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  "title": "यूके ने मानी भारत की शर्त, कार्बन टैक्स के फॉर्मूले पर बनी सहमति से निर्यातकों को राहत",
  "summary": "भारत और यूके के व्यापार समझौते में अटका कार्बन टैक्स का पेच सुलझ गया है, यूके ने भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम को मंजूरी दे दी है, जिससे CBAM के तहत भारतीय निर्यातकों पर टैक्स का बोझ घटेगा।",
  "content": "भारत और यूके के बीच व्यापार समझौता महीनों पहले हो चुका था, लेकिन एक कांटा अब तक अटका हुआ था कि ब्रिटेन में घुसते ही भारतीय सामान पर कार्बन उत्सर्जन के नाम पर कितना टैक्स लगेगा. अब यूके ने यह पेच सुलझा लिया है और तय किया है कि इसके लिए वह भारत की अपनी घरेलू कार्बन ट्रेडिंग व्यवस्था को ही आधार बनाएगा. इससे आने वाले वक्त में ब्रिटेन जाने वाले भारतीय निर्यातकों पर टैक्स का बोझ हल्का पड़ने की उम्मीद बन गई है.\n\nलंदन ने क्यों दी भारत के फॉर्मूले को मंजूरी\nयूके के अधिकारियों ने बिजली मंत्रालय के तहत आने वाले ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी को सूचना दी है कि वे भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम को अपनी उस मान्यता प्राप्त सूची में जोड़ रहे हैं, जिसका इस्तेमाल कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी CBAM के तहत टैक्स तय करने के लिए किया जाता है. सीधी भाषा में कहें तो अब जब भी भारत में बना कोई सामान ब्रिटेन पहुंचेगा, वहां के सीमा शुल्क अधिकारी टैक्स का हिसाब किसी आम पैमाने से नहीं, बल्कि भारत की अपनी स्कीम के आधार पर लगाएंगे. दोनों पक्ष मुक्त व्यापार समझौते पर दस्तखत होने के बाद भी इसी मुद्दे पर बातचीत करते रहे, क्योंकि कार्बन टैक्स को लेकर आशंका थी कि यह चुपचाप निर्यातकों को मिले टैरिफ फायदे को खत्म कर सकता है. इस पूरे मामले से वाकिफ अधिकारियों का कहना है कि भारत की शर्तों का इस तरह मान लिया जाना दोनों देशों के बीच चल रही व्यापार बातचीत में एक बड़ी कामयाबी है.\n\nआखिर है क्या यह कार्बन क्रेडिट स्कीम\nभारत ने अपनी फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं और कार्बन प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम शुरू की थी. इसके पीछे सोच यह है कि कंपनियां आपस में कार्बन क्रेडिट सर्टिफिकेट का लेन-देन करें, जिससे ग्रीन हाउस गैसों की एक कीमत तय हो जाए और धीरे-धीरे इकनॉमी से ऐसा उत्सर्जन कम होता चला जाए. मकसद यही है कि रातोंरात पाबंदी लगाने के बजाय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को धीरे-धीरे कार्बन पर निर्भरता से बाहर निकाला जाए. ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी इस स्कीम को चलाने के लिए जरूरी फंडिंग का इंतजाम भी कर रहा है. अब यूके भारत के साथ कारोबार करते वक्त इसी घरेलू फॉर्मूले का सहारा लेगा.