# बीटेक दाखिलों में कोर विषयों से किनारा, शीर्ष संस्थानों में खाली रह रहीं सीटें

> जेईई काउंसलिंग और संस्थान स्तर के प्रवेश आंकड़ों से पता चलता है कि छात्र अब पारंपरिक इंजीनियरिंग विषयों के बजाय टेक केंद्रित क्षेत्रों को प्राथमिकता दे रहे हैं। सिविल, मेटलर्जी और टेक्सटाइल जैसी शाखाओं में शीर्ष रैंकर्स की दिलचस्पी लगातार घट रही है।

**Type:** article · **Category:** करियर · **Published:** 2026-10-04 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/career/btech-dakhilon-men-kora-vishayon-se-kinara-shirsha-snsthanon-men-khali-raha-rahin-siten-42636 · **Language:** Hindi
**Tags:** इंजीनियरिंग प्रवेश, जेईई काउंसलिंग, बीटेक कोर्स, सिविल इंजीनियरिंग, करियर विकल्प, आईआईटी दाखिले

कक्षा बारहवीं की बोर्ड परीक्षाएं पूरी होते ही देश भर के लाखों छात्र उच्च शिक्षा के विकल्पों की तलाश में जुट जाते हैं। एक समय ऐसा था जब इंजीनियरिंग शिक्षा का आधार कंप्यूटर साइंस तक सीमित नहीं था, बल्कि सिविल, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल जैसी शाखाएं पूरे तकनीकी तंत्र की रीढ़ मानी जाती थीं। इन पारंपरिक बीटेक डिग्रियों को सुरक्षित सरकारी नौकरी और बेहतर वेतन की पक्की गारंटी समझा जाता था। हालांकि बदलते वक्त, तेजी से विकसित होती तकनीक और उद्योग की नई प्राथमिकताओं के बीच इन शाखाओं का आकर्षण अब काफी कमजोर पड़ चुका है।

वर्तमान समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस और कोडिंग से जुड़े क्षेत्रों का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। तकनीकी संस्थानों की प्रवेश प्रक्रियाओं और जेईई काउंसलिंग के आंकड़ों से यह स्पष्ट संकेत मिल रहा है कि युवा पीढ़ी ऐसे पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने से बच रही है जहां रोजगार की संभावनाएं सीमित हैं और शुरुआती संघर्ष अत्यधिक है। देश के शीर्ष आईआईटी संस्थानों में भी छात्रों की पसंद में बड़ा बदलाव दर्ज किया गया है, जहां कई पुरानी इंजीनियरिंग शाखाएं अब प्राथमिक विकल्पों से बाहर हो चुकी हैं।

## सिविल इंजीनियरिंग में घटता छात्रों का रुझान
बुनियादी ढांचे और बड़े निर्माण कार्यों की पहचान रही सिविल इंजीनियरिंग अब प्रवेश सूचियों में अपनी पुरानी स्थिति खो चुकी है। प्रतियोगी परीक्षाओं में शीर्ष स्थान हासिल करने वाले उम्मीदवार अब इस शाखा को अपनी पहली प्राथमिकताओं में शामिल नहीं कर रहे हैं। इस बदलाव के पीछे निर्माण परियोजनाओं पर शुरुआती दौर में होने वाला कठिन जमीनी काम और उसके मुकाबले मिलने वाला कम शुरुआती वेतन पैकेज मुख्य वजह बनकर उभरा है। इसके साथ ही निजी क्षेत्र में लंबे समय तक नौकरी की स्थिरता की कमी और कठिन कार्य परिस्थितियां भी छात्रों को इस क्षेत्र से दूर कर रही हैं।

