होर्मुज जलडमरूमध्य की निर्भरता होगी समाप्त, पांच साल में खुलेंगे तेल और गैस के नए विकल्प खाड़ी देशों द्वारा नए लॉजिस्टिक्स मार्ग तैयार किए जाने से अगले पांच वर्षों में होर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व समाप्त होने की संभावना है। ईरान युद्ध के प्रभाव को कम करने के लिए इस क्षेत्र में 1.4 ट्रिलियन डॉलर तक का भारी निवेश किए जाने की योजना है। वर्ष 2026 में एक ऐसा शब्द सामने आया जिसने वैश्विक स्तर पर गहरी चिंता पैदा की, और वह है होर्मुज जलडमरूमध्य। इस अवधि से पहले शायद ही आम लोगों को इस भौगोलिक मार्ग की सुभेद्यता का अंदाज़ा था, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों ने हर किसी को इसकी सामरिक और आर्थिक महत्ता से परिचित करा दिया है। भारत के लिए इस मार्ग की निर्भरता अन्य राष्ट्रों की तुलना में अत्यधिक संवेदनशील रही है। हालांकि, अब जो संकेत मिल रहे हैं उनके अनुसार आगामी पांच वर्षों में होर्मुज जलडमरूमध्य की प्रासंगिकता लगभग समाप्त हो जाएगी क्योंकि खाड़ी देश अपने लिए व्यापक वैकल्पिक मार्गों का निर्माण कर रहे हैं ताकि इस संकीर्ण जलमार्ग पर उनकी निर्भरता पूरी तरह समाप्त की जा सके। भारी निवेश और वैकल्पिक लॉजिस्टिक्स मार्ग एचएसबीसी समूह के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जॉर्ज एलहेडेरी ने स्पष्ट किया है कि ईरान युद्ध के दुष्परिणामों को कम करने की दिशा में खाड़ी क्षेत्र के भीतर भारी पैमाने पर पूंजी निवेश किया जाएगा। इस वृहद निवेश के फलस्वरूप अगले पांच वर्षों के अंतराल में लॉजिस्टिक्स के कई नवीन वैकल्पिक मार्ग अस्तित्व में आएंगे, जिससे होर्मुज का वर्चस्व समाप्त हो जाएगा। उन्होंने रेखांकित किया कि ईरान और अमेरिका के बीच हुए संघर्ष ने इस बात को उजागर कर दिया है कि संपूर्ण विश्व अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए किस प्रकार होर्मुज पर अत्यधिक निर्भर है। उल्लेखनीय है कि इस जलमार्ग से वैश्विक स्तर पर 20 प्रतिशत तेल और प्राकृतिक गैस का परिवहन होता है। इस संघर्ष ने खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था को भी गहरी क्षति पहुंचाई है, जिसके परिणामस्वरूप अब ये देश वैकल्पिक बंदरगाहों तक सीधी पाइपलाइनें बिछाने की पुख्ता तैयारी कर रहे हैं। मिडिल ईस्ट में 1.4 ट्रिलियन डॉलर का संभावित निवेश एचएसबीसी के शीर्ष अधिकारी ने बताया कि संघर्ष से आहत यह भू-राजनीतिक क्षेत्र शीघ्र ही अपनी स्थिति को सुदृढ़ कर लेगा, जिसके लिए विशाल वित्तीय निवेश अनिवार्य होगा। एचएसबीसी द्वारा जारी एक नवीन रिपोर्ट में आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं कि मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और तुर्की के विभिन्न विकास प्रोजेक्ट्स में वर्तमान में 872 अरब डॉलर का निवेश किया जा रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस संपूर्ण क्षेत्र में कुल मिलाकर लगभग 1.4 ट्रिलियन डॉलर का भारी-भरकम निवेश प्रवाहित होगा। इस रिपोर्ट के अनुसार 1,600 से अधिक प्रमुख बिजनेस लीडर्स और लगभग 820 वैश्विक संस्थागत निवेशकों ने इस क्षेत्र में पूंजी लगाने के प्रति गहरी रुचि प्रदर्शित की है। इसके अतिरिक्त विश्व बैंक ने भी अपनी रिपोर्ट में यह आकलन प्रस्तुत किया है कि वर्ष 2027 के दौरान इस क्षेत्र में रिकॉर्ड निवेश आकर्षित हो सकता है। खाड़ी देशों की वैकल्पिक बंदरगाह योजनाएं क्षेत्रीय स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से प्रमुख खाड़ी देशों ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। सऊदी अरब, जो इस क्षेत्र में सबसे अधिक तेल की आपूर्ति करता है, ने अपनी पूरब-पश्चिम पाइपलाइन के माध्यम से लाल सागर और यानबू बंदरगाह तक पेट्रोलियम भेजने की ठोस योजना तैयार की है। इस व्यवस्था के लागू होने से होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह बाईपास करना संभव हो सकेगा। दूसरी ओर, संयुक्त अरब अमीरात अपने कच्चे तेल का निर्यात बिना होर्मुज मार्ग के करने के लिए अबु धाबी क्रूड पाइपलाइन का उपयोग करते हुए इसे फुजैरा बंदरगाह तक पहुंचाने का खाका तैयार कर रहा है। यह विशिष्ट बंदरगाह ओमान की खाड़ी में स्थित है जो होर्मुज की भौगोलिक सीमा से पूरी तरह बाहर पड़ता है। इसके साथ ही, ओमान ने भी अरब सागर के तट पर स्थित अपने ओमानी बंदरगाह को क्षेत्रीय निर्यात के लिए एक सुरक्षित और सुलभ विकल्प के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। भारत की ऊर्जा आपूर्ति और विविधीकरण भारत अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा पारंपरिक रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से ही आयात करता रहा है। संघर्ष की शुरुआत होने से पहले भारतीय