वैश्विक अनिश्चितता के दौर में घरेलू क्षमता और शोध निवेश बढ़ाए भारत, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सुझाया रोडमैप वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि वैश्विक अनिश्चितता अब एक स्थायी हकीकत बन चुकी है, इसलिए भारत को दुनिया के हालात सुधरने का इंतजार करने के बजाय अपनी आर्थिक मजबूती, आपूर्ति श्रृंखला और निजी क्षेत्र के शोध निवेश पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी आर्थिक उतार-चढ़ाव और अनिश्चितताओं के बीच भारत को बाहरी परिस्थितियों के सामान्य होने का इंतजार किए बिना अपनी नीतियां खुद तय करनी होंगी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया है कि दुनिया भर में आर्थिक अस्थिरता अब किसी अल्पकालिक संकट की तरह नहीं, बल्कि एक स्थायी स्थिति के रूप में स्थापित हो चुकी है। ऐसे माहौल में देश को ऐसी नीतियां तैयार करनी होंगी जो घरेलू स्तर पर आर्थिक मजबूती को लगातार बढ़ाती रहें। इसके साथ ही उन्होंने वैश्विक स्तर पर खुले, पारदर्शी और भरोसेमंद आर्थिक रिश्तों को बनाए रखने की अहमियत पर भी बल दिया। भविष्य के आर्थिक झटकों से निपटने के लिए चार प्रमुख प्राथमिकताएं वित्त मंत्री ने आने वाले दशक में संभावित वैश्विक आर्थिक दबावों और झटकों का सामना करने के लिए चार मुख्य प्राथमिकताओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देश को मजबूत और लचीली आपूर्ति श्रृंखलाएं तैयार करने पर ध्यान देना होगा, जिससे आत्मनिर्भरता का दायरा व्यापक हो सके। इसके अलावा अब वह समय आ चुका है जब निजी क्षेत्र को केवल पारंपरिक व्यापार तक सीमित न रहकर अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) तथा बड़े पूंजीगत निवेश की अगुवाई करनी चाहिए। काम करने के तौर-तरीकों में तेजी से आ रहे बदलावों को देखते हुए कार्यबल के कौशल विकास और प्रशिक्षण में भी उद्योगों को आगे बढ़कर अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी, ताकि मौजूदा आर्थिक चुनौतियों का मुकाबला एक मजबूत रणनीति से किया जा सके। नियम आधारित वैश्विक व्यापार और भू-राजनीतिक मतभेदों से बचाव वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिति पर चर्चा करते हुए निर्मला सीतारमण ने रेखांकित किया कि आर्थिक नीतियों का निर्माण इस हकीकत को स्वीकार करके ही किया जाना चाहिए कि अनिश्चितता लंबे समय तक बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि आर्थिक मजबूती का निर्माण कोई एक बार किया जाने वाला काम नहीं है, बल्कि यह निरंतर चलने वाली सतत प्रक्रिया है। आने वाले वर्षों के जोखिमों से निपटने के लिए भारत लगातार खुद को तैयार कर रहा है। आज के समय में खुले, पारदर्शी और नियम आधारित वैश्विक आर्थिक संबंध बेहद जरूरी हैं। सभी देशों को आपसी बातचीत और विचार-विमर्श से बने समझौतों के जरिए जुड़ना चाहिए, न कि अपने भू-राजनीतिक विवादों और मतभेदों को व्यापार तथा निवेश के रास्ते में रुकावट बनने देना चाहिए। व्यापार नीतियों में निश्चितता और गैर-जरूरी पाबंदियों पर रोक अंतरराष्ट्रीय व्यापार के संदर्भ में वित्त मंत्री ने कहा कि वैश्विक व्यापार नीतियों में व्यवसायों के लिए अधिक निश्चितता और स्थिरता होनी चाहिए। हर देश की अपनी विकास प्राथमिकताओं का सम्मान किया जाना आवश्यक है और ऐसे किसी भी अनावश्यक प्रतिबंध से बचना चाहिए जो वैश्विक बाजारों को खंडित या विभाजित करते हों। जब वैश्विक बाजार सुचारू रूप से कार्य करेंगे, तभी देशों की व्यापारिक गतिविधियों को गति मिल सकेगी। आरएंडडी खर्च में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता देश में अनुसंधान और विकास की स्थिति का ब्योरा देते हुए वित्त मंत्री ने आंकड़ों का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि भारत में अनुसंधान एवं विकास पर होने वाला कुल खर्च देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल 0.83 फीसदी है, जबकि आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के सदस्य देशों में यह औसत 2.7 फीसदी तक पहुंचता है। इसके अलावा भारत के कुल आरएंडडी खर्च में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी महज 36 फीसदी ही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आने वाले समय में देश की वास्तविक मजबूती की परीक्षा इसी बात से तय होगी कि वह बाहरी आर्थिक झटकों से अपने घरेलू परिवारों और स्थानीय कारोबारी तंत्र को कितना सुरक्षित रख पाता है। इसका