## मेटलर्जी और मटीरियल साइंस के प्रति बदलती सोच
धातु विज्ञान और मटीरियल साइंस इंजीनियरिंग का इतिहास बेहद समृद्ध रहा है। एक दौर में इस्पात कारखानों, भारी मशीनरी और निर्माण इकाइयों में इस विषय के विशेषज्ञों की व्यापक मांग रहती थी। औद्योगिक विस्तार के दौर में इन पेशेवरों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया जाता था। इसके बावजूद आज के युवा सॉफ्टवेयर और आईटी उद्योग की सुगमता की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं। प्रयोगशालाओं में गहन शोध कार्य, सीमित औद्योगिक अवसर और कोर कंपनियों में वेतन वृद्धि की धीमी गति के कारण उच्च रैंक हासिल करने वाले छात्र इस शाखा को अपनी वरीयता सूची में सबसे नीचे रख रहे हैं।

## कपड़ा उद्योग और टेक्सटाइल इंजीनियरिंग की चुनौतियां
टेक्सटाइल उद्योग भारत के सबसे पारंपरिक और व्यापक रोजगार देने वाले क्षेत्रों में शामिल रहा है। इस उद्योग को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के लिए टेक्सटाइल इंजीनियरिंग की शुरुआत की गई थी, जिसने लंबे समय तक विनिर्माण क्षेत्र को तकनीकी सहयोग दिया। आधुनिक समय के छात्रों के बीच यह पाठ्यक्रम अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने में चुनौतियों का सामना कर रहा है। तकनीक के इस युग में युवा रोबोटिक्स, कोडिंग और ऑटोमेशन की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि टेक्सटाइल का दायरा मुख्य रूप से कताई मिलों और परिधान निर्माण इकाइयों तक सीमित माना जाने लगा है। नतीजतन इस विशेषज्ञता में आवेदन करने वालों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है।

## एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में अवसरों का सीमित दायरा
विमानन, उपग्रह और अंतरिक्ष तकनीक से जुड़ी एयरोस्पेस इंजीनियरिंग का क्षेत्र बाहर से देखने में जितना रोमांचक प्रतीत होता है, करियर की वास्तविक राह उतनी ही जटिल साबित हो रही है। हालिया प्रवेश रुझानों से सामने आया है कि शीर्ष पांच सौ रैंक प्राप्त करने वाले कई उम्मीदवारों ने भी इस विकल्प से दूरी बनाई है। इसका सबसे प्रमुख कारण देश के भीतर निजी विमानन और अंतरिक्ष अनुसंधान क्षेत्र में सीमित रिक्तियां होना है। इसके अलावा इसरो और डीआरडीओ जैसी प्रतिष्ठित सार्वजनिक संस्थाओं में चयन प्रक्रिया बेहद प्रतिस्पर्धी है, जिससे अनिश्चितता की स्थिति बनी रहती है।

## बायोमेडिकल इंजीनियरिंग और स्वास्थ्य तकनीक की सीमाएं
चिकित्सा विज्ञान और इंजीनियरिंग के संयोजन से तैयार की गई बायोमेडिकल इंजीनियरिंग को एक समय भविष्य का सबसे बड़ा तकनीकी क्षेत्र माना गया था। अस्पताल उपकरणों और स्वास्थ्य तकनीक के विकास के उद्देश्य से शुरू हुई यह शाखा छात्रों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर सकी। भारतीय बाजार में अस्पतालों और चिकित्सा उपकरण निर्माता कंपनियों के भीतर इस विशेषज्ञता के लिए उपलब्ध वेतन और पदोन्नति के अवसर टेक उद्योग की तुलना में काफी कम हैं। दो अलग-अलग विषयों के बीच संतुलन साधने की जटिलता और अनिश्चित भविष्य के चलते छात्र इस विकल्प को चुनने में सतर्कता बरत रहे हैं।

## इसका आप पर असर
इंजीनियरिंग प्रवेश में आ रहे इस बदलाव का सीधा असर छात्रों की करियर योजना और कॉलेज चयन प्रक्रिया पर पड़ रहा है।

