आंगनवाड़ी सेविकाएं देश की सबसे अहम पहली गुरु, बच्चों के शुरुआती विकास में इनकी भूमिका शिक्षक दिवस के अवसर पर आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के योगदान और उनकी असली पहचान पर विशेष चर्चा। शिक्षक दिवस नजदीक आते ही अक्सर क्लासरूम, चॉक और ब्लैकबोर्ड की तस्वीरें जेहन में उतर आती हैं। हम सभी अपने पुराने गुरुओं को याद करते हैं और उनके मार्गदर्शन के लिए आभार जताते हैं। हालांकि इस पूरी रौनक के बीच एक ऐसा विशाल और समर्पित वर्ग भी मौजूद है, जो बिना किसी बड़े मंच या मेडल की उम्मीद के देश के करोड़ों नन्हीं जानों की शुरुआती नींव को मजबूत करने में जुटा हुआ है। ये और कोई नहीं बल्कि हमारी अपनी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं, जो ग्रामीण इलाकों की धूल भरी गलियों से लेकर शहरी तंग बस्तियों तक तीन से छह साल की उम्र के बच्चों का हाथ पकड़कर उन्हें इस बड़ी दुनिया से रूबरू कराती हैं। ये महिलाएं केवल पोषाहार बांटने तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि बच्चों को कहानियां सुनाकर और खेल-खेल में उन्हें जीवन के शुरुआती सबक भी पढ़ाती हैं। इसके बावजूद हमारा समाज और प्रशासनिक ढांचा इन्हें एक वास्तविक शिक्षक के रूप में देखने के बजाय केवल एक वर्कर के तौर पर ही आंकता है। इसी विषय पर 'एकस्टेप फाउंडेशन' की चीफ ऑफ पॉलिसी एंड पार्टनरशिप्स दीपिका मोगिलिशेट्टी ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को विधिवत शिक्षक का दर्जा दिए जाने की पुरजोर वकालत की है। प्रशासनिक बोझ बनाम बच्चों की शिक्षा जब तक हम इन कार्यकर्ताओं को महज कागजी और प्रशासनिक कामकाज संभालने वाला कर्मचारी मानते रहेंगे, तब तक देश के प्रारंभिक बाल विकास की इस सबसे मजबूत और अहम कड़ी की उपेक्षा होती रहेगी। इसलिए अब यह बेहद जरूरी हो गया है कि उनके रोजाना किए जाने वाले कामों की तह में जाकर उनकी असली अहमियत को समझा जाए। अमूमन एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की सुबह इस मानसिक कसमकस में कटती है कि वह बच्चों के बीच बैठकर उन्हें कोई रोचक कहानी सुनाए या फिर दफ्तर के लिए जरूरी रजिस्टर पूरे करे। उपस्थिति दर्ज करने, न्यूट्रिशन ट्रैकर अपडेट करने, राशन का हिसाब रखने और अनगिनत रिपोर्ट तैयार करने के चक्कर में कई बार वह बहुमूल्य समय निकल जाता है जो बच्चों के मानसिक और बौद्धिक विकास के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होता है। तमाम कागजी दबावों के बाद भी जब वह सारे रजिस्टर किनारे रखकर बच्चों के बीच गोल घेरे में बैठती है, तभी असल और प्रभावी शिक्षण की वास्तविक शुरुआत होती है। रटने की बजाय क्षमताएं पहचानना अधिकांश औपचारिक स्कूलों में छोटे बच्चों का मूल्यांकन इस बात पर होता है कि उन्हें कितनी चीजें याद हैं और वे क्या जानते हैं। इसके विपरीत आंगनवाड़ी सेविका का तरीका बिल्कुल जुदा और मानवीय होता है। बिजली चले जाने पर बच्चों के साथ मिलकर पानी का कोई मजेदार खेल आयोजित करना हो या किसी सहमे हुए नए बच्चे को बाकी समूह के साथ घुलने-मिलने में मदद करना हो, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कभी भी बच्चे की कमियां नहीं गिनती बल्कि उसकी छुपी हुई क्षमताओं को तराशती है। किसी बच्चे को पूरी तरह सुरक्षित महसूस कराना और उसके भीतर कुछ नया सीखने की बेताबी जगाना ही सबसे बेहतरीन शिक्षण शास्त्र यानी पेडागोजी है। भारत का यह आंगनवाड़ी नेटवर्क दुनिया भर के सबसे विशाल सार्वजनिक तंत्रों में से एक शुमार किया जाता है, जिसके तहत करीब 14 लाख केंद्र देश के सबसे दूरदराज के कोनों, आदिवासी अंचलों और पिछड़ी बस्तियों तक अपनी पहुंच बनाए हुए हैं। अपनत्व और भरोसे का मजबूत ताना-बाना इस पूरे तंत्र की सबसे बड़ी ताकत इसका अपनापन और मानवीय स्पर्श है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता बच्चे के पूरे परिवार, उसके घर के घरेलू माहौल और उसकी मातृभाषा से बहुत अच्छी तरह वाकिफ होती है। बेंगलुरु के कोडाथी गेट केंद्र का उदाहरण हमारे सामने है, जहां एक सुरक्षित माहौल, बच्चों के अनुकूल खिलौनों और दिलचस्प कहानियों के दम पर बच्चों की उपस्थिति महज 12 से बढ़कर 40 के आंकड़े को पार कर गई। जब बच्चों के माता-पिता को यह पक्का भरोसा हो जाता है कि उनका जिगर का टुकड़ा पूरी तरह सुरक्षित हाथों में है, तो वे बिना किसी हिचकिचाहट के उन्हें केंद्र भेजने लगते हैं। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा और 'पोषण भी, पढ़ाई भी' जैसे कई सरकारी अभियान अब शुरुआती शिक्षा और खेल-आधारित शिक्षण पर खास जोर दे रहे हैं, जिससे नीतियां तो तेजी से बदलती दिख रही हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारी सामाजिक सोच में कोई बदलाव आया है? बदलाव के लिए उठाने होंगे ठोस कदम मसला केवल इतना नहीं है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का पद बदलकर उसे औपचारिक रूप से शिक्षक घोषित कर दिया जाए, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या हम वाकई उन्हें उसी नजरिए से देखते हैं। क्या हम उनके गाए हुए गीतों के पीछे छुपे गहरे मनोवैज्ञानिक शिक्षण को समझ पाते हैं? क्या हम एक रोते-बिलखते बच्चे को चुप कराने और संभालने में उनकी तरफ से की जाने वाली भावनात्मक मेहनत को पहचानते हैं? यदि हम उन्हें सच्चे दिल से शिक्षक का दर्जा देना चाहते हैं, तो केवल नाम बदलने भर से काम नहीं चलेगा बल्कि कुछ व्यावहारिक और कड़े कदम उठाने की जरूरत है। सबसे पहले उनके कंधों पर लदे कागजी बोझ को काफी हद तक सीमित किया जाना चाहिए ताकि वे बच्चों को अपना अधिकतम समय दे सकें। इसके साथ ही उन्हें आधुनिक टीचिंग-लर्निंग मटीरियल और नियमित ट्रेनिंग दी जानी चाहिए, और उनकी बड़ी जिम्मेदारी के मुताबिक ही उनका मानदेय व सुविधाएं तय होनी चाहिए। शिक्षक दिवस सिर्फ उन लोगों का आभार जताने का दिन नहीं है जिन्हें हम बरसों से शिक्षक मानते आए हैं, बल्कि यह उन गुमनाम चेहरों को भी सम्मान देने का दिन है जो निस्वार्थ भाव से देश की नींव को गढ़ रहे हैं। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता किसी भी बच्चे के जीवन में उसके घर-परिवार के दायरे से बाहर निकलने पर मिलने वाला पहला सबसे भरोसेमंद वयस्क होती है। जब हम उनके इस अनथक काम को गहराई से देखना शुरू कर देंगे, तो शिक्षक शब्द उनके लिए कोई प्रशासनिक प्रमोशन नहीं बल्कि उनके असली हक का वाजिब सम्मान बन जाएगा। इसका आप पर असर आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को मिलने वाले सम्मान और प्रशासनिक बोझ से जुड़ी यह चर्चा देश के करोड़ों परिवारों और उनके नौनिहालों के भविष्य पर सीधा असर डालती है। • भारत में: देश भर के ग्रामीण और शहरी आंगनवाड़ी केंद्रों पर पढ़ने वाले बच्चों की शुरुआती शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है। कागजी काम कम होने से कार्यकर्ताओं का पूरा ध्यान बच्चों के मानसिक और बौद्धिक विकास पर केंद्रित रहेगा। • स्थानीय स्तर पर: हर राज्य की बस्तियों और गांवों में संचालित होने वाले इन केंद्रों पर बच्चों की उपस्थिति बढ़ने से माता-पिता को सुरक्षित और भरोसेमंद शुरुआती चाइल्ड केयर की सुविधा मिलेगी। सवाल-जवाब 1. आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की मुख्य जिम्मेदारी क्या होती है? वे 3 से 6 साल के बच्चों को शुरुआती शिक्षा देने के साथ-साथ पोषाहार वितरण और उनके देखभाल का काम करती हैं। 2. बच्चों की शुरुआती शिक्षा में उनके सामने सबसे बड़ी बाधा क्या है? अटेंडेंस और न्यूट्रिशन ट्रैकर जैसे भारी प्रशासनिक और कागजी काम उनके शिक्षण समय को कम कर देते हैं। 3. बेंगलुरु के कोडाथी गेट केंद्र का उदाहरण क्या दर्शाता है? सुरक्षित माहौल और रोचक कहानियों के दम पर वहां बच्चों की उपस्थिति 12 से बढ़कर 40 से अधिक हो गई। 4. दीपिका मोगिलिशेट्टी किस संस्थान से जुड़ी हैं? वह 'एकस्टेप फाउंडेशन' में चीफ ऑफ पॉलिसी एंड पार्टनरशिप्स के पद पर कार्यरत हैं। प्रेरणा और सबक आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का यह समर्पण और संघर्ष देश के हर नागरिक को बच्चों की शुरुआती नींव मजबूत करने के महत्व का पाठ पढ़ाता है। • निस्वार्थ सेवा की ताकत: बिना किसी बड़े मंच या मेडल की चाह के लगातार काम करते रहना सबसे बड़ी प्रेरणा है। • भावनात्मक जुड़ाव का महत्व: बच्चों को सिखाने के लिएतालीम से ज्यादा अपनापन और सुरक्षित माहौल जरूरी होता है। • क्षमता को पहचानना: बच्चों की कमियां गिनने के बजाय उनकी छिपी हुई खूबियों को तराशना ही सच्ची शिक्षा है। https://trendkia.com/career/anganavari-sevikaen-desha-ki-sabase-ahama-pahali-guru-bachchon-ke-shuruati-vikasa-men-inaki-bhumika-27766 TrendKia — Har trend, sabse pehle.