# उत्तर प्रदेश की ओडीओपी योजना का हिस्सा बना बलिया का पारंपरिक सत्तू, अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंची मांग

> उत्तर प्रदेश के बलिया जिले का स्वादिष्ट और प्रोटीन से भरपूर सत्तू अब राज्य सरकार की ओडीओपी योजना में शामिल हो गया है। पारंपरिक गोसार भट्ठी में भूनकर तैयार होने वाले इस उत्पाद की मांग देश और विदेश में तेजी से बढ़ रही है।

**Type:** article · **Category:** व्यापार · **Published:** 2026-08-19 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/business/uttar-pradesh-ki-odiopi-yojana-ka-hissa-bana-ballia-ka-parnparika-sattu-antararashtriya-bajara-taka-pahunchi-manga-18261 · **Language:** Hindi
**Tags:** बलिया सत्तू, ओडीओपी योजना, उत्तर प्रदेश समाचार, पारंपरिक सत्तू, चने की खेती, प्रोटीन युक्त आहार, उत्तर प्रदेश कृषि

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले का पारंपरिक स्वादिष्ट सत्तू अब राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) योजना का हिस्सा बन गया है। अपनी बेहतरीन पौष्टिकता और लाजवाब स्वाद के लिए पहचाना जाने वाला यह उत्पाद अब केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश के साथ-साथ विदेशों में भी अपनी खास जगह बना रहा है। डॉक्टरों के अनुसार प्रोटीन से भरपूर होने के कारण स्वास्थ्य के लिहाज से भी इसका सेवन बहुत फायदेमंद माना जाता है। ODOP योजना में शामिल होने के बाद से बलिया का यह सत्तू हर तरफ चर्चा का केंद्र बना हुआ है और इससे क्षेत्र के विकास को एक नई दिशा मिल रही है।

## गांवों की पारंपरिक गोसार भट्ठी और चने की खेती
बलिया जिले में किसान व्यापक स्तर पर चने की खेती करते हैं। फसल पकने और खेत से चना निकलने के बाद इसे सत्तू में बदलने की प्रक्रिया पूरी तरह से पारंपरिक और सांस्कृतिक है। गांवों में आज भी सत्तू तैयार करने के लिए पुरानी गोसार यानी भट्ठी विधि का इस्तेमाल किया जाता है। ग्रामीण इलाकों में बनी इन गोसार भट्टियों पर महिलाएं एकत्र होती हैं और पारंपरिक लोकगीत गाते हुए चने तथा अन्य अनाजों को भूनने का काम करती हैं। भूनने के बाद इस भुने हुए चने को चक्की में पीसा जाता है, जिससे सत्तू तैयार होता है। इस पारंपरिक भट्ठी विधि से तैयार होने के कारण इस सत्तू का प्राकृतिक स्वाद और सुगंध बेहद खास और लाजवाब होती है, जो इसे आधुनिक मशीनी उत्पादों से बिल्कुल अलग बनाती है।

## ODOP योजना से मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान और व्यापारिक अवसर
सत्तू को ODOP योजना में जगह मिलने से बलिया के स्थानीय उत्पादकों और निवासियों के लिए उन्नति के नए दरवाजे खुल गए हैं। बलिया निवासी दीपक तिवारी का कहना है कि बलिया के सत्तू का अपना एक विशेष महत्व है, जो अब प्रदेश और देश के अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचाना जा रहा है। सरकार की इस पहल से इसे एक बड़ा मंच मिला है। देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से लोग बलिया के सत्तू की मांग कर रहे हैं और इसे मंगवा रहे हैं। इससे बलिया के लोगों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को सीधा लाभ पहुंच रहा है। ODOP में शामिल होने से आने वाले समय में सत्तू उद्योग का और अधिक विस्तार होगा तथा जिले के लोगों को रोजगार और व्यापार के भरपूर अवसर मिलेंगे।