आप पर असर वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बीच घरेलू विनिर्माण, कौशल विकास और शोध पर जोर देने से भारतीय उद्योगों और कामगारों के लिए दीर्घकालिक स्थिरता बढ़ेगी। • भारतीय उद्योगों के लिए: निजी कंपनियों को शोध और नवाचार पर निवेश बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इसका सीधा मतलब है कि कॉर्पोरेट जगत को वैश्विक झटकों से बचने के लिए घरेलू स्तर पर नई तकनीक और मजबूत सप्लाई चेन विकसित करनी होगी। • रोजगार और कार्यबल पर: बदलते तकनीकी दौर में उद्योग आधारित कौशल प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इससे नौकरी तलाश रहे युवाओं और मौजूदा कर्मचारियों को आधुनिक औद्योगिक जरूरतों के अनुसार खुद को ढालने का अवसर मिलेगा। • आम परिवारों की सुरक्षा: नीतियों का प्राथमिक उद्देश्य घरेलू अर्थव्यवस्था को बाहरी मंदी और महंगाई के झटकों से सुरक्षित रखना है। यदि घरेलू उत्पादन और सप्लाई चेन मजबूत रहेगी, तो आवश्यक वस्तुओं की कीमतों और आम लोगों की आमदनी पर वैश्विक उथल-पुथल का कम असर पड़ेगा। • वैश्विक व्यापार और निवेशकों के लिए: नियम आधारित व्यापार और पाबंदियों से मुक्त नीतियों की वकालत से अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को स्थिरता का संदेश मिलता है। इसके चलते भारत में दीर्घकालिक निवेश और विदेशी साझेदारियों के अवसर बढ़ सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ वैश्विक स्तर पर लगातार जारी आर्थिक अस्थिरता, भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ते संरक्षणवाद के कारण भारत को अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव करना पड़ रहा है। बाहरी कारकों पर अत्यधिक निर्भरता से घरेलू अर्थव्यवस्था को नुकसान होने का जोखिम बना रहता है। • स्थायी वैश्विक अनिश्चितता: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक मंदी, भू-राजनीतिक विवाद और व्यापारिक प्रतिबंधों ने अनिश्चितता को एक निरंतर स्थिति बना दिया है। इसी कारण नीति निर्माताओं को अब बाहरी परिस्थितियों के सुधरने का इंतजार करने के बजाय घरेलू स्तर पर बचाव तंत्र मजबूत करना पड़ रहा है। • सप्लाई चेन में व्यवधान: दुनिया भर में बढ़ते विवादों और व्यापारिक पाबंदियों ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को खंडित कर दिया है। इससे सबक लेते हुए भारत ने आत्मनिर्भरता और स्थानीय उत्पादन को सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल किया है। • निजी शोध निवेश में कमी: भारत में अनुसंधान एवं विकास पर कुल खर्च जीडीपी का केवल 0.83 फीसदी है, जिसमें निजी क्षेत्र का योगदान मात्र 36 फीसदी है। आर्थिक प्रतिस्पर्धा में आगे रहने और ओईसीडी देशों के 2.7 फीसदी के स्तर के करीब पहुंचने के लिए यह बदलाव अनिवार्य माना जा रहा है। सवाल-जवाब 1. वित्त मंत्री के अनुसार वैश्विक अनिश्चितता को लेकर क्या स्थिति है? वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता अब कोई अस्थायी दौर नहीं बल्कि एक स्थायी स्थिति बन चुकी है। 2. अगले दशक के लिए भारत की प्राथमिकताओं में क्या शामिल है? प्राथमिकताओं में आत्मनिर्भर आपूर्ति श्रृंखलाएं बनाना, निजी क्षेत्र का आरएंडडी और निवेश में नेतृत्व तथा कार्यबल का कौशल विकास शामिल हैं। 3. भारत अपनी जीडीपी का कितना हिस्सा अनुसंधान एवं विकास पर खर्च करता है? भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.83 फीसदी अनुसंधान एवं विकास पर खर्च करता है। 4. ओईसीडी देशों में अनुसंधान एवं विकास पर खर्च का औसत क्या है? आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के देशों में अनुसंधान एवं विकास पर खर्च का औसत जीडीपी का 2.7 फीसदी है। 5. भारत के कुल आरएंडडी खर्च में निजी क्षेत्र का कितना योगदान है? भारत में होने वाले कुल अनुसंधान एवं विकास खर्च में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी केवल 36 फीसदी है। 6. अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लेकर वित्त मंत्री ने क्या सुझाव दिया? उन्होंने खुले, नियम आधारित व्यापार, देशों की विकास प्राथमिकताओं के सम्मान और भू-राजनीतिक मतभेदों को कारोबार में बाधा न बनने देने का सुझाव दिया। https://trendkia.com/business/vaishvika-anishchitata-ke-daura-men-gharelu-kshamata-aura-shodha-nivesha-barhae-india-vitta-mntri-nirmala-sitharaman-ne-sujhaya-ro-42460 TrendKia — Har trend, sabse pehle.