स्वर्णगिरी में निजी खनन का नया सवेरा: क्या आंध्र प्रदेश की इस खदान से बदलेगा भारत में सोने का गणित? आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले में देश की पहली बड़ी निजी सोने की खदान का परिचालन शुरू हो गया है, जो भारत के खनिज क्षेत्र में निजी निवेश के एक नए अध्याय की शुरुआत है। भारत को प्राचीन काल से ही समृद्ध और सोने की बहुतायत के कारण 'सोने की चिड़िया' के रूप में जाना जाता रहा है। हाल ही में आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले में देश की पहली बड़ी निजी सोने की खदान के संचालन की शुरुआत ने इस ऐतिहासिक गौरव को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। इस बड़ी घटना के सामने आने के बाद से ही आम लोगों और नीति निर्माताओं के बीच यह उत्सुकता बढ़ गई है कि क्या भारत अब सोने के उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रहा है। कई लोग यह भी सोच रहे हैं कि क्या इस नई शुरुआत से विदेशों से होने वाले सोने के भारी-भरकम आयात में कमी आएगी और देश की अर्थव्यवस्था को एक मजबूत सहारा मिलेगा। पहली नजर में यह खबर जितनी सीधी और उत्साहजनक दिखाई देती है, इसके पीछे की आर्थिक वास्तविकता उतनी ही गहरी और विश्लेषणात्मक है। यह सिर्फ एक व्यावसायिक परियोजना का उद्घाटन नहीं है बल्कि भारत के खनन उद्योग में निजी निवेश के एक नए युग का सूत्रपात है। इसके बावजूद, हमें यह समझना होगा कि भारत रातों-रात सोने के मामले में पूरी तरह से आत्मनिर्भर नहीं होने जा रहा है। इस पूरी तस्वीर को विस्तार से और विभिन्न पहलुओं से समझना बेहद जरूरी है। आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले के अंतर्गत आने वाले जोन्नागिरी गांव में, जिसे अब नया नाम स्वर्णगिरी दिया गया है, भारत की पहली प्रमुख निजी क्षेत्र की सोने की खदान ने अपना काम शुरू कर दिया है। लगभग 400 करोड़ रुपए के भारी निवेश से तैयार की गई इस महत्वाकांक्षी परियोजना में स्वर्ण अयस्क निकालने के लिए ओपन-पिट तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। शुरुआती भूवैज्ञानिक सर्वेक्षणों और शोध के माध्यम से यहां लगभग 13 टन से अधिक शुद्ध सोने की उपलब्धता की पुष्टि हो चुकी है। इसके साथ ही, विशेषज्ञों का अनुमान है कि आगे की खोज और विस्तृत खुदाई के बाद यह आंकड़ा 42 टन तक भी पहुंच सकता है। हालांकि, इस भंडार से पूरा सोना एक ही बार में बाहर नहीं निकाला जाएगा। योजना के अनुसार, संचालन के पहले वर्ष में लगभग 400 किलोग्राम सोने का उत्पादन होने की उम्मीद है। आने वाले वर्षों में धीरे-धीरे क्षमता विस्तार के साथ इसे बढ़ाकर प्रति वर्ष 900 किलोग्राम से लेकर 1 टन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। स्पष्ट है कि यह परियोजना भारतीय खनन क्षेत्र में एक नए मील का पत्थर तो साबित होगी, लेकिन देश की संपूर्ण सोने की मांग को देखते हुए यह तत्काल कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं ला पाएगी। निजी क्षेत्र की भागीदारी और आधुनिक तकनीक का संगम कर्नूल जिले के स्वर्णगिरी गांव में स्थित यह परियोजना भारत के स्वर्ण खनन के इतिहास में एक अनूठी पहल है। स्वतंत्रता के बाद से अब तक सोने के खनन का कार्य