगठित होना\nबाहरी नियामकीय दबाव के साथ-साथ टेक कंपनियों के भीतर भी कर्मचारियों का विरोध बढ़ रहा था। कई कंपनियों में कर्मचारियों ने सैन्य अनुबंधों, तेल कंपनियों के साथ साझेदारी और कार्यस्थल पर उत्पीड़न के मुद्दों को लेकर शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठाई। कर्मचारियों ने खुद को संगठित करना शुरू किया, जिसमें किकस्टार्टर में पूर्ण यूनियन का गठन और अल्फाबेट वर्कर्स यूनियन की स्थापना शामिल थी। इन प्रयासों को कम्युनिकेशन वर्कर्स ऑफ अमेरिका और ऑफिस एंड प्रोफेशनल एम्प्लॉइज इंटरनेशनल यूनियन जैसे बड़े संगठनों का समर्थन भी मिला। जिन विरोध प्रदर्शनों को अधिकारी कभी सामान्य असहमति मानते थे, वे अब उनके पूर्ण नियंत्रण के लिए एक बड़ी चुनौती बनने लगे थे।\n\nनिवेशक मार्क आंद्रेसेन ने इस बदलाव को लेकर अपनी सोच साझा करते हुए कहा था कि टेक कंपनियों को सामाजिक बदलाव के इंजन में बदला जा रहा था और कार्यबल अनियंत्रित हो रहा था। उन्होंने यहां तक कहा कि ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान कई कंपनियों को ऐसा लगा था कि उनके अपने ही परिसरों में कर्मचारी हिंसक विरोध प्रदर्शन के कगार पर पहुंच चुके थे।\n\nपारंपरिक रूप से सिलिकॉन वैली का नेतृत्व खुद को प्रगतिशील और पूंजीवादी दोनों मानता था, जहां यह धारणा थी कि भारी संपत्ति कमाना उद्यमशीलता और नैतिक सफलता का प्रमाण है। लेकिन कर्मचारियों के बढ़ते विरोध और नियामकीय जांच ने इस सोच को पूरी तरह तोड़ दिया। आंद्रेसेन जैसे दिग्गजों ने इन कर्मचारियों को लैपटॉप क्लास का नाम दिया, जो स्क्रीन के जरिए काम करते हुए वास्तविक जमीनी परिस्थितियों और अपने विचारों के परिणामों से पूरी तरह कटे हुए थे।\n\nरूढ़िवादी राजनीति से गठबंधन और टेक ओलिगार्की का उदय\nप्रौद्योगिकी जगत में दक्षिणपंथी विचारों की मौजूदगी पूरी तरह नई नहीं थी। पीटर थिएल ने वर्ष 2016 में ही ट्रंप के राष्ट्रपति चुनाव अभियान का खुलकर समर्थन किया था और स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र को परस्पर विरोधी बताया था। कर्टिस यारविन जैसे विचारकों ने टेक्नो-मोनार्किज्म की वकालत करते हुए जेडी वेंस जैसे नेताओं के साथ संपर्क साधे थे।\n\nनियामकीय सख्ती, व्यक्तिगत उपेक्षा और कर्मचारियों के साथ तीखे टकराव ने सिलिकॉन वैली के अरबपतियों को एक नए राजनीतिक मंच की तलाश करने पर मजबूर किया। कड़े नियमों से बचने और अपने कार्यबल पर पूर्ण नियंत्रण दोबारा स्थापित करने के लिए कई बड़े उद्योगपतियों ने ट्रंप के नेतृत्व वाले रूढ़िवादी गठबंधन का समर्थन करने का फैसला किया। इस तरह पूंजी और राजनीति का एक ऐसा गठजोड़ तैयार हुआ, जिसने प्रौद्योगिकी क्षेत्र के भीतर एक नए ओलिगार्की वर्ग की नींव रख दी।\n\nइसका आप पर असर\nवैश्विक टेक कंपनियों में आसान पैसों के दौर का खत्म होना और छंटनी के नए मॉडल का अपनाया जाना भारतीय आईटी पेशेवरों और वैश्विक नौकरी बाजार पर गहरा असर डालता है।\n\n• भारत में असर: भारतीय टेक प्रोफेशनल्स और आउटसोर्सिंग कंपनियों के लिए नए प्रोजेक्ट्स और ऑनसाइट मौकों में कमी आई है। कंपनियों के खर्च घटाने के सख्त रुख के कारण अब कर्मचारियों के पास वेतन वृद्धि को लेकर पहले जैसी मोलभाव की शक्ति नहीं बची है।\n• इंजीनियरिंग छात्रों पर: कंप्यूटर साइंस और आईटी से जुड़े नए स्नातकों के लिए कैंपस प्लेसमेंट में कंपनियों की ओर से की जाने वाली बंपर भर्तियां घट गई हैं। छात्रों को अब केवल बुनियादी कोडिंग के भरोसे रहने के बजाय विशिष्ट प्रोजेक्ट्स और व्यावहारिक कौशल साबित करने होंगे।\n• रिमोट वर्क और वर्क कल्चर: महामारी के समय मिलने वाली स्थायी वर्क फ्रॉम होम की सुविधाएं अब अनिवार्य दफ्तर वापसी में बदल रही हैं। कर्मचारियों को कंपनियों के कड़े अनुशासन और प्रदर्शन मानकों का पालन करना होगा।