# गुजरात में भारी-भरकम फीस के आगे झुके छात्र, 771 विद्यार्थियों ने छोड़ी आवंटित MBBS और BDS सीटें

> गुजरात में प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की अत्यधिक फीस के कारण काउंसलिंग के शुरुआती चरणों में ही सैकड़ों विद्यार्थियों ने अपनी आवंटित एमबीबीएस और बीडीएस सीटें छोड़ दी हैं। आर्थिक तंगी से बेबस होकर छात्र अब आयुर्वेद और होम्योपैथी जैसे सस्ते पाठ्यक्रमों का रुख कर रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** करियर · **Published:** 2026-09-26 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/career/gujarat-men-bhari-bharakama-phisa-ke-age-jhuke-chhatra-771-vidyarthiyon-ne-chhori-avntita-mbbs-aura-bds-siten-38852 · **Language:** Hindi
**Tags:** गुजरात समाचार, मेडिकल फीस, एमबीबीएस सीटें, नीट काउंसलिंग, प्राइवेट मेडिकल कॉलेज, शिक्षा का खर्च

मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा यानी NEET पास करना तो बस एक शुरुआत है, असली चुनौती तो उसके बाद आने वाले खर्चों से निपटने की होती है। गुजरात में एक ऐसा ही चिंताजनक मामला सामने आया है, जहां बड़ी संख्या में छात्रों को अपनी मनपसंद सीटें केवल इसलिए छोड़नी पड़ीं क्योंकि उनके परिवार निजी कॉलेजों की भारी-भरकम फीस भरने में सक्षम नहीं थे। डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले ये छात्र काउंसलिंग के शुरुआती दौर में ही अपनी सीटें गंवाने को मजबूर हो गए हैं।

## सीटें अलॉट होने के बावजूद दाखिला न लेने का आंकड़ा
मेडिकल एडमिशन कमेटी (ACPUGMEC) द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, गुजरात में काउंसलिंग के पहले दो राउंड समाप्त होने के बाद 771 छात्रों ने उन्हें आवंटित की गई MBBS और BDS की सीटें छोड़ दी हैं। इन विद्यार्थियों ने सीट पक्की होने के बाद भी एडमिशन फीस जमा नहीं कराई। इस बेहद संवेदनशील और मुश्किल स्थिति के कारण कई होनहार छात्र अब मजबूरन होम्योपैथी (BHMS), आयुर्वेद (BAMS) या फार्मेसी जैसे वैकल्पिक और सस्ते पाठ्यक्रमों का रुख कर रहे हैं। इन छात्रों के लिए अपनी पढ़ाई पूरी करना अब केवल बजट का खेल बनकर रह गया है।

## पारुल यूनिवर्सिटी में मिली सीट छोड़ने पर मजबूर मेमन मोहम्मद शेख
वडोदरा के रहने वाले मेमन मोहम्मद शेख की कहानी इस वित्तीय संकट का एक बड़ा उदाहरण है। मेमन को ओपन कैटेगरी के तहत वडोदरा की पारुल यूनिवर्सिटी में MBBS की सीट अलॉट की गई थी। इस कॉलेज की सालाना फीस करीब 10 लाख रुपये है। मेमन के पिता एक छोटी सी साड़ी की दुकान चलाते हैं, जिससे होने वाली आय से पूरे परिवार का खर्च चलता है। हालांकि उन्हें सरकारी स्कॉलरशिप और अपने समुदाय से कुछ वित्तीय मदद का आश्वासन मिला था, जिससे पहले साल के लिए 6 लाख रुपये जुटाए जा सकते थे, लेकिन आगे के वर्षों में हर साल 10 लाख रुपये का प्रबंध करना उनके परिवार की आर्थिक क्षमता से कोसों दूर था। अंततः उन्हें अपनी सीट छोड़नी पड़ी।

## किसान के बेटे उदय करावडरा ने फीस के चलते बदला अपना फैसला
इसी तरह की आपबीती किसान के बेटे उदय करावडरा की भी है। उदय ने NEET परीक्षा में 421 अंक हासिल किए थे, जिसके आधार पर उन्हें अहमदाबाद के एसएएल मेडिकल कॉलेज में प्रवेश का अवसर मिला था। लेकिन इस कॉलेज की सालाना फीस 11.68 लाख रुपये है, जिसका मतलब है कि पूरे 5 साल की पढ़ाई का कुल खर्च लगभग 55 लाख रुपये तक पहुंच जाएगा। इतनी बड़ी धनराशि जुटाने में असमर्थ होने के कारण उदय ने इस सीट को ठुकरा दिया और अब वह आयुर्वेद (BAMS) या होम्योपैथी (BHMS) जैसे कोर्स में दाखिला लेने की योजना बना रहे हैं, जहां पढ़ाई का खर्च काफी कम है और मध्यमवर्गीय परिवार इसे आसानी से वहन कर सकते हैं।

