अमेरिकी संसद के चुनावी नतीजों से भारत संग कारोबारी समीकरणों पर क्या पड़ेगा असर संसद के मध्यावधि चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी के पिछड़ने पर भी भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय व्यापार तथा वीजा नीतियों में फौरन बड़ा फेरबदल होने के आसार बेहद कम हैं। वाशिंगटन में सत्ता के संतुलन को तय करने वाले विधायी चुनाव 3 नवंबर को होने जा रहे हैं, जिस पर दुनियाभर के नीति निर्माताओं की नजरें टिकी हुई हैं। यह मुकाबला तय करेगा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के अंतिम 2 सालों में अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में किसका वर्चस्व रहेगा। इस मतदान में निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की 435 सीटों के साथ-साथ सीनेट की 100 में से एक तिहाई सीटों पर फैसला होना है। अगर विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी किसी भी सदन में बढ़त बनाने में कामयाब होती है, तो व्हाइट हाउस के आर्थिक और आव्रजन फैसलों पर सख्त विधायी पहरा बैठना तय है। द्विपक्षीय व्यापार और शुल्कों का गणित अगर संसद के दोनों सदनों या किसी एक में भी बाजी डेमोक्रेट्स के हाथ लगती है, तो नई दिल्ली और वाशिंगटन के रिश्तों में रातोंरात कोई बड़ा भूकंप नहीं आएगा। भारतीय निर्यातकों पर लगाए जाने वाले शुल्कों अथवा स्थानीय स्तर पर कार्यरत कामगारों की स्थिति तुरंत नहीं बदलेगी। फर्क सिर्फ इतना आएगा कि विपक्षी दल अंधाधुंध आयात शुल्क लगाने की राष्ट्रपति की नीति पर संसद के भीतर तीखे सवाल खड़े कर सकेंगे और नए कानूनों पर बहस छेड़ेंगे। हालांकि विदेश नीति और वैश्विक कारोबार के मामलों में राष्ट्रपति की वीटो शक्ति पूरी तरह बरकरार रहेगी, जिसके चलते पुरानी नीतियों को एकदम से पलटना संभव नहीं होगा। भारतीय उत्पादों के लिए अमेरिका सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है। दोनों पक्षों ने फरवरी के महीने में एक अंतरिम व्यापार रूपरेखा तय की थी, जिसमें हिंदुस्तानी सामानों पर 18 फीसदी आयात शुल्क लगाने का प्रावधान शामिल था। हालांकि इस व्यवस्था को तब बड़ा झटका लगा जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने आपातकालीन अधिकारों के तहत थोपे गए शुल्कों को निरस्त कर दिया। शीर्ष अदालत के इस फैसले के बाद यह शुल्क घटकर 10 फीसदी के न्यूनतम आधार स्तर पर सीमित हो गया। शुल्क में आई इस कमी के बाद भी दोनों मुल्कों के बीच किसी व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर सहमति नहीं बन सकी है। इस सिलसिले में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसी औपचारिक व्यापार करार के फौरन वजूद में आने की उम्मीद नहीं है। दूसरी ओर भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी इस बात की पुष्टि की है कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत एक ठहराव पर पहुंच चुकी है और आगे समझौते की गुंजाइश सीमित है। भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों और वीजा नियमों का पेंच सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की भारतीय कंपनियों और वहां तैनात सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के लिए H-1B वीजा हमेशा से सबसे संवेदनशील विषय रहा है। ट्रंप प्रशासन ने इस वीजा श्रेणी के नए आवेदनों पर 1 लाख डॉलर की भारी भरकम फीस थोपने का खाका तैयार किया था। इस योजना को अमेरिकी अदालतों में कानूनी चुनौती दी गई, जहां प्रक्रियात्मक कमियों को आधार बनाकर 2 संघीय जजों ने इस भारी फीस के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी है। हालांकि यह स्थगन कानूनी खींचतान का स्थायी समाधान नहीं माना जा रहा है। कैपिटल हिल में विपक्षी दल के मजबूत होने से भविष्य के आव्रजन कानूनों और प्रशासनिक फैसलों की संसदीय पड़ताल जरूर बढ़ जाएगी, लेकिन वीजा नियमों में तुरंत राहत मिलने की कोई गारंटी नहीं दिखती। बेंगलुरु स्थित तक्षशिला इंस्टीट्यूशन द्वारा किए गए एक अध्ययन से सामने आया है कि अमेरिकी संसद में भारत के प्रति समर्थन व्यापक होने के बावजूद काफी हद तक सतही है। इसके अलावा सत्ताधारी खेमे के भीतर एक मुखर गुट लगातार विदेशी कामगारों के प्रवेश को सीमित करने की वकालत कर रहा है। कार्यकारी अधिकारों पर अंकुश लगाने की सीमाएं अगर मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी दोनों सदनों में बहुमत हासिल भी कर