\n\nनिर्यातकों को कैसे मिलेगी राहत\nमामले की जानकारी रखने वाले अधिकारियों के मुताबिक, ब्रिटेन सरकार ने भारत की कार्बन क्रेडिट स्कीम को अपनी प्राइसिंग व्यवस्था से जोड़ दिया है. इसका सीधा मतलब यह है कि CBAM के दायरे में आने वाला भारतीय सामान मंगाने वाले यूके के आयातक अब टैक्स में छूट की मांग कर सकते हैं, बशर्ते वे यूके के कानून के मुताबिक जरूरी सबूत और वेरिफिकेशन पेश करें. जो भारतीय कंपनियां इस छूट का फायदा लेना चाहती हैं, उन्हें अपने कागजात पूरी तरह तैयार रखने होंगे, क्योंकि बिना ठोस सबूत के ब्रिटिश सीमा शुल्क विभाग यह राहत नहीं देगा. यह नियम लागू होते ही ब्रिटेन पहुंचने वाले भारतीय माल पर टैक्स का बोझ घटेगा, और इसका सीधा फायदा भारतीय निर्यातकों और कारोबारियों की जेब में जाएगा. यूके के CBAM ढांचे में पहले से यह इंतजाम है कि जिन सामानों पर उत्पादक देश में पहले ही कार्बन टैक्स चुकाया जा चुका है, उन पर ब्रिटेन में दोबारा टैक्स नहीं थोपा जाएगा, यानी डबल टैक्सेशन से बचाव होगा. इसका सबसे बड़ा फायदा भारतीय निर्यातकों को मिलने वाला है, क्योंकि देश में ज्यादातर मैन्युफैक्चरिंग अब भी कोयले से चलने वाली बिजली पर टिकी है, और कोयला ही कार्बन उत्सर्जन का सबसे बड़ा जरिया माना जाता है. हालांकि भारत को असल में कितना फायदा मिलेगा, यह तभी साफ होगा जब दोनों देश आपस में कार्बन ट्रेडिंग की कीमत तय कर लेंगे.\n\nदोनों देशों के बीच कितना बड़ा है कारोबार\nभारत और यूके के बीच इस साल 15 जुलाई को व्यापार समझौते पर दस्तखत हुए थे, जिसमें मुक्त कारोबार की शर्तें तय हुई थीं और यह कार्बन डील उसी समझौते का हिस्सा मानी जा रही है. वित्तवर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच सामान का कुल कारोबार 25.1 अरब डॉलर तक पहुंचा, जबकि साल 2024 में दोनों के बीच सेवाओं का कारोबार 25.4 अरब डॉलर के आंकड़े को छू चुका था. यूके का CBAM सिस्टम अभी लागू नहीं हुआ है, यह 2027 से शुरू होगा और उस वक्त आयरन व स्टील जैसे कार्बन उत्सर्जन वाले भारतीय उत्पादों पर वहां टैक्स लगेगा. लेकिन भारत की कार्बन ट्रेडिंग स्कीम को मान्यता मिल जाने से निर्यातकों को उम्मीद है कि यह टैक्स असर काफी हल्का रहेगा.\n\nआगे क्या होगा\nफिलहाल दोनों सरकारों के बीच कार्बन क्रेडिट की असल कीमत तय होना अभी बाकी है, और यही आंकड़ा तय करेगा कि निर्यातकों को कितनी राहत मिलेगी. जब तक यह कीमत तय नहीं होती, दोनों तरफ के कारोबारी इस पर बारीकी से नजर रखेंगे, क्योंकि मंजूरी मिलने से ज्यादा मायने यही कीमत रखेगी कि 2027 में CBAM लागू होने पर टैक्स का असल बोझ कितना घटता है.\n\nइसका आप पर असर\nयह डील सीधे तौर पर उन भारतीय कंपनियों को फायदा पहुंचाएगी जो अपना सामान ब्रिटेन को निर्यात करती हैं, खासकर आयरन और स्टील जैसे कार्बन-भारी सेक्टर की कंपनियों को।\n\n• निर्यातकों को टैक्स में राहत: ब्रिटेन के आयातक अब भारत की कार्बन क्रेडिट स्कीम के आधार पर टैक्स छूट मांग सकेंगे। इसका मतलब है कि भारतीय सामान वहां पहले से सस्ता या कम टैक्स वाला दिखेगा, जिससे मांग बढ़ने की गुंजाइश बनेगी।\n• कागजी काम बढ़ेगा: छूट पाने के लिए कंपनियों को यूके के कानून के मुताबिक सबूत और वेरिफिकेशन देना होगा। जो कंपनियां अभी से अपने कार्बन उत्सर्जन का रिकॉर्ड ठीक से नहीं रखतीं, उन्हें जल्द अपनी प्रक्रिया दुरुस्त करनी होगी।\n• स्टील और आयरन सेक्टर पर सीधा असर: 2027 से लागू होने वाला यूके का CBAM खासतौर पर आयरन और स्टील जैसे उत्पादों पर टैक्स लगाएगा। इस सेक्टर की कंपनियों के पास अभी करीब एक साल का वक्त है, ताकि वे अपनी कार्बन क्रेडिट स्कीम में भागीदारी दुरुस्त कर लें।