मुख्य रूप से सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों के नियंत्रण में ही रहा है। यह पहला ऐसा अवसर है जब किसी विशाल और व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य सोने की खदान के संचालन की जिम्मेदारी पूरी तरह से एक निजी विकासकर्ता को सौंपी गई है। करीब 400 करोड़ रुपए की इस बड़ी पूंजीगत लागत वाली परियोजना को पूरी तरह से आधुनिकतम तकनीकों से लैस किया गया है। यहां ओपन-पिट माइनिंग पद्धति अपनाई जा रही है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि यहां जमीन के भीतर बहुत गहराई तक खतरनाक सुरंगें नहीं बनाई जाएंगी। इसके बजाय, सतह के ऊपरी हिस्सों को हटाकर एक खुले गड्ढे के रूप में खुदाई की जाएगी, जो न केवल सुरक्षा के लिहाज से बेहतर है बल्कि परिचालन लागत को भी काफी हद तक नियंत्रित रखती है। प्राथमिक जांच में जिस 13 टन सोने के भंडार की पुष्टि हुई है, उसे विस्तृत खोज के जरिए 42 टन तक बढ़ाने की पूरी संभावना है। शुरुआत में प्रति वर्ष 400 किलोग्राम उत्पादन से आगे बढ़ते हुए जब यह खदान अपने चरम पर होगी, तब यहां से सालाना 1 टन के करीब सोना निकाला जा सकेगा। इस प्रकार यह परियोजना अगले 15 वर्षों तक निरंतर संचालित रहने की उम्मीद है, जिससे क्षेत्र में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बड़े पैमाने पर रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे। कोलार गोल्ड फील्ड्स का गौरवशाली इतिहास और उसका पतन भारत में सोने की खोज और उसका उपयोग कोई आधुनिक घटना नहीं है। हमारे प्राचीन ग्रंथों, वैदिक संहिताओं, रामायण और महाभारत में सोने के आभूषणों और मुद्राओं के प्रचुर उल्लेख मिलते हैं, जो इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि हजारों वर्ष पहले भी भारत में स्वर्ण निष्कर्षण और शोधन की तकनीकें मौजूद थीं। हालांकि, आधुनिक और औद्योगिक स्तर पर सोने का बड़े पैमाने पर खनन ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुआ था। लगभग 1880 के दशक में ब्रिटिश उद्यम जॉन टेलर एंड संस ने कर्नाटक के ऐतिहासिक कोलार गोल्ड फील्ड्स, जिसे दुनिया भर में KGF के नाम से जाना जाता है, में आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों से खनन शुरू किया। यह खदान अपने समय में दुनिया की सबसे गहरी खदानों में से एक थी, जिसकी गहराई भूमि की सतह से लगभग 3.2 किलोमीटर नीचे तक चली गई थी। करीब 120 वर्षों के अपने लंबे कार्यकाल के दौरान इस ऐतिहासिक स्थल से लगभग 800 से 900 टन सोने का रिकॉर्ड उत्पादन किया गया। एक समय ऐसा भी था जब देश के कुल सोने के उत्पादन का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा अकेले कोलार की खदानों से प्राप्त होता था। वर्ष 1956 में स्वतंत्र भारत की सरकार ने कोलार गोल्ड फील्ड्स का राष्ट्रीयकरण कर दिया और इसके प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी भारत गोल्ड माइन्स लिमिटेड को सौंप दी। राष्ट्रीयकरण के बाद के दशकों में संसाधनों के अत्यधिक दोहन और तकनीकी सीमाओं के कारण सोने के उत्पादन में लगातार गिरावट दर्ज की जाने लगी। स्थिति यहां तक बिगड़ गई कि खदान के अत्यंत गहरे होने के कारण वहां से सोना निकालने की लागत, निकाले गए सोने के बाजार मूल्य से कहीं अधिक हो गई। लगातार बढ़ते वित्तीय नुकसान और गंभीर आर्थिक घाटे के कारण आखिरकार वर्ष 2001 में केंद्र सरकार को KGF को हमेशा के लिए बंद करने का अत्यंत कठिन निर्णय लेना पड़ा। यह घटना भारतीय खनन इतिहास के सबसे बड़े और सबसे संवेदनशील अध्यायों में से एक मानी जाती है, जिसने यह साबित किया कि अत्यधिक गहराई पर स्थित संसाधनों का दोहन बिना उन्नत और सस्ती तकनीक के वित्तीय रूप से संभव नहीं है। भारत में वर्तमान घरेलू उत्पादन की स्थिति KGF के बंद होने के बाद भी भारत में सोने का खनन पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ। वर्तमान में कर्नाटक के ही रायचूर जिले में स्थित हुत्ती गोल्ड माइन्स से प्रति वर्ष लगभग 1 से 1.5 टन सोने का व्यावसायिक उत्पादन किया जाता है। इसके अतिरिक्त, देश के कुछ अन्य छोटे और सीमित हिस्सों में भी बहुत कम मात्रा में सोने का खनन होता है, लेकिन वह इतना नगण्य है कि उसे बड़े आंकड़ों में शामिल नहीं किया जा सकता। प्रथम दृष्टया, सालाना 1.5 टन सोने का आंकड़ा सुनने में बड़ा लग सकता है, लेकिन जब हम इसकी तुलना भारत की विशाल और लगातार बढ़ती घरेलू मांग से करते हैं, तो यह समुद्र में एक बूंद के समान प्रतीत होता है। भारत अपनी सांस्कृतिक परंपराओं, विवाह उत्सवों और निवेश की आदतों के कारण दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण उपभोक्ताओं में से एक है। देश की घरेलू मांग को पूरा करने के लिए प्रत्येक वर्ष लगभग 700 से 800 टन सोना विदेशी बाजारों से आयात करना पड़ता है। यही कारण है कि हमारा घरेलू उत्पादन राष्ट्रीय मांग का एक प्रतिशत भी पूरा करने में असमर्थ है। स्वर्ण उत्पादन के वैश्विक आंकड़े और प्रमुख देश जब हम वैश्विक स्तर पर सोने के उत्पादन के परिदृश्य पर नजर डालते हैं, तो भारत की स्थिति बहुत पीछे नजर आती है। वर्तमान में वैश्विक स्वर्ण उत्पादन में चीन का दबदबा सर्वोपरि है, जो हर साल लगभग 370 से 380 टन सोने का खनन करता है। चीन के बाद दूसरे स्थान पर रूस का नाम आता है, जिसका वार्षिक उत्पादन लगभग 325 टन है। तीसरे स्थान पर ऑस्ट्रेलिया का कब्जा है, जहां से प्रति वर्ष लगभग 280 से 290 टन सोना निकाला जाता है, जबकि कनाडा भी सालाना लगभग 200 टन के उत्पादन के साथ इस दौड़ में अग्रणी देशों में शामिल है। इसके अलावा अमेरिका, घाना, पेरू और मेक्सिको जैसे देश भी इस मूल्यवान धातु के प्रमुख वैश्विक उत्पादकों में गिने जाते हैं। एक समय था जब दक्षिण अफ्रीका को वैश्विक स्वर्ण खनन का बेताप बादशाह माना जाता था, जहां सालाना 1,000 टन से भी अधिक सोने का रिकॉर्ड उत्पादन होता था। लेकिन समय बीतने के साथ वहां के समृद्ध भंडार समाप्त होते गए और आज वहां का उत्पादन घटकर मात्र 100 टन के आसपास रह गया है। इस वैश्विक परिदृश्य के समक्ष भारत का वर्तमान कुल उत्पादन बेहद कमजोर स्थिति में दिखाई देता है। क्या आंध्र प्रदेश की यह खदान बदल पाएगी देश का आर्थिक परिदृश्य? आंध्र प्रदेश के स्वर्णगिरी की नई खदान से जब अपने पूर्ण परिचालन के बाद सालाना 1 टन सोना भी निकलना शुरू हो जाएगा, तब भी भारत के विशाल आयात बिल पर इसका कोई प्रत्यक्ष या बड़ा असर नहीं पड़ेगा। पिछले वित्तीय वर्ष के आंकड़ों को देखें तो भारत ने विदेशी बाजारों से सोना खरीदने के लिए लगभग 7,200 करोड़ डॉलर, जो भारतीय मुद्रा में लगभग 6 लाख करोड़ रुपए के बराबर है, खर्च किए थे। इतने भारी-भरकम आयात को देखते हुए कर्नूल की इस खदान से मिलने वाला 1 टन सोना देश के विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने में बहुत सीमित भूमिका ही निभा पाएगा। हालांकि, आर्थिक और औद्योगिक नीति के विशेषज्ञों का मानना है कि इस परियोजना को केवल उत्पादन के आंकड़ों से नहीं आंका जाना चाहिए। यह परियोजना वास्तव में भारत के खनन क्षेत्र में एक बड़ा नीतिगत और ढांचागत बदलाव है। यदि यह निजी निवेश वाली परियोजना व्यावसायिक रूप से अत्यधिक सफल और लाभदायक साबित होती है, तो यह देश के अन्य खनिज संपदा से संपन्न राज्यों जैसे ओडिशा, मध्य प्रदेश और राजस्थान के लिए एक उत्प्रेरक का कार्य करेगी। निजी क्षेत्र की अन्य बड़ी कंपनियां भी आधुनिक तकनीकों और बड़े निवेश के साथ भारत के अप्रयुक्त स्वर्ण भंडारों को खोजने और निकालने के लिए आगे आएंगी, जिससे अंततः लंबी अवधि में भारत के आयात पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। इसका आप पर असर • भारत में: निजी क्षेत्र के लिए स्वर्ण खनन खुलने से लंबी अवधि में भारत के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे सोने के भारी-भरकम आयात बिल और चालू खाता घाटे को धीरे-धीरे कम करने में सहायता मिलेगी। • आंध्र प्रदेश में: कर्नूल जिले के स्थानीय लोगों के लिए बुनियादी ढांचे के विकास, रोजगार के नए अवसरों और आर्थिक गतिविधियों में तेजी आएगी। सवाल-जवाब 1. भारत की पहली प्रमुख निजी सोने की खदान कहाँ स्थित है? यह खदान आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले के जोन्नागिरी गांव में स्थित है, जिसका नाम बदलकर अब स्वर्णगिरी कर दिया गया है। 2. स्वर्णगिरी परियोजना की कुल स्वर्ण आरक्षित क्षमता और वार्षिक उत्पादन क्षमता क्या है? इस परियोजना में 13 टन से अधिक सोने के भंडार की पुष्टि हो चुकी है, जिसके बढ़कर 42 टन होने की संभावना है। पहले वर्ष में 400 किलोग्राम उत्पादन का अनुमान है, जो आगे चलकर सालाना 1 टन तक पहुंच सकता है। 3. क्या इस नई खदान से भारत का सोने का आयात काफी हद तक कम हो जाएगा? नहीं, इस खदान से मिलने वाला सालाना 1 टन सोना भारत की 700 से 800 टन की विशाल वार्षिक मांग के सामने बहुत कम है, जिसके लिए भारत ने पिछले साल लगभग 7,200 करोड़ डॉलर खर्च किए थे। 4. भारत में कोलार गोल्ड फील्ड्स (KGF) को साल 2001 में क्यों बंद कर दिया गया था? अत्यधिक गहराई होने के कारण KGF से सोना निकालने की परिचालन लागत उसके बाजार मूल्य से बहुत अधिक हो गई थी, जिससे लगातार होने वाले वित्तीय नुकसान के कारण इसे बंद करना पड़ा। 5. दुनिया में सोने के उत्पादन में वर्तमान में कौन सा देश शीर्ष पर है? वैश्विक स्वर्ण उत्पादन में चीन सबसे आगे है, जहां प्रति वर्ष लगभग 370 से 380 टन सोने का खनन किया जाता है। https://trendkia.com/business/swarnagiri-men-niji-khanana-ka-naya-savera-kya-andhra-pradesh-ki-isa-khadana-se-badalega-bharata-men-sone-ka-ganita-3217 TrendKia — Har trend, sabse pehle.