## अधिकारियों ने जताई चिंता, वैकल्पिक कोर्स बने प्राथमिकता
राज्य के मेडिकल एडमिशन पैनल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि MBBS और BDS जैसे मुख्य पाठ्यक्रमों में इतनी बड़ी संख्या में पक्की सीटों का छोड़ा जाना एक असामान्य घटना है। उनके अनुसार, निजी कॉलेजों की अत्यधिक फीस ही छात्रों के इस कदम की मुख्य वजह है। फीस के भारी बोझ के कारण छात्र यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे मिली हुई सीट पर प्रवेश लें या फिर अगले राउंड की काउंसलिंग का इंतजार करें। इस अनिश्चितता के बीच, वे डेंटल, फार्मेसी, आयुर्वेद और होम्योपैथी को अधिक व्यावहारिक मान रहे हैं, क्योंकि इनमें कम बजट में डिग्री पूरी की जा सकती है।

## शिक्षा का व्यवसायीकरण और परिवारों पर कर्ज का संकट
यह गंभीर स्थिति केवल गुजरात तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की संपूर्ण चिकित्सा शिक्षा प्रणाली की एक बड़ी कड़वी सच्चाई को दर्शाती है। आज के समय में चिकित्सा की पढ़ाई धीरे-धीरे केवल संपन्न परिवारों तक ही सीमित होती जा रही है। मध्यमवर्गीय और गरीब परिवार अक्सर अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने के लिए भारी ब्याज दरों पर बैंक लोन ले लेते हैं, जिससे वे सालों-साल कर्ज के गहरे जाल में फंसे रहते हैं। इस अनिश्चितता और भारी वित्तीय जोखिम से बचने के लिए अब छात्र व्यावहारिक रुख अपना रहे हैं और ऐसे विकल्पों का चयन कर रहे हैं जो उनके बजट के अनुकूल हों और भविष्य में रोजगार की सुरक्षा भी प्रदान करें।

## इसका आप पर असर
निजी मेडिकल कॉलेजों की अत्यधिक फीस के कारण होनहार छात्रों को अपनी आवंटित सीटें छोड़नी पड़ रही हैं, जिससे मध्यमवर्गीय परिवारों पर भारी वित्तीय दबाव साफ दिखाई देता है।

- **मध्यमवर्गीय परिवारों पर:** व्यावसायिक शिक्षा का लगातार महंगा होना आम परिवारों को कर्ज के जाल में ढकेल रहा है। इसके कारण माता-पिता को बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए अपनी जमा-पूंजी दांव पर लगानी पड़ रही है।
- **गुजरात में:** राज्य के 771 छात्रों द्वारा मुख्य धारा की सीटें छोड़ने से वैकल्पिक चिकित्सा प्रणालियों (AYUSH) में दाखिले बढ़ेंगे। इससे आने वाले समय में राज्य में एलोपैथिक डॉक्टरों की कमी भी महसूस हो सकती है।

## ऐसा क्यों हुआ
निजी चिकित्सा संस्थानों की मनमानी फीस संरचना और सरकारी कॉलेजों में सीटों की सीमित संख्या ने छात्रों को इस स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है।

- **अत्यधिक फीस:** गुजरात के निजी मेडिकल कॉलेजों में वार्षिक फीस 10 लाख से 11.68 लाख रुपये तक है। इस कारण पांच साल का कुल खर्च 50 से 55 लाख रुपये तक पहुंच जाता है जो एक आम नागरिक के बजट से बाहर है।
- **वित्तीय असुरक्षा:** भारी-भरकम ब्याज दरों पर एजुकेशन लोन लेने से परिवार कर्ज के दलदल में फंस जाते हैं। भविष्य में नौकरी और वेतन की अनिश्चितता के कारण छात्र इतना बड़ा जोखिम नहीं उठाना चाहते।

## सवाल-जवाब

### 1. गुजरात में कितने छात्रों ने आवंटित MBBS और BDS सीटें छोड़ी हैं?
काउंसलिंग के पहले दो राउंड में कुल 771 छात्रों ने फीस न भर पाने के कारण अपनी आवंटित सीटें छोड़ दी हैं।

### 2. निजी मेडिकल कॉलेजों में वार्षिक फीस कितनी है?
प्राइवेट कॉलेजों में सालाना फीस लगभग 10 लाख रुपये से लेकर 11.68 लाख रुपये तक है, जिससे कुल खर्च 55 लाख रुपये तक पहुंच जाता है।

### 3. सीटें छोड़ने के बाद छात्र कौन से वैकल्पिक कोर्स चुन रहे हैं?
छात्र अब MBBS की जगह आयुर्वेद (BAMS), होम्योपैथी (BHMS) और फार्मेसी जैसे किफायती कोर्स चुन रहे हैं।

### 4. मेमन मोहम्मद शेख ने अपनी MBBS सीट क्यों छोड़ दी?
वडोदरा की पारुल यूनिवर्सिटी में सालाना फीस 10 लाख रुपये थी। उनके साड़ी व्यवसायी पिता के लिए स्कॉलरशिप के बावजूद यह खर्च उठाना नामुमकिन था।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._