## प्रोटीन का बेहतरीन स्रोत और सेवन के अलग-अलग तरीके
स्वास्थ्य और आहार विशेषज्ञ डॉक्टरों के अनुसार सत्तू शरीर को भरपूर मात्रा में प्रोटीन प्रदान करता है। बलिया निवासी मंटू कुमार बताते हैं कि सत्तू प्रोटीन का एक बहुत बढ़िया माध्यम है और यही वजह है कि यह देश-विदेश के लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। इसे भोजन में कई तरह से शामिल किया जा सकता है। लोग इसे सत्तू की लस्सी के रूप में पीते हैं या फिर सीधे पानी और नमक की मदद से गूंथकर अचार, हरी मिर्च और स्वादिष्ट चटनी के साथ खाते हैं। इसके अलावा सत्तू के सेवन से प्यास न लगने की समस्या भी दूर होती है और व्यक्ति को स्वाभाविक रूप से अच्छी प्यास लगती है। इस बढ़ती मांग के चलते बलिया जनपद में नए-नए व्यवसायिक रास्ते खुल रहे हैं।

## इसका आप पर असर
- **भारत में:** प्रोटीन से भरपूर इस पारंपरिक सुपरफूड की आसान उपलब्धता और शुद्धता से स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों को पौष्टिक आहार का बेहतर विकल्प मिलेगा।
- **उत्तर प्रदेश के बलिया में:** ओडीओपी योजना में शामिल होने से स्थानीय किसानों, सत्तू निर्माताओं और ग्रामीण महिलाओं के लिए नए रोजगार और व्यापार के अवसर विकसित होंगे।

## सवाल-जवाब

### 1. बलिया के सत्तू की मुख्य खासियत क्या है?
बलिया का सत्तू पारंपरिक तरीके से गांवों की गोसार भट्ठी में चने को भूनकर और चक्की में पीसकर बनाया जाता है, जिससे इसका स्वाद और सुगंध लाजवाब होती है।

### 2. बलिया का सत्तू किस सरकारी योजना में शामिल किया गया है?
इसे उत्तर प्रदेश सरकार की वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) योजना में शामिल किया गया है।

### 3. सत्तू तैयार करने की पारंपरिक ग्रामीण प्रक्रिया क्या है?
खेत से चना निकलने के बाद गांवों में महिलाएं गोसार भट्ठी के पास लोकगीत गाते हुए चने को भूनती हैं और बाद में इसे चक्की में पीसा जाता है।

### 4. स्वास्थ्य के लिहाज से डॉक्टरों की सत्तू के बारे में क्या राय है?
डॉक्टरों के अनुसार सत्तू का सेवन करने से शरीर को भरपूर मात्रा में प्रोटीन मिलता है।

### 5. सत्तू का सेवन किन-किन तरीकों से किया जा सकता है?
सत्तू की लस्सी बनाकर पी जा सकती है या इसे पानी और नमक से गूंथकर अचार, हरी मिर्च और चटनी के साथ खाया जा सकता है।

### 6. ODOP योजना में शामिल होने से बलिया को क्या फायदा हो रहा है?
सत्तू की मांग देश और विदेश में बढ़ने से बलिया में व्यापार और स्वरोजगार के नए रास्ते खुल रहे हैं।

## प्रेरणा और सबक
- **पारंपरिक ज्ञान का सम्मान:** ग्रामीण क्षेत्रों की पुरानी गोसार भट्ठी तकनीक और हाथ की चक्की से तैयार उत्पाद भी आधुनिक बाजार में अपनी खास पहचान बना सकते हैं।
- **सामूहिक भागीदारी की ताकत:** चने की भनाई के दौरान महिलाओं के लोकगीतों जैसी सांस्कृतिक परंपराएं स्थानीय उद्योगों को सामाजिक और आर्थिक मजबूती देती हैं।
- **सरकारी योजनाओं का लाभ:** ओडीओपी जैसी पहलों से जुड़कर छोटे और ग्रामीण उद्योगों को वैश्विक स्तर पर ब्रांडिंग और पहचान मिल सकती है।
- **स्वास्थ्य और उपयोगिता पर ध्यान:** प्राकृतिक और प्रोटीन युक्त पौष्टिक विकल्पों पर ध्यान केंद्रित करके स्थानीय उत्पाद बड़े बाजारों को आकर्षित कर सकते हैं।

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