उत्तर प्रदेश के लखीमपुर में आकार ले रहा देश का पहला इंटीग्रेटेड बायोप्लास्टिक प्लांट, हजारों करोड़ के निवेश से बदलेंगी स्थानीय तस्वीरें लखीमपुर खीरी जिले के कुंभी में देश का पहला इंटीग्रेटेड बायोप्लास्टिक प्लांट 3080 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से तैयार हो रहा है। इस परियोजना के जरिए न सिर्फ स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए द्वार खुलेंगे, बल्कि कृषि अवशेषों के सही इस्तेमाल से पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती मिलेगी। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के कुंभी क्षेत्र में देश के पहले इंटीग्रेटेड बायोप्लास्टिक प्लांट का निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है और अब यह अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। लगभग 3080 करोड़ रुपये की लागत से आकार ले रही इस महत्वाकांक्षी परियोजना के धरातल पर उतरने से इलाके के युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के अनगिनत नए अवसर पैदा होने की पूरी उम्मीद है। इसके अलावा, इस मुख्य प्लांट के आसपास 100 से अधिक छोटी सहायक फैक्ट्रियों को स्थापित करने की भी रूपरेखा तैयार की गई है, जिनमें बायोप्लास्टिक के जरिए तमाम प्रकार की उपयोगी दैनिक वस्तुएं निर्मित की जाएंगी। इस बड़े कदम से पूरे जिले में औद्योगिक विकास की गति को एक नई रफ्तार मिलने की मजबूत संभावना जताई जा रही है। परियोजना की नींव और भूमि अधिग्रहण की स्थिति कुंभी स्थित बलरामपुर चीनी मिल की इकाई परिसर में इस वृहद परियोजना की आधारशिला फरवरी 2025 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा रखी गई थी। यह पूरा बायोप्लास्टिक प्लांट लगभग 200 एकड़ के विशाल भूभाग पर स्थापित किया जाना तय हुआ है। प्रशासनिक और प्रबंधन स्तर पर अब तक करीब 135 एकड़ जमीन को सफलतापूर्वक चिन्हित किया जा चुका है, जबकि बाकी बची हुई भूमि की व्यवस्था करने की प्रक्रिया पर लगातार काम चल रहा है। इस शानदार परियोजना के शुरू हो जाने से इस कृषि प्रधान क्षेत्र में खेती से जुड़े उद्योगों और एग्रो-बेस्ड बिजनेस के विकास की संभावनाएं कई गुना बढ़ जाएंगी। युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार की बहार कुंभी चीनी मिल के यूनिट हेड डॉ. सुनील यादव ने इस संबंध में जानकारी साझा करते हुए बताया कि इस आधुनिक बायोप्लास्टिक प्लांट के चालू होने से स्थानीय युवाओं को आगे बढ़ने के अभूतपूर्व अवसर प्राप्त होंगे। मुख्य प्लांट के इर्द-गिर्द 100 से ज्यादा छोटी औद्योगिक इकाइयों को बसाने की योजना है, जहां बोतलों, गिलासों, सिंगल यूज कप-प्लेटों, खिलौनों, कपड़ों, कैरी बैग और रोजमर्रा के काम आने वाली अन्य वस्तुओं का उत्पादन किया जाएगा। उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि आईटीआई और विभिन्न डिप्लोमा पाठ्यक्रम पास कर चुके युवाओं को विशेष प्रशिक्षण के माध्यम से इस उद्योग से सीधे तौर पर जोड़ा जाएगा। युवा इन छोटी इकाइयों में कप-प्लेट और खिलौने जैसे उत्पाद बनाने की कला सीखकर अपना खुद का स्टार्टअप या बिजनेस भी खड़ा कर सकते हैं। इससे वे न केवल खुद आत्मानिर्भर बन सकेंगे, बल्कि अन्य लोगों को भी रोजगार मुहैया कराने में सक्षम होंगे। इन छोटी फैक्टरियों के लगने से स्थानीय स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग और कमर्शियल गतिविधियों को बड़ा प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है। कृषि अवशेषों और पराली प्रबंधन का अनूठा समाधान इस अनूठे बायोप्लास्टिक प्लांट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें ऊर्जा और ईंधन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए गन्ने की खोई, धान की पराली, गन्ने की हरी पत्तियों और अन्य कृषि अवशेषों का प्रभावी इस्तेमाल किया जाएगा। लखीमपुर खीरी क्षेत्र में धान और गन्ने की बंपर पैदावार होती है, जिसके कारण यहां फसल अवशेषों के वैज्ञानिक और बेहतर