- **छात्रों के लिए:** पारंपरिक इंजीनियरिंग शाखाओं की मांग घटने से कंप्यूटर साइंस और आईटी सीटों पर प्रतिस्पर्धा काफी बढ़ गई है। छात्रों को केवल कॉलेज के नाम के बजाय संबंधित ब्रांच में प्लेसमेंट और शुरुआती सैलरी पैकेज की वास्तविकता को परखना होगा।
- **अभिभावकों के लिए:** कॉलेज काउंसलिंग के दौरान पुरानी मान्यताओं के आधार पर ब्रांच चुनना जोखिम भरा साबित हो सकता है। उन्हें बच्चे के लिए डिग्री चुनते समय उद्योग में वर्तमान रोजगार के अवसरों और निजी क्षेत्र की मांग पर ध्यान देना चाहिए।
- **शैक्षणिक संस्थानों के लिए:** पारंपरिक विषयों में खाली सीटों की समस्या को दूर करने के लिए सिलेबस को आधुनिक बनाना अनिवार्य हो गया है। तकनीकी कॉलेजों को पुराने इंजीनियरिंग विषयों में डेटा और ऑटोमेशन से जुड़े मॉड्यूल शामिल करने होंगे।
- **रोजगार बाजार के लिए:** कोर मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को कुशल इंजीनियरों की कमी का सामना करना पड़ सकता है। उद्योगों को युवा प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए शुरुआती वेतन और कार्य परिस्थितियों में सुधार करना होगा।

## ऐसा क्यों हुआ
इंजीनियरिंग की पारंपरिक शाखाओं से छात्रों का दूर होना सीधे तौर पर रोजगार बाजार के आर्थिक ढांचे और वेतन असमानता से जुड़ा है। सॉफ्टवेयर उद्योग द्वारा दिए जाने वाले उच्च पैकेज और अपेक्षाकृत आरामदायक कार्य परिस्थितियों ने छात्रों की प्राथमिकताओं को बदल दिया है।

- **वेतन अंतर:** टेक कंपनियों में शुरुआती वेतन पैकेज कोर इंजीनियरिंग कंपनियों के मुकाबले काफी अधिक हैं। निर्माण और विनिर्माण क्षेत्र में शुरुआती पारिश्रमिक कम होने के कारण मेधावी छात्र इन विकल्पों से बचते हैं।
- **कार्य स्थल की चुनौतियां:** सिविल और मेटलर्जी जैसी शाखाओं में कठिन फील्ड वर्क और संयंत्रों में काम करना अनिवार्य होता है। इसके विपरीत छात्र सॉफ्टवेयर और डेटा आधारित नौकरियों के लचीले कार्य परिवेश को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं।
- **सीमित निजी अवसर:** एयरोस्पेस और जैव चिकित्सा जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में भारत में निजी क्षेत्र का दायरा अभी भी सीमित है। छात्रों को केवल कुछ सरकारी या अत्यधिक प्रतिस्पर्धी संस्थाओं पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे करियर का जोखिम बढ़ जाता है।

## सवाल-जवाब

### 1. छात्र किन पांच इंजीनियरिंग शाखाओं से दूरी बना रहे हैं?
छात्रों की रुचि मुख्य रूप से सिविल, मेटलर्जी और मटीरियल साइंस, टेक्सटाइल, एयरोस्पेस और बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में घटी है।

### 2. शीर्ष रैंकर्स सिविल इंजीनियरिंग क्यों नहीं चुन रहे हैं?
कठिन फील्ड वर्क, अपेक्षाकृत कम शुरुआती वेतन और निजी क्षेत्र में नौकरी की अस्थिरता के कारण शीर्ष छात्र इससे बच रहे हैं।

### 3. एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में प्रवेश लेने से छात्र क्यों कतरा रहे हैं?
भारत में इस क्षेत्र में निजी नौकरियों के अवसर बहुत सीमित हैं और प्रमुख सरकारी संस्थानों में चयन अत्यधिक कठिन है।

### 4. बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में क्या चुनौतियां देखी जा रही हैं?
अस्पतालों और चिकित्सा उपकरण उद्योग में आईटी सेक्टर के मुकाबले कम सैलरी और करियर के सीमित विकल्प इसकी मुख्य चुनौतियां हैं।

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