\n• वैश्विक निवेश और स्टार्टअप्स: वेंचर कैपिटल फंडिंग की कमी के चलते नए स्टार्टअप्स को लाभप्रदता साबित किए बिना निवेश जुटाने में भारी कठिनाई हो रही है। संस्थापकों को असीमित विकास की जगह वित्तीय अनुशासन और सीमित खर्च पर ध्यान देना पड़ रहा है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह घटनाक्रम महामारी के दौरान लिए गए अनियंत्रित फैसलों, केंद्रीय बैंक की सख्त नीतियों और कंपनियों के भीतर बढ़ते कर्मचारी विरोध के मिले-जुले असर से पैदा हुआ।\n\n• मौद्रिक नीतियों में तीव्र बदलाव: महामारी के बाद मुद्रास्फीति को काबू करने के लिए अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने 15 महीनों में 10 बार ब्याज दरें बढ़ाकर शून्य से 5.5 प्रतिशत कर दीं। इस अप्रत्याशित बढ़ोतरी ने आसान कर्ज के युग को समाप्त कर दिया और टेक कंपनियों के बाजार मूल्यांकन में करीब 4 ट्रिलियन डॉलर की गिरावट ला दी।\n• अति-नियुक्तियों का आर्थिक बोझ: वर्ष 2019 से 2022 के बीच अमेजन और फेसबुक जैसे दिग्गजों ने अपने कर्मचारियों की संख्या में 90 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि की थी। आर्थिक मंदी आते ही कंपनियों के पास इन कर्मचारियों के लिए पर्याप्त प्रोजेक्ट्स नहीं बचे, जिसे अधिकारियों ने उत्पादकता संकट करार दिया।\n• सख्त सरकारी नियम और अविश्वास: बाइडन प्रशासन के तहत एंटीट्रस्ट मुकदमों, क्रिप्टो पर पाबंदियों और उद्योग के प्रति संशयवादी रुख ने टेक दिग्गजों को किनारे कर दिया। राजनीतिक उपेक्षा और नियामकीय हस्तक्षेप से बचने के लिए कई अरबपतियों ने दक्षिणपंथी मंच का समर्थन करने का रुख अपनाया।\n• कर्मचारियों का बढ़ता संगठित विरोध: दफ्तरों के भीतर यूनियनों के गठन और सैन्य व तेल अनुबंधों के खिलाफ कर्मचारियों के मुखर विरोध ने प्रबंधन को असहज कर दिया। कंपनियों के शीर्ष नेतृत्व ने इस आंतरिक असंतोष को दबाने और नियंत्रण बहाल करने के लिए रूढ़िवादी राजनीति का रुख किया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. महामारी के दौरान टेक कंपनियों में कर्मचारियों की संख्या में कितनी वृद्धि हुई थी?\nवर्ष 2019 से 2022 के बीच अमेज़न में 92 प्रतिशत और फेसबुक में 93 प्रतिशत कर्मचारी बढ़े, जबकि माइक्रोसॉफ्ट ने लगभग 80,000 और गूगल ने 60,000 से अधिक कर्मियों को जोड़ा।\n\n2. फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में क्या बदलाव किए थे?\nफेडरल रिजर्व ने महंगाई रोकने के लिए 15 महीनों में लगातार 10 बार दरें बढ़ाकर ब्याज दरों को शून्य के करीब से लगभग 5.5 प्रतिशत पर पहुंचा दिया।\n\n3. साल 2022 में बड़ी टेक कंपनियों को कितना वित्तीय नुकसान हुआ?\nअमेज़न, फेसबुक, एप्पल, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट का संयुक्त बाजार मूल्यांकन लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर घट गया और उद्योग वर्ष के अंत तक 30 प्रतिशत नीचे आ गया।\n\n4. साल 2022 और 2023 में कितने टेक कर्मचारियों की छंटनी हुई?\nअमेरिका में साल 2022 के अंत तक करीब 93,000 टेक कर्मचारियों को निकाला गया, जबकि 2023 में यह आंकड़ा बढ़कर 191,000 से अधिक हो गया।\n\n5. बाइडन प्रशासन ने बिग टेक कंपनियों के खिलाफ क्या कानूनी कदम उठाए?\nप्रशासन ने फेडरल ट्रेड कमीशन के जरिए अमेज़न और फेसबुक के खिलाफ बड़े एंटीट्रस्ट मुकदमे दर्ज किए और क्रिप्टो तथा एआई पर नियामकीय निगरानी बढ़ाई।\n\n6. सिलिकॉन वैली के अरबपतियों का झुकाव ट्रंप की तरफ क्यों बढ़ा?\nसख्त सरकारी नियमों, टैक्स जांच, दफ्तरों में कर्मचारियों के मुखर विरोध और अपनी पूर्व राजनीतिक उपेक्षा से निपटने के लिए उन्होंने ट्रंप के रूढ़िवादी गठबंधन का साथ चुना।",
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  "publishedAt": "2026-09-20",
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