प्रबंधन के लिए अपार संभावनाएं मौजूद हैं। आमतौर पर धान की कटाई के बाद किसान खेतों में बची हुई पराली को आग के हवाले कर देते हैं, जिससे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है और प्रदूषण फैलता है। ऐसे में यदि इन कृषि अवशेषों की सही तरीके से खरीद और ढुलाई की व्यवस्था सुनिश्चित कर दी जाए, तो किसानों को अपनी पराली बेचने का एक ठोस और लाभकारी विकल्प मिल जाएगा। इससे पर्यावरण को दूषित करने वाली पराली जलाने की गंभीर समस्या से निपटने में भी बहुत बड़ी मदद मिलेगी। जिले के औद्योगिक नक्शे पर एक ऐतिहासिक मील का पत्थर कुंभी में स्थापित हो रहा यह मेगा बायोप्लास्टिक प्लांट लखीमपुर जिले के औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन और कृषि कचरे के सदुपयोग की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है। इसके पूरी तरह से क्रियाशील होने के बाद क्षेत्रीय युवाओं को स्किल ट्रेनिंग, जॉब्स और बिजनेस वेंचर्स शुरू करने के बेहतरीन मौके मिलेंगे। वहीं दूसरी तरफ, सहायक लघु उद्योगों के लगने से स्थानीय स्तर पर फिनिश गुड्स के उत्पादन में जबरदस्त इजाफा होगा। फिलहाल पूरे इलाके की निगाहें इस प्लांट के निर्माण कार्य के पूर्ण होने और कमर्शियल उत्पादन के शुभारंभ पर टिकी हुई हैं। इसका आप पर असर इस मेगा प्रोजेक्ट के शुरू होने से राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण-अनुकूल प्लास्टिक विकल्पों के उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय स्तर पर अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। • भारत में: कृषि अवशेषों के व्यावसायिक उपयोग से देश भर में पराली जलाने की समस्या का एक ठोस और व्यावहारिक विकल्प मिलेगा। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में यह एक बड़ा कदम साबित होगा। • लखीमपुर खीरी में: कुंभी और आसपास के ग्रामीण इलाकों के युवाओं को प्लांट और सहायक फैक्ट्रियों में स्थानीय स्तर पर रोजगार व स्वरोजगार के सीधे अवसर मिलेंगे। इससे क्षेत्र की आर्थिकी में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया जाएगा। ऐसा क्यों हुआ देश के पहले इंटीग्रेटेड बायोप्लास्टिक प्लांट की स्थापना के पीछे कृषि कचरे का सही उपयोग और पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की बढ़ती मांग मुख्य वजह है। • परियोजना की शुरुआत: गन्ने और धान के प्रचुर उत्पादन वाले लखीमपुर क्षेत्र में कृषि अवशेषों के वैज्ञानिक प्रबंधन की जरूरत ने इस मेगा प्लांट के आइडिया को जन्म दिया। • सरकारी नीति और निवेश: सरकार द्वारा पर्यावरण के अनुकूल उद्योगों को बढ़ावा देने की नीतियों के तहत बलरामपुर चीनी मिल ने इस 3080 करोड़ रुपये की भारी परियोजना का खाका तैयार किया। • औद्योगिक विस्तार: ग्रामीण और अर्ध-शहरी युवाओं को अपने ही क्षेत्र में रोजगार मुहैया कराने के उद्देश्य से इस प्लांट के साथ छोटी सहायक इकाइयों का मॉडल जोड़ा गया है। सवाल-जवाब 1. लखीमपुर में बन रहे बायोप्लास्टिक प्लांट की कुल लागत कितनी है? इस प्लांट के निर्माण पर लगभग 3080 करोड़ रुपये की लागत आ रही है। 2. इस परियोजना की आधारशिला किसने और कब रखी थी? इस परियोजना की आधारशिला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा फरवरी 2025 में रखी गई थी। 3. यह प्लांट कुल कितनी जमीन पर स्थापित किया जा रहा है? यह प्लांट लगभग 200 एकड़ भूमि पर स्थापित किया जा रहा है, जिसमें से करीब 135 एकड़ जमीन चिन्हित हो चुकी है। 4. प्लांट में ईंधन के रूप में किन चीजों का इस्तेमाल होगा? इसमें गन्ने की खोई, धान की पराली, गन्ने की पत्तियों और अन्य फसलों के अवशेषों का इस्तेमाल ईंधन के रूप में किया जाएगा। 5. कुंभी चीनी मिल के यूनिट हेड कौन हैं? कुंभी चीनी मिल के यूनिट हेड डॉ. सुनील यादव हैं। https://trendkia.com/business/uttara-pradesha-ke-lakhimpur-men-akara-le-raha-desha-ka-pahala-integrated-bioplastic-plant-51885 TrendKia — Har trend, sabse pehle.