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  "type": "article",
  "title": "तेलंगाना के हथकरघा उद्योग से चीन जा रहा सिल्क वेस्ट, प्रोसेसिंग की कमी से बुनकरों को बड़ा घाटा",
  "summary": "तेलंगाना में आधुनिक प्रोसेसिंग यूनिट्स के अभाव के चलते रेशम का कीमती वेस्टेज सस्ते में चीन भेजा जा रहा है, जिससे स्थानीय कारोबारियों को भारी नुकसान हो रहा है।",
  "content": "दक्षिण भारत के प्रमुख हथकरघा और रेशम केंद्रों में शामिल तेलंगाना से रेशम उत्पादन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बेहद कम कीमत पर विदेश भेजा जा रहा है। रेशम के कीड़ों के कोकून से मुख्य धागा निकालने के बाद जो अवशेष बच जाता है, उसे सिल्क वेस्ट के नाम से जाना जाता है। घरेलू स्तर पर उन्नत और आधुनिक तकनीक न होने के कारण यह उपयोगी कच्चा माल स्थानीय स्तर पर इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। इसका सीधा फायदा विदेशी खरीदार उठा रहे हैं, जबकि स्थानीय बुनकर और व्यापारी वाजिब मुनाफे से वंचित हैं।\n\nकोकून से धागा निकालने के बाद कैसे बनता है यह कचरा\nतेलंगाना के यादाद्री भुवनगिरी जिले के चौटुप्पल इलाके में स्थित ‘कृष्णा रीलिंग, ट्विस्टिंग एंड सिल्क साड़ीज’ के संचालक श्रीहरि पिछले 10 सालों से इस काम से जुड़े हैं। वे बताते हैं कि पारंपरिक रेशम उत्पादन में कोकून को खौलते पानी में डाला जाता है, जिससे उसका मुख्य और मजबूत धागा अलग कर लिया जाता है। इसी धागे से पारंपरिक और प्रसिद्ध रेशमी साड़ियों का निर्माण होता है।\n\nधागा खींचने की इस प्रक्रिया के दौरान कोकून के बाहरी हिस्से और अंत में बचने वाले बारीक रेशे अलग हो जाते हैं। इन बचे हुए रेशों को ही सिल्क वेस्ट कहा जाता है। इकाइयां इन अवशेषों को धूप में सुखाती हैं और फिर बड़ी चादरों या शीट्स के रूप में सुरक्षित रख लेती हैं। हर महीने रीलिंग इकाइयों से भारी मात्रा में ऐसा वेस्टेज निकलता है।\n\nघरेलू तकनीक का अभाव और विदेशी मंडियों का रुख\nस्थानीय स्तर पर इस सूखे अवशेष को रिफाइन करने के लिए जरूरी अत्याधुनिक मशीनें और ढांचा उपलब्ध नहीं है। दूसरी ओर, चीन के पास इस कचरे को परिष्कृत करने की उन्नत तकनीक मौजूद है। यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर काम करने वाले वेंडर और बिचौलिए इस सूखे माल को कम दामों पर खरीदकर सीधे चीन तथा अन्य देशों को निर्यात कर देते हैं।\n\nचीन इस कच्चे कचरे को उन्नत मशीनों की मदद से रिफाइन करता है और उससे उच्च गुणवत्ता वाला स्पन सिल्क तैयार करता है। इस स्पन सिल्क को अन्य बेहतरीन कपड़ों के साथ मिलाकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में महंगे कोट, सूट और ब्लेजर तैयार किए जाते हैं।\n\nस्थानीय इकाइयों की स्थापना से बदल सकती है तस्वीर\nव्यापारियों और रीलिंग संचालकों का मानना है कि यदि तेलंगाना और देश के अन्य हिस्सों में उन्नत स्पन सिल्क प्रोसेसिंग संयंत्र लगाए जाएं, तो देश का कच्चा माल बाहर जाने से रुक सकेगा। इससे बुनकरों और रीलिंग ऑपरेटरों को उनके उत्पाद की पूरी कीमत मिलेगी, साथ ही स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और आमदनी के नए अवसर भी पैदा होंगे।\n\nइसका आप पर असर\nइस खबर का सीधा प्रभाव हथकरघा क्षेत्र, वस्त्र कारोबार और स्थानीय कारीगरों की कमाई पर पड़ता है।\n\n• भारत में: यदि घरेलू स्तर पर प्रोसेसिंग यूनिट्स लगाई जाएं, तो देश से सस्ते कच्चे माल का निर्यात रुक सकता है। इससे भारतीय कपड़ा उद्योग को अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे उत्पाद बनाने के लिए घरेलू स्पन सिल्क मिल सकेगा।\n• तेलंगाना में: यादाद्री भुवनगिरी जैसे प्रमुख रेशम केंद्रों में रीलिंग संचालकों को कचरे की सही कीमत मिलने लगेगी। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में नए कारखाने शुरू होने से युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर खुलेंगे।\n• बुनकरों और कारोबारियों के लिए: स्थानीय स्तर पर वेस्टेज का उचित मूल्य मिलने से उनकी आय में बढ़ोतरी होगी। बिचौलियों पर निर्भरता घटने से छोटे उद्योग अधिक आत्मनिर्भर बनेंगे।\n• कपड़ा खरीदारों के लिए: भविष्य में देश के भीतर ही प्रीमियम फैब्रिक तैयार होने से भारतीय बाजारों में अच्छी गुणवत्ता वाले सिल्क उत्पाद किफायती दरों पर मिल सकते हैं। इससे आयातित कपड़ों पर निर्भरता घटेगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nतेलंगाना से सिल्क वेस्ट का बड़े पैमाने पर विदेश निर्यात आधुनिक तकनीक और बुनियादी ढांचे के अभाव के कारण हो रहा है।\n\n• आधुनिक तकनीक की अनुपलब्धता: स्थानीय स्तर पर कोकून से निकलने वाले बारीक रेशों को परिष्कृत करने के लिए आवश्यक मशीनरी मौजूद नहीं है। इस कमी के कारण रीलिंग इकाइयां सूखे कचरे को आगे प्रोसेस करने में असमर्थ हैं।\n• चीन की तकनीकी बढ़त: चीन ने सिल्क वेस्ट को रिफाइन करके स्पन सिल्क बनाने वाली अत्याधुनिक तकनीक विकसित कर रखी है। इसलिए वहां के आयातक इस कच्चे माल को आसानी से खरीद लेते हैं।\n• बिचौलियों का नेटवर्क: स्थानीय स्तर पर खरीदार न होने से बिचौलिए कम दामों पर यह सामग्री खरीदकर अंतरराष्ट्रीय निर्यातकों को बेच देते हैं। इससे उत्पादकों को अपने कचरे का सही मूल्य नहीं मिल पाता।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सिल्क वेस्ट क्या होता है?\nकोकून को गर्म पानी में डालकर मुख्य धागा निकालने के बाद जो बाहरी परत और बारीक रेशे बचते हैं, उन्हें सिल्क वेस्ट कहा जाता है।\n\n2. तेलंगाना का सिल्क वेस्ट चीन क्यों भेजा जा रहा है?\nस्थानीय स्तर पर आधुनिक प्रोसेसिंग मशीनें उपलब्ध न होने के कारण इसे सस्ते दामों पर चीन और अन्य देशों को निर्यात किया जाता है।\n\n3. चीन में इस कचरे से क्या बनाया जाता है?\nचीन में इसे आधुनिक मशीनों से रिफाइन करके स्पन सिल्क बनाया जाता है, जिससे महंगे सूट, ब्लेजर और कोट तैयार होते हैं।\n\n4. चौटुप्पल में कौन सी रीलिंग यूनिट कार्यरत है?\nचौटुप्पल में श्रीहरि पिछले 10 सालों से ‘कृष्णा रीलिंग, ट्विस्टिंग एंड सिल्क साड़ीज’ नाम से यूनिट संचालित कर रहे हैं।\n\n5. भारत में प्रोसेसिंग यूनिट्स लगाने से क्या फायदा होगा?\nइससे कच्चे माल का सस्ता निर्यात रुकेगा, स्थानीय बुनकरों को बेहतर मूल्य मिलेगा और रोजगार के नए अवसर बढ़ेंगे।",
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  "publishedAt": "2026-10-31",
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