रिफाइनरियों द्वारा अपनी कुल जरूरत का लगभग 45 प्रतिशत कच्चा तेल यानी करीब 25 लाख बैरल तेल इसी मार्ग से खरीदा जाता था। लेकिन भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने के बाद भारत ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति में तेजी से विविधीकरण किया है और अब लगभग 70 प्रतिशत कच्चा तेल होर्मुज के भौगोलिक दायरे से बाहर के स्रोतों से आयात किया जा रहा है। भारत अपनी जरूरत का 60 प्रतिशत एलपीजी आयात करता है, जिसका लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज क्षेत्र से ही आता था। इसके अलावा देश अपनी कुल एलएनजी जरूरत का 50 प्रतिशत बाहर से मंगाता है, जिसकी आपूर्ति कतर, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान जैसे देश करते हैं। चूँकि ये सभी राष्ट्र पारंपरिक रूप से होर्मुज के रास्ते ही अपने उत्पादों का परिवहन करते थे, इसलिए भारत ने इन ऊर्जा आयातों में भी उल्लेखनीय विविधीकरण कर अपनी निर्भरता को काफी हद तक कम कर लिया है। इसका आप पर असर होर्मुज जलडमरूमध्य के विकल्प तैयार होने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति अधिक सुरक्षित होगी और भविष्य में युद्ध जैसे संकटों के दौरान ईंधन की कीमतों में होने वाली अत्यधिक अस्थिरता पर लगाम लगेगी। • भारत में: भारत द्वारा अपनी ऊर्जा आपूर्ति का विविधीकरण किए जाने से घरेलू बाजार में पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और एलएनजी की कीमतों पर वैश्विक तनाव का असर कम पड़ेगा। वैकल्पिक मार्गों के विकसित होने से देश की ऊर्जा सुरक्षा और अधिक मजबूत होगी। • खाड़ी क्षेत्र में: खाड़ी देशों द्वारा बंदरगाहों तक पाइपलाइन बिछाने और नए लॉजिस्टिक्स मार्ग तैयार करने से उनका निर्यात बाधित नहीं होगा। इस क्षेत्र में आने वाले 1.4 ट्रिलियन डॉलर के भारी निवेश से स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को नई गति और स्थिरता मिलेगी। ऐसा क्यों हुआ होर्मुज जलडमरूमध्य पर वैश्विक निर्भरता को कम करने का मुख्य कारण ईरान और अमेरिका के बीच उत्पन्न सैन्य संघर्ष और भू-राजनीतिक तनाव रहा है, जिसने वैश्विक ऊर्जा व्यापार को भारी जोखिम में डाल दिया था। • सैन्य संघर्ष का प्रभाव: ईरान युद्ध के कारण दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्ग से होने वाले 20 प्रतिशत तेल और गैस के परिवहन पर सीधा संकट खड़ा हो गया था। • आर्थिक क्षति: इस भू-राजनीतिक अस्थिरता ने खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था और उनके पारंपरिक निर्यात मार्गों को भारी नुकसान पहुंचाया, जिससे उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था करने के लिए मजबूर होना पड़ा। • भारी वित्तीय निवेश: एचएसबीसी और विश्व बैंक के अनुमानों के अनुसार मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका क्षेत्र में 1.4 ट्रिलियन डॉलर तक के निवेश की प्रतिबद्धता ने नए बुनियादी ढांचे के निर्माण को गति दी है। • ऊर्जा सुरक्षा की अनिवार्यता: भारत सहित प्रमुख आयातक देशों द्वारा अपनी निर्भरता को 45 प्रतिशत से घटाकर अन्य स्रोतों की ओर मोड़ने की रणनीति ने खाड़ी देशों को वैकल्पिक रास्ते तलाशने के लिए प्रेरित किया। सवाल-जवाब 1. होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का कितना प्रतिशत तेल और गैस गुजरता है? दुनिया का कुल 20 प्रतिशत तेल और गैस होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते से गुजरता है। 2. आने वाले कितने वर्षों में होर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व समाप्त होने की बात कही गई है? आगामी 5 वर्षों में खाड़ी देशों द्वारा वैकल्पिक रास्ते तैयार किए जाने से इस जलमार्ग का महत्व समाप्त हो जाएगा। 3. मध्य क्षेत्र में कुल कितने निवेश की संभावना जताई गई है? इस क्षेत्र में लगभग 1.4 ट्रिलियन डॉलर तक का भारी निवेश आने का अनुमान लगाया गया है। 4. सऊदी अरब ने होर्मुज को बाईपास करने के लिए कौन सी योजना बनाई है? सऊदी अरब ने पूरब-पश्चिम पाइपलाइन के माध्यम से लाल सागर और यानबू बंदरगाह तक तेल पहुंचाने की योजना बनाई है। 5. युद्ध से पहले भारत अपनी कुल जरूरत का कितना कच्चा तेल होर्मुज के जरिये खरीदता था? युद्ध शुरू होने से पहले भारत अपनी जरूरत का लगभग 45 प्रतिशत कच्चा तेल यानी 25 लाख बैरल तेल इस मार्ग से खरीदता था। 6. वर्तमान में भारत होर्मुज के बाहर से कितना कच्चा तेल खरीद रहा है? भारत ने अपने स्रोतों में विविधता लाते हुए अब लगभग 70 प्रतिशत कच्चा तेल होर्मुज के बाहर से खरीदना शुरू कर दिया है। https://trendkia.com/business/strait-of-hormuz-to-lose-relevance-as-middle-east-invests-in-alternative-routes-50594 TrendKia — Har trend, sabse pehle.