लेती है, तब भी वह राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियों को पूरी तरह पंगु नहीं बना सकती। राष्ट्रपति के पास विधायी प्रस्तावों को खारिज करने का वीटो अधिकार बना रहेगा, जबकि सीनेट की फिलिबस्टर व्यवस्था किसी भी कानून को आसानी से पास होने से रोकती है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने साफ किया है कि अगर विपक्षी दल प्रतिनिधि सभा जीत भी जाते हैं, तो भी वे आर्थिक एजेंडे को रोकने के लिए बहुत सीमित कदम ही उठा पाएंगे। नतीजतन, चुनावी नतीजों से संसदीय निगरानी भले तेज हो जाए, मगर व्यापारिक प्राथमिकताओं का रुख दोनों देशों के कूटनीतिक तालमेल पर ही निर्भर रहेगा। इसका आप पर असर अमेरिकी संसद के इस चुनाव से द्विपक्षीय व्यापार शुल्क और भारतीय तकनीकी पेशेवरों के लिए कार्य वीजा नियमों पर सीधा विधायी असर पड़ सकता है। • भारतीय आईटी पेशेवरों पर: H-1B वीजा की 1 लाख डॉलर फीस पर अदालती रोक बनी हुई है, लेकिन नई संसदीय संरचना से नियमों पर निगरानी बढ़ेगी। आवेदन करने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियरों और टेक कंपनियों को अदालती आदेशों और नए विधायी प्रस्तावों पर नजर रखनी होगी। • निर्यातकों और कारोबारियों पर: अमेरिका को माल भेजने वाले भारतीय व्यापारियों के लिए आयात शुल्क वर्तमान में 10 फीसदी के आधार स्तर पर बना हुआ है। संसद में गतिरोध बढ़ने के बावजूद द्विपक्षीय समझौते में देरी जारी रह सकती है। • द्विपक्षीय समझौतों पर: व्यापक व्यापार समझौते पर चर्चा अभी रुकी हुई है और निकट भविष्य में किसी बड़े करार की संभावना कम है। दोनों देशों के बीच कारोबार करने वाली कंपनियों को मौजूदा अंतरिम व्यवस्था के अनुसार ही अपनी योजनाएं बनानी होंगी। • नीतिगत बदलावों पर: राष्ट्रपति के पास वीटो का अधिकार रहने से किसी भी नीति में रातोंरात बदलाव नहीं देखा जाएगा। भारतीय उद्योग जगत को लंबे समय तक वाशिंगटन के राजनीतिक घटनाक्रम के साथ तालमेल बिठाना पड़ेगा। ऐसा क्यों हुआ यह राजनीतिक स्थिति राष्ट्रपति के दूसरे कार्यकाल के अंतिम 2 सालों में संसद के दोनों सदनों में बहुमत हासिल करने की होड़ और नीतियों पर निगरानी बढ़ाने की वजह से पैदा हुई है। • संसदीय सीटों पर चुनावी गणित: 3 नवंबर को निचले सदन की सभी 435 सीटों और सीनेट की 100 में से एक तिहाई सीटों पर मतदान हो रहा है। इस मुकाबले के नतीजे तय करेंगे कि प्रशासन के फैसलों पर विपक्षी दल किस हद तक अंकुश लगा पाएगा। • व्यापार और शुल्कों पर टकराव: आपातकालीन अधिकारों से लगाए गए 18 फीसदी शुल्कों को शीर्ष अदालत द्वारा रद्द किए जाने के बाद यह दर 10 फीसदी पर आ गई थी। विपक्षी दल राष्ट्रपति के एकतरफा शुल्क लगाने के तौर-तरीकों को संसद में चुनौती देना चाहते हैं। • आधिकारिक बातचीत का ठहराव: व्यापार वार्ताएं अभी किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी हैं और दोनों पक्षों ने प्रगति की सीमित संभावनाओं का संकेत दिया है। इसी पृष्ठभूमि में मध्यावधि चुनाव व्यापारिक कूटनीति की अगली दिशा तय करने का केंद्र बन गए हैं। सवाल-जवाब 1. अमेरिकी संसद के चुनाव कब आयोजित होने हैं? यह चुनाव 3 नवंबर को होने हैं, जिसमें प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 100 में से एक तिहाई सीटों पर मतदान होगा। 2. क्या चुनावी नतीजों से भारत-अमेरिका व्यापार पर फौरन असर पड़ेगा? नहीं, चुनावी नतीजों से व्यापार, शुल्कों या वहां काम कर रहे भारतीय पेशेवरों की स्थिति पर तुरंत कोई सीधा बदलाव नहीं होगा। 3. भारतीय सामानों पर इस समय कितना अमेरिकी आयात शुल्क लागू है? सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपातकालीन शुल्कों को रद्द किए जाने के बाद भारतीय सामानों पर शुल्क 18 फीसदी से घटकर 10 फीसदी के आधार स्तर पर आ गया है। 4. H-1B वीजा की प्रस्तावित फीस को लेकर अदालतों ने क्या फैसला दिया है? दो संघीय जजों ने प्रक्रियात्मक कमियों के आधार पर 1 लाख डॉलर की नई प्रस्तावित फीस को लागू करने पर अंतरिम रोक लगा रखी है। 5. क्या विपक्ष की जीत से राष्ट्रपति की शक्तियां पूरी तरह रुक जाएंगी? नहीं, राष्ट्रपति के पास वीटो का अधिकार बना रहेगा और सीनेट की फिलिबस्टर व्यवस्था के कारण विधायी बदलाव आसानी से नहीं किए जा सकेंगे। https://trendkia.com/business/us-snsada-ke-chunavi-natijon-se-india-snga-karobari-samikaranon-para-kya-parega-asara-54500 TrendKia — Har trend, sabse pehle.