सूखे बोरवेल में पानी लाने का कमाल का तरीका: सिर्फ 2000 रुपये में किसान ने बदला जल स्तर छत्तीसगढ़ के एक किसान ने बहुत कम खर्च में पुराने कुओं और बोरवेल को रिचार्ज करके जल संकट का समाधान निकाला है। उनकी यह सरल तकनीक भूजल स्तर सुधारने में बेहद कारगर साबित हुई है। रायपुर में लगातार कम होते भूजल स्तर और गर्मी के मौसम में बोरवेल के सूख जाने जैसी समस्याएं किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गई हैं। इस गंभीर स्थिति के बीच, छत्तीसगढ़ के मिलाराबाद गांव के निवासी युवा किसान लक्ष्मीकांत प्रधान ने जल संरक्षण के लिए एक बहुत ही किफायती और प्रभावी देसी तरीका खोज निकाला है। उनकी यह विधि उन सभी किसानों के लिए एक बड़ा उदाहरण है, जो पानी की कमी से जूझ रहे हैं। लक्ष्मीकांत ने बरसों से उपेक्षित और बंद पड़े पुराने कुओं को न केवल साफ किया, बल्कि उन्हें वर्षा जल संचयन का एक शक्तिशाली माध्यम बना दिया। इसके अलावा, उन्होंने अपने खेतों में स्थित बोरवेल को रिचार्ज करने की तकनीक का उपयोग करके भूमिगत जल के स्तर को ऊपर उठाने में सफलता प्राप्त की है। पुराने कुओं का नया जीवन लक्ष्मीकांत प्रधान का कहना है कि पहले गांवों में घरों के भीतर कुएं होते थे, जो जल आपूर्ति का मुख्य स्रोत थे। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, लोगों ने इनका उपयोग बंद कर दिया और ये कुएं बेकार हो गए। उनका मानना है कि यदि इन पुराने कुओं को साफ कर दिया जाए और इनमें छत के वर्षा जल व आसपास के बारिश के पानी को चैनलाइज करके डाला जाए, तो यह भूजल को रिचार्ज करने का एक बहुत ही शानदार साधन बन सकते हैं। इस साधारण से सुधार को लागू करने में उन्हें मात्र 2000 रुपये की लागत आई, जिसने उनके घर के सूखे कुएं को फिर से उपयोगी बना दिया। बोरवेल रिचार्जिंग से बड़ा बदलाव अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि वर्ष 2011-12 के दौरान उन्होंने डेयरी फार्मिंग शुरू करने के उद्देश्य से दो बोरवेल करवाए थे। दुर्भाग्यवश, उनमें से एक पूरी तरह से सूख गया था, जबकि दूसरा बोरवेल भी केवल बारिश के दौरान ही कुछ पानी दे पाता था। गर्मियों का सीजन आते ही स्थिति और भी खराब हो जाती थी और बोरवेल मुश्किल से 5 से 10 मिनट ही चल पाता था। इस कठिन समस्या से निपटने के लिए उन्होंने बोरवेल के नजदीक एक गहरा सोखता गड्ढा बनवाया। इस गड्ढे का फायदा यह हुआ कि बारिश का पानी सीधे जमीन में रिसकर जाने लगा। यह प्रयोग इतना सफल रहा कि उसी वर्ष गर्मियों में उनका वह बोरवेल जो पहले 10 मिनट चलता था, अब 45 मिनट से एक घंटे तक बिना रुके पानी देने लगा। प्रभावी तकनीक का विस्तार अपनी पहली सफलता के बाद लक्ष्मीकांत ने अन्य बोरवेल में भी यही तकनीक अपनाई। वर्तमान में, वे अपने खेतों के प्रत्येक बोरवेल के चारों तरफ लगभग 12 फीट गहरा और 6 फीट चौड़ा गड्ढा बनवाते हैं। इस व्यवस्था के माध्यम से वे वर्षा के पूरे पानी को जमीन के भीतर पहुंचा रहे हैं। हालांकि इस विधि में प्रति बोरवेल लगभग 8 से 10 हजार रुपये का खर्च आता है, लेकिन यह भविष्य की सिंचाई जरूरतों को देखते हुए एक बहुत ही लाभदायक निवेश साबित हुआ है। किसान का संदेश युवा किसान लक्ष्मीकांत का दृढ़ मानना है कि यदि राज्य के हर किसान अपने घर और खेत में इस प्रकार की जल संचयन व्यवस्था को अपनाएं और पुराने कुओं को पुनः जीवित करने का कार्य करें, तो आने वाले समय में जल संकट को बड़ी सीमा तक काबू किया जा सकता है। उनके अनुसार बारिश के पानी को नालियों में बहकर बर्बाद करने की जगह उसे जमीन के भीतर उतारना ही जल संरक्षण का सबसे प्रभावी तरीका है। आज उनकी यह पहल न केवल उनके लिए फायदेमंद है, बल्कि आसपास के कई किसानों को भी जल संचय की दिशा में प्रेरित कर रही है। इसका आप पर असर भारत में: किसान वर्षा जल संचयन और बोरवेल रिचार्जिंग को अपनाकर सिंचाई के पानी की कमी को दूर कर सकते हैं। छत्तीसगढ़ में: मिलाराबाद और आसपास के इलाकों में किसान अपने पुराने कुओं को साफ करके भूजल स्तर बढ़ाने के लिए इस कम लागत वाले देसी तरीके का उपयोग कर सकते हैं। सवाल-जवाब 1. बोरवेल रिचार्ज करने के लिए लक्ष्मीकांत प्रधान ने कौन सी तकनीक अपनाई? उन्होंने बोरवेल के चारों ओर लगभग 12 फीट गहरा और 6 फीट चौड़ा गड्ढा बनाकर वर्षा जल को सीधे जमीन में सोखने की व्यवस्था की है। 2. पुराने कुओं को रिचार्ज करने में कितना खर्च आया? लक्ष्मीकांत प्रधान ने अपने घर के पुराने कुएं की सफाई और उसमें वर्षा जल संचयन की व्यवस्था करने में करीब 2000 रुपये खर्च किए। 3. बोरवेल रिचार्ज तकनीक का क्या प्रभाव पड़ा? बोरवेल जो पहले गर्मी में केवल 5 से 10 मिनट ही पानी देता था, वह तकनीक अपनाने के बाद 45 मिनट से एक घंटे तक लगातार पानी देने लगा। 4. प्रति बोरवेल रिचार्ज तकनीक में कितना खर्च आता है? खेतों में बोरवेल के चारों ओर गड्ढा बनाकर रिचार्ज करने की इस तकनीक में प्रति बोरवेल लगभग 8 से 10 हजार रुपये का खर्च आता है। प्रेरणा और सबक • स्थानीय संसाधनों का उपयोग: बंद पड़े कुओं जैसे मौजूदा संसाधनों को फिर से जीवित करना नए निर्माण से बेहतर और किफायती होता है। • वर्षा जल का महत्व: बारिश के पानी को नालियों में बहने देने के बजाय उसे सोखता गड्ढे के जरिए जमीन में उतारना जल संरक्षण का सबसे प्रभावी तरीका है। • किफायती नवाचार: बहुत कम बजट (2000 रुपये) में भी सही तकनीक और सूझबूझ से बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। • दीर्घकालिक सोच: खेती की भविष्य की जरूरतों को देखते हुए आज किए गए छोटे सुधार सिंचाई में बड़ी सुरक्षा प्रदान करते हैं। https://trendkia.com/business/sukhe-boravela-men-pani-lane-ka-kamala-ka-tarika-sirpha-2000-rupaye-men-kisana-ne-badala-jala-stara-6010 TrendKia — Har trend, sabse pehle.