\n• असली फायदा कीमत तय होने पर निर्भर: कारोबारियों को मिलने वाली राहत की सही रकम तभी पता चलेगी जब दोनों देश कार्बन ट्रेडिंग की कीमत तय करेंगे। जब तक यह कीमत सामने नहीं आती, कंपनियां अपने निर्यात की लागत का सटीक अनुमान नहीं लगा पाएंगी।\n• बड़े व्यापार समझौते को मजबूती: जुलाई में हुए भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौते का असर अब कारोबारियों तक ज्यादा साफ तौर पर पहुंचेगा, क्योंकि 25.1 अरब डॉलर के सामान कारोबार में टैक्स की यह राहत सीधे मुनाफे में जुड़ सकती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह मंजूरी भारत और यूके के बीच जुलाई में हुए मुक्त व्यापार समझौते के आगे के हिस्से के तौर पर आई है, जहां कार्बन टैक्स को लेकर मतभेद अब तक सुलझा नहीं था।\n\n• CBAM की जरूरत: यूके अपने यहां आयात होने वाले कार्बन-भारी उत्पादों पर टैक्स लगाने के लिए CBAM व्यवस्था लागू कर रहा है, इसलिए उसे यह तय करना जरूरी था कि किन देशों की घरेलू कार्बन स्कीम को वह मान्यता देगा।\n• भारत की अपनी स्कीम पहले से मौजूद: भारत पहले ही अपनी कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम नोटिफाई कर चुका था, जिसका इस्तेमाल फैक्ट्रियों के उत्सर्जन पर कीमत तय करने के लिए हो रहा है, इसलिए यूके के पास आधार बनाने के लिए एक तैयार ढांचा मौजूद था।\n• डबल टैक्सेशन से बचने की कोशिश: यूके नहीं चाहता कि जिन सामानों पर उत्पादक देश पहले ही कार्बन टैक्स ले चुका है, उन पर ब्रिटेन में दोबारा टैक्स लगे, इसलिए विदेशी स्कीमों को मान्यता देने की प्रक्रिया शुरू की गई।\n• आगे क्या: अब दोनों देशों को कार्बन ट्रेडिंग की कीमत तय करनी है, उसके बाद ही यह साफ होगा कि छूट का असली आकार कितना बड़ा होगा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. यूके ने भारत के किस फॉर्मूले को मंजूरी दी है?\nयूके ने भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम को अपनी CBAM व्यवस्था के तहत टैक्स तय करने के लिए मान्यता दी है।\n\n2. इससे भारतीय निर्यातकों को क्या फायदा होगा?\nCBAM के दायरे में आने वाले भारतीय सामान पर यूके के आयातक अब टैक्स में छूट की मांग कर सकेंगे, जिससे भारतीय सामान पर टैक्स का बोझ घटेगा।\n\n3. यूके का CBAM कब से लागू होगा?\nयूके का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म साल 2027 से लागू होगा।\n\n4. CBAM के तहत किन भारतीय उत्पादों पर टैक्स लगेगा?\nआयरन और स्टील जैसे कार्बन उत्सर्जन से जुड़े उत्पादों पर यूके में टैक्स लगाया जाएगा।\n\n5. भारत और यूके का कारोबार फिलहाल कितना बड़ा है?\nवित्तवर्ष 2025-26 में सामान का कारोबार 25.1 अरब डॉलर रहा, जबकि साल 2024 में सेवाओं का कारोबार 25.4 अरब डॉलर तक पहुंचा।\n\n6. टैक्स छूट पाने के लिए यूके के आयातकों को क्या करना होगा?\nउन्हें यूके के कानून के मुताबिक जरूरी सबूत और वेरिफिकेशन उपलब्ध कराना होगा।\n\n7. क्या यह छूट सारे भारतीय सामान पर लागू होगी?\nयह छूट उन सामानों पर लागू होगी जो यूके के CBAM के दायरे में आते हैं और जिन पर भारत में पहले ही कार्बन टैक्स चुकाया जा चुका है।",
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  "category": "व्यापार",
  "publishedAt